सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

कहां गया ट्रक लोड श्रीनाथ जी का प्रसाद?


सन् 1989 के उत्तरार्द्ध की घटना है। तारीख या तिथि का स्मरण नहीं। जब आर्य समाज के तेजस्वी नेता स्वामी अग्निवेश  ने वल्लभ सम्प्रदाय के विश्व  प्रसिद्ध तीर्थ नाथद्वारा स्थित श्रीनाथ जी के मन्दिर में दलितों के प्रवेश के लिए अपना अभियान छेड़ा और राज्य सरकार ने उनकी पद यात्रा को विफल कर अपने अभीष्ट तक नहीं पहुंचने  दिया,  तो उसके चंद दिनों बाद मुख्य मंत्री शिव  चरण माथुर ने घोषणा की कि वे स्वयं श्रीनाथ जी के मन्दिर में दलितों का ससम्मान प्रवेश कराएंगे। पूरी पूर्व तैयारियों के साथ निर्धारित तिथि को मुख्य मंत्री मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों,  सांसदों आदि के साथ चेतक नामक सरकारी विमान से डबोक हवाई अड्डे पर उतरे और कारों द्वारा मंदिर चौक  में पहुंचे,  जहां  से उनके साथ दलितों को मंदिर प्रवेश के लिए प्रस्थान करना था। चूंकि  घटना तेइस वर्ष पूर्व की है और यहां  प्रस्तुत विवरण मात्र स्मृति के आधार पर दिया जा रहा है,  अधिक विस्तार में तो जाना कठिन है,  पर फिर भी  इस आलेख की केन्द्रीय विषय वस्तु की रोचकता और विस्मयकारी तथ्य किसी फिक्शन या गल्प से भी अधिक मनोरंजक हैं।

इन पंक्तियों का लेखक जन सम्पर्क निदेशक की हैसियत से पहले ही सड़क मार्ग द्वारा नाथद्वारा पहुंच  चुका था। मुख्य मंत्री का जो संकल्प साकार होने वाला था,  उसमें किसी प्रकार का विघ्न उपस्थित न हो,  उसके लिए चाक-चौबंद बन्दोबस्त किए गए थे। पूरा नाथद्वारा दूर-दूर तक छावनी में तब्दील हो गया था।

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मुख्य मंत्री और अन्य नेताओं की अगुवाई में प्रवेश का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। कुल मिलाकर शायद पूरा प्रोग्राम दो घंटे से अधिक की अवधि का नहीं था। मुख्य मंत्री जी अपने साथ आए हुए राज नेताओं को ले कर विमान से वापस जयपुर प्रस्थान कर गए थे। भारी भीड़ भी तितर-बितर हो चुकी थी। उस समय देवस्थान विभाग के कमिश्नर कदाचित् डी. सी. शर्मा थे। वे साहित्यिक रुचि के विद्यानुरागी थे। अंग्रेज़ी-हिन्दी में कविताएं भी लिखते थे और स्वभाव से धार्मिक चित्तवृत्तियों के व्यक्ति थे। उनसे मेरा पूर्व परिचय था और वैसे भी प्रशासनिक शिष्टाचार की दृष्टि से हम दोनों को मिलना ही था। वे कार्यक्रम समाप्ति के थोड़ी देर बाद मुझे मंदिर में ले कर गए। एक बार फिर से भगवान् श्रीनाथ जी के दर्शन किए। अपने एक पूर्व परिचित विभागाध्यक्ष के प्रति अपना मैत्रीभाव प्रकट करने के लिए वे मुझे उस ओर ले गए जहां  श्रीनाथ जी का प्रसाद विशिष्ट  लोगों को दिया जाता था। देवस्थान कमिश्नर ने प्रसाद प्रभारी से कुछ प्रसाद मेरे लिए लाने का अनुरोध किया। ज्ञात हुआ कि वहां कोई प्रसाद षेष नहीं है। बहुत पूछताछ करने पर बताया गया कि जितना प्रसाद मंदिर में था,  वह ट्रक भर कर जयपुर मुख्य मंत्री निवास पर भेज दिया गया। बहुत अविश्वसनीय बात थी,  पर किया क्या जा सकता था?  जिस महिमामय मंदिर में रात-दिन दिव्य प्रसादी तैयार होती रहती हो,  वहां यह उत्तर चकित कर देने वाला था। बहरहाल।

मैं जयपुर लौटते समय मार्ग में प्रतिपल इसी अनहोनी लगने वाली घटना पर विचार करता रहा। दूसरे दिन प्रातःकाल ही मैं लगभग 9 बजे मुख्य मंत्री निवास पहुंच गया। मुझे चैन कहां था?  पहुंचने के तुरन्त बाद ही मुझे मुख्य मंत्री के ड्राइंग  रूम में प्रवेश करा दिया गया। वहां दो-तीन बड़े व्यक्ति पहले से विराजमान थे। मुख्य मंत्री जी ने इतनी सुबह बिना बुलाए उनकी सेवा में उपस्थित होने का कारण पूछा। मैंने उत्तर दिया कि मैं एकान्त में कुछ निवेदन करना चाहूंगा। वे मुझे उस ड्राइंग  रूम के भीतर स्थित एक अन्य ड्राइंग रूम में ले गए,  जो सम्भवतः गोपनीय किस्म की चर्चाओं के लिए बना होगा। मुझे उसमें बैठने का यह पहला ही अवसर था।  मैंने बैठते ही कुछ झिझकते हुए कहा- ‘’सर! मुझे परिजनों के लिए पाँच-दस  किलो श्रीनाथ जी का प्रसाद चाहिए।‘ वे मुस्कुराते हुए बोले- ‘’आज आपको क्या हो गया है?  इतना प्रसाद यहां कहां रखा है।‘  तब मैंने उन्हें पूरी घटना का विवरण दिया। वे भौंचक्के रह गए। उन्होंने अचानक अपनी पत्नी सुशीला जी को बुलाया और मेरी ओर संकेत करते हुए कहा ‘सुनिए,  ये क्या कह रहे हैं?  सुशीला जी ने अनभिज्ञता और आश्चर्य दोनों प्रकट किये। आनन-फानन में सी. आई. डी. के शीर्ष अधिकारी को इस घटना की तथ्यात्मक जानकारी जुटाने के आदेश दे  दिए गए।

इस बारे में मुख्य मंत्री जी से मेरी फिर कोई चर्चा नहीं हुई। पर बाद में होने वाली काना-फूसी के अनुसार मुख्य मंत्री के निजी स्टाफ का एक व्यक्ति,  जिसकी राज्य-सेवा में भले ही कोई हैसियत नहीं थी,  किन्तु जो अन्यथा बहुत पावरफुल हो गया था,  उसी के ग्राम में यह ट्रक लोड प्रसाद उसके निवास पर डिलीवर हुआ था,  जिसका सदुपयोग उसने अपने पिता की पुण्य तिथि पर दिए गए महा भोज में कर लिया था। यह आरोप कितना प्रामाणिक था,  यह कहना कठिन है। सत्य कब क्षेपक बन जाता है और क्षेपक कब सत्य की तरह स्थापित हो जाता है,  इसका विश्लेषण बहुत जटिल है। बकौल राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर केः-
   
       अलिखित ही रही सदा,  जीवन की सत्य कथा,
       जीवन की लिखित कथा,  सत्य नहीं क्षेपक है।

सम्पूर्णानंद! बेटा, बहुत मुटियाय गए हो!


हिन्दी के सुप्रसिद्ध कथाकार और विवादास्पद लेखक पांडेय बेचन शर्मा ‘’उग्र’ के नाम से शायद ही कोई हिन्दी भाषी अपरिचित हो। एक ज़माने में उनकी कहानी ‘चाकलेट’  को लेकर बड़ा बबाल मचा था। उनके यथार्थपूर्ण गहरे तक चोट करने वाले सृजन ने अनेक शुद्धतावादी आडम्बरधारी लेखकों को बहुत चौंकाया था। पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने तो उनके लेखन को घासलेटी साहित्य कहकर उनकी बड़ी निन्दा की थी। पर हकीकत यह है कि उग्रजी जैसा अक्खड़,  फक्कड़ और धारदार लेखक हिन्दी में दूसरा नहीं हुआ। जिन लोगों ने आत्माराम एण्ड सन्स से प्रकाशित उनकी आत्मकथा ‘’अपनी खबर’ पढ़ी है,  वे समझ सकते हैं कि ऐसी बेबाक जीवनी और वह भी इतनी मर्मस्पर्शी शैली में लिखना बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए भी ईष्र्या का विषय हो सकता है।

पांडेय बेचन शर्मा ‘’उग्र’ कुँआरे थे। एक बार जब प्रसिद्ध नेता श्री प्रकाश जी के विवाह करने की खबर उड़ी तो उग्रजी ने अपने एक स्तंभ में बहुत मजेदार पीस लिखा था,  जिसका शीर्षक था:  ‘’मैं उग्र 66 का कुँआरा और सत्तर के श्री प्रकाश नवोढ़ा से ब्याह रचायेंगे’ ।

उग्रजी की लम्बी और संघर्षपूर्ण जीवन-यात्रा इतनी दिलचस्प है कि कितने ही स्तंभ-लेखक उससे निहाल हो सकते हैं। बहरहाल! यह भी एक विचित्र संयोग था कि उग्रजी के पट्ट शिष्य और वरिष्ठ पत्रकार चिरंजीव जोशी सरोज उन्हें जयपुर ले आये। वे तब रामरतन कोचर द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक ’गणराज’ के सम्पादक थे। सरोज जी ने बहुत आदरपूर्वक उन्हें इस अखबार से संबंद्ध किया और एक नियमित स्तंभ उनसे लिखाने लगे। उग्रजी का हर फीचर धमाकेदार होता था। उग्रजी कहीं एक जगह टिक कर रहने वाले नहीं थे। उन्हें कोई बन्धन में नहीं बाँध सकता था। अतः स्वाभाविक रूप से जयपुर में कुछ अर्से रहकर वे शायद दिल्ली या इलाहाबाद चले गये। उस जमाने के सभी महान् साहित्यकार उनके मित्र थे, पर उनसे घबड़ाते भी थे। बहरहाल!

संयोग ऐसा बना कि जिन दिनों डॉ  सम्पूर्णानन्द राजस्थान के गवर्नर थे,  उग्रजी एक बार जयपुर आये। अपने मित्र सम्पूर्णानन्द जी को खबर हुई। जहाँ ठहरे थे,  वहाँ उन्हें लाने के लिए गाड़ी भेजी गई,  किन्तु गाड़ी को रीते ही वापस लौटना पड़ा। उन्होंने गाड़ी में बैठने से इन्कार कर दिया और बाद में रिक्शा में बैठकर राजभवन आये। सम्पूर्णानन्द जी अपने ए.डी.सी. आदि के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही उग्रजी पहुँचे, सम्पूर्णानन्द जी ने बाहर आकर उन्हें बाथ में भर लिया,  उग्रजी ने आव देखा न ताव। भाव-विव्हल होकर मित्र से जबर्दस्त उपहास किया - ‘’सम्पूर्णानन्द! बेटा बहुत मुटियाय गये हो।‘ सम्पूर्णानन्द जी तो बड़े विद्वान् और संजीदा राजपुरूष थे। वे भी बहुत देर तक हँसते रहे। उग्रजी को भीतर शोभन-कक्ष में सादर ले जाया गया। उनका यथोचित सम्मान और सत्कार किया। बनारस से जुड़ी पुरानी बातें होती रहीं। वे राजभवन में कितनी देर रहे,  कहना कठिन है। उग्रजी जैसे अपनी मर्जी के मालिक,  अपने तरीके से मादक द्रव्यों की मस्ती में रहने वाले अलमस्त फक्कड़ साहित्य सर्जक को राजभवन कब रास आने वाला था। जयपुर में उनके एक और गुणग्राहक थे,  राष्ट्रदूत के स्वामी बाबू हजारी लाल शर्मा। हजारी बाबू भी अन्य साहित्यकारों की तरह उनकी भी पैसे-टके से जरूर मदद करते रहे होंगे,  पर उग्रजी की सिजेरियन वाणी का स्वाद उन्होंने भी जरूर चखा होगा।

मैथिली बाबू के साथ बासी पूरियों का नाश्ता


मोटे अनुमान से यह घटना कोई छह दशक पहले की रही होगी। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचकर राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत संसद-सदस्य बन चुके थे। मेरी चढ़ती वय थी। उन दिनों कविता लिखने और बड़े कवियों से मिलने का बड़ा चाव रहता था। एक बार दिल्ली जाने का कार्यक्रम बनाया ही इसलिए कि वहाँ जाकर साहित्य की विशिष्ट विभूतियों का दर्शन करूँगा। इत्तफाक की बात थी कि उन दिनों दिल्ली में भगवती चरण वर्मा,  रामधारी सिंह दिनकर,  जोश मलीहाबादी,  जगदीश चन्द्र माथुर जैसी हस्तियाँ देश की राजधानी में थी। इसका श्रेय जाता है तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री वी.वी. केसकर को और मंत्रालय के सचिव एवं ‘कोणार्क’  नाटक के ख्याति प्राप्त लेखक जगदीश चन्द्र माथुर आई.सी.एस. को जिन्होंने आकाशवाणी में प्रोड्यूसर्स का नया काडर बनाया और कार्यक्रमों की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए हिन्दी के प्रसिद्ध लेखकों को उन पदों पर अनुबन्ध के आधार पर पदस्थापित किया। सुमित्रानन्दन पंत,  उदयशंकर भट्ट और ऐसी ही कितनी ही नामचीन  साहित्यिक हस्तियाँ प्रोड्यूसर,  चीफ प्रोड्यूसर और परामर्शदाता के पदों पर नियुक्त की गईं। बहरहाल।

मेरी सबसे पहली भेंट ‘भारत भारती’  के यशस्वी राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त से ही हुई। वे कदाचित् साउथ एवन्यू में रहते थे। मैथिली बाबू बहुत सरल और सीधे व्यक्ति थे। असाधारण कीर्ति लाभ और एम.पी. बनने से वे टाइट-कॉलर्ड नहीं हुए थे। मैं जैसे ही उनके निवास पर पहुँचा और डोर-बैल बजाई, स्वयं गुप्त जी ने द्वार खोले। मैने अभिवादन स्वरूप उनके चरण-स्पर्श किये और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। ड्राइंग रूम में ही मुझे एक सोफे पर बैठने का संकेत किया। स्वयं भी मेरे पार्श्व में विराजमान हो गये। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया। वे यह जानकर बड़े प्रसन्न थे कि मैं राजस्थान से आया था। काफी देर  तक राजस्थान के सांस्कृतिक वैभव की प्रशंसा करते रहे। फिर मुझसे प्रश्न किया कि क्या मैं कविता रचता हूँ?  मैंने हाँ में उत्तर दिया,  तो उन्होंने कुछ कविताएँ सुनाने का आदेश दिया। मैंने अनुपालना की और अपनी कुछ प्रारंभिक रचनाएं सुनाई। महापुरूषों के स्वभाव के अनुसार उन्होंने मेरी काव्य-प्रतिभा की सराहना की और फिर लगे कहने: अरे मैं तो बातचीत में भूल ही गया,  इतनी दूर से आये हैं,  तो नाश्ता तो कीजिए। पर हमारी एक शर्त है। मैं सुनकर स्तंभित सा हुआ। न जाने क्या शर्त रखेंगे। फिर मुस्कुराते हुए बोले ‘देखिये,  हम आपके सामने एक निजी प्रकृति का रहस्योद्घाटन कर रहे हैं। हम पिछले कई वर्षों से बासी पूरियों का नाश्ता करते हैं। रात को दूध में गूँदे हुए आटे की पूरियाँ शुद्ध घृत में उतरवाते हैं और दूसरे दिन सुबह नाश्ते में खाते हैं। मैं उनकी सरलता देखकर चकित रह गया। थोड़ी देर में सेवक नाश्ता ले आया। पूरियों के साथ कुछ मठड़ियाँ और कैरी का आचार भी था। डाइनिंग टेबिल पर नाश्ता लगा। मैंने राष्ट्रकवि के साथ नाश्ते का आनन्द लिया। एक दुर्लभ अवसर मुझ जैसे नवोदित कवि को प्राप्त हुआ था। मैं कई दिनों तक गर्व से सीना फुलाकर मित्रों को यह रोचक प्रसंग सुनाता रहा। मेरी स्मृतियों में उन बासी पूरियों का आस्वाद आज भी रमा है।

किस्सा टेंटड़ा ठाकुर की कार का


जयपुर रियासत के स्वामी महाराजा मानसिंह द्वितीय कदाचित् राजस्थान के तत्कालीन राजा-महाराजाओं में सर्वाधिक शिक्षित,  दृष्टि सम्पन्न और सामाजिक सरोकारों के प्रति हर समय सजग रहने वाले राजपुरूष थे। जयपुर की रियासत भी राजस्थान में सबसे बड़ी और अपने अतुल वैभव के लिए विख्यात् थी। मानसिंह की कीर्ति के स्मारक अनेक शैक्षणिक,  सांस्कृतिक और वैज्ञानिक संस्थान जयपुर में है। किन्तु उनकी एक बड़ी विशिष्टता जो अल्पज्ञात रही है,  उनके द्वारा रियासत के जागीरदारों,  ठिकानेदारों और ताजिमी सरदारों को ग्रामीण परिवेश से निकाल कर जयपुर में बसाना और उनकी संतति को आधुनिक शिक्षा देकर समय की धार के अनुरूप सुसंस्कृत बनाना था। पुराने जयपुर में जिधर से भी निकल जाइये,  कहीं बिचून हाउस, कहीं चौमू  हाउस,  कहीं लवाण हाउस,  कहीं अलूदा हाउस आदि बड़े-बड़े निवास विभिन्न जागीरदारों की ही निर्मिति थी। अब तो वह नजारा कभी का बदल चुका। अधिकांश जागीरदारों ने वे सम्पत्तियाँ कौड़ियों के मोल चालाक लोगों के हवाले करके उनका भाग्योदय कर दिया। जागीरदारों के राजसी भवनों की इसी कतार में सुप्रसिद्ध धूला हाउस था। जौहरी बाजार से चलें तो पुरानी फल मंडी के निकट और बापू बाजार की बैक में स्थित धूला हाउस एक मशहूर जगह थी। सन् 1950 में जब मैं पहली बार रावल कुबेर सिंह जी के दर्शनों के लिए धूला  हाउस पहुँचा तो मैं भौंचक्का रह गया। बाहर द्वारपाल की आज्ञा से प्रवेश। अन्दर एक कोने में रनिवास और कुबेरसिंह जी का दरबारे खास। कुछ फासले पर भट्टियों में शराब बन रही थी। मैं प्राचीन भद्रावती नगर और अब भांडारेज के नाम से जाने वाले ग्राम से आया था,  महाराजा कॉलेज में प्रवेश के लिए। भाँडारेज तब धूला ठिकाने के तहत् ही था। मुझे प्यार से रावल साहब ने अन्दर बुलाया,  पर निर्देश दिये गये कि मैं सोफे पर न बैठकर नीचे बैठूँ। मुझे धूला हाउस में स्थित एक बड़ी बिल्डिंग में जहाँ करीब बीस-बाईस कमरे बने थे,  स्थान मिल गया। किराया मात्र सात रूपये माहवार। बिजली, पानी मुफ्त। मेरे लिए यह भी सुखद था कि वहाँ पहले से दौसा,  अलवर,  जोधपुर आदि स्थानों के वरिष्ठ छात्र पहले से रह रहे थे। इस बिल्डिंग के पार्श्व में ही बना था टेंटड़ा ठाकुर साहब का आरामदेह निवास। टेंटड़ा एक छोटा सा ठिकाना था,  जिसके ठाकुर रावल कुबेर सिंह के रिश्ते में भाई लगते थे। गोरे लम्बे कद के टेंटड़ा ठाकुर साहब,  जिनका नाम मैं भूल चुका हूँ,  उस समय युवा थे। उनका एक ही शौक था - मदिरा गोष्ठियों का आयोजन करना,  नई-नई कारों में ऐंग्लोइन्डियन गर्ल्स के साथ घूमना और यार-दोस्तों के साथ मौजमस्ती करना। हममें से भी दो-तीन जो मैडीकल और लॉ  के छात्र थे,  उनके निकट हो गये थे। बहरहाल!

छोटा सा किस्सा यह कि जागीरदारों को मिली विशेष प्रिविलेज के तहत् टेंटडा ठाकुर साहब ने काले रंग की एक फोर्ड गाड़ी आयात की थी। धूला हाउस-निवासियों ने ही नहीं बाहर से भी कुछ लोग उसे देखने आये। तभी एक चमचे ने प्रस्ताव किया कि ‘’हुजूर, यह गाड़ी तो म्लेच्छों के देश से आई है,  इसलिए इसे दूध से धुलवाना चाहिए।‘  दूध के ढोल के ढोल बहाकर गाड़ी को दुग्ध-स्नान कराया गया। ठीक से पौंछा गया और उसे खुले में ही पार्क कर दिया गया। कुछ घंटों बाद गाड़ी पर सैकड़ों मक्खियाँ भिनभिनाने लगी। लोगों की हंसी रोके नहीं रूक रही थी। फिर भीड़ इकट्ठी हो गई। इस बार एक अन्य चमचे ने अर्ज किया ‘’हुजूर! म्लेच्छों के यहाँ से आई गाड़ी तो गंगाजल से ही पवित्र हो सकती है.’ सुझाव की भूरि-भूरि सराहना की गई। कई दूत हरिद्वार भेजे गये। बड़े-बड़े तांबे के मटके सेवक हरिद्वार लेकर गये। अन्ततः गंगाजल से गाड़ी की धुलाई कराके फिर उसका पूजन कराया गया।

राजस्थान के राजाओं पर तो राजनीति-विज्ञान के विद्वानों ने बहुत काम किया है,  पर जागीरदारों, ठिकानेदारों आदि के जीवन,  उनके बुद्धि-कौशल और उनकी सनकों पर स्याही कम ही इस्तेमाल की गई है। टेंटडा ठाकुर साहब के जीवन का यह छोटा सा प्रसंग इस स्तंभ-लेखक का आँखन देखा है।

ऐसे भी थे एक जनसम्पर्क निदेशक


राजस्थान-निर्माण के आरंभिक वर्षों में जब विभिन्न राज्य सेवाओं का न तो गठन हो सका था और न विभिन्न विभागों के वरिष्ठ पदों के लिए कोई कायदे-कानून ही बने थे,  राज्य सरकार स्वेच्छा से जैसा उचित समझती,  वरिष्ठ पदों पर अफसरों की तैनाती कर रही थी। इसी दौर में उत्तर प्रदेश से एक जनसम्पर्क निदेशक लाये गये। डॉ सम्पूर्णानन्द के सुपुत्र सर्वदानन्द वर्मा ने बिना किसी पूर्व अनुभव के इस पद को सुशोभित किया। उनकी सबसे बड़ी योग्यता यह थी कि उन्होंने कुछ उपन्यास और नाटक लिखे थे और रंगकर्म में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी। वे कुँआरे थे और गृहस्थी की झंझट से मुक्त होने के कारण काफी समय कार्यालय को देते थे। पर समय का सदुपयोग वे विभाग के लिए कम और अपनी रसिक वृत्तियों की संतुष्टि के लिए ही अधिक करते थे। प्रातः कार्यालय खुलने के समय जैसे ही वे निदेशक पद की कुर्सी पर आसन ग्रहण करते,  उसके तुरन्त बाद वे स्कॉच व्हिस्की की एक बोतल मंगाने का आदेश देते और प्रायः नित्य ही एक कलाकार बंगाली युवती को कई-कई घंटे कक्ष में बैठाये रखते। जितने समय वह युवती उनके साहचर्य में रहती,  बाहर लाल रंग की बत्ती जलती रहती, जो इस बात का संकेत देती रहती कि कोई भीतर प्रवेश करके उनकी प्राईवेसी भंग न करे।

सर्वदानन्द वर्मा को भले ही शासकीय अनुभव नहीं था, फिर भी अपने संक्षिप्त कार्यकाल में जो शायद एक वर्ष से अधिक नहीं था, राज-काज को भी अपने ढंग से निपटाने की कोशिश की थी। वे दूसरे-तीसरे दिन विचाराधीन पत्रावलियों का निस्तारण करते और विशुद्ध हिन्दी में अपनी टिप्पणी लिखते थे। भाषा की शुद्धता पर उनका बड़ा जोर था और वे अधीनस्थ अधिकारियों की भाषिक अशुद्धियों के कारण अक्सर उन्हें बहुत लताड़ते थे। जिस अधिकारी की नोटिंग में वर्तनी की अशुद्धि होती, उसे इंगित करते हुए वे अक्सर यह निर्देश देते रहते थे – ‘कृपया अपनी इमला सुधारें’ ।

सर्वदानन्द जी ने जनसम्पर्क निदेशालय के तत्वावधान में कई नाटक मंचित कराये, जिनमें प्रायः उन्हीं की स्क्रिप्ट होती थी। विभाग के अनेक लोगों को उन्होंने रंग-कर्म की ओर प्रवृत्त किया और अभिनय में उनका निर्देशन भी किया। अपने कार्यकाल में उन्होंने कवि-सम्मेलन भी आयोजित कराये। अपनी इन उपलब्धियों का लेखा-जोखा उन्होंने ‘प्रशासन का ललित पक्ष’ शीर्षक से प्रकाशित भी किया। विभाग में उस समय बहुत कम अधिकारी थे, फिर भी उनके स्वभाव में अहंकार इतना था कि वे किसी के भी प्रति बहुत स्नेहशील नहीं थे।

दुर्भाग्य से उनके अत्यधिक मदिरापान और रसमयता के चर्चे सचिवालय के गलियारों और मीडिया मित्रों की गोष्ठियों में होने लगे। अन्ततः वह दिन शीघ्र ही आ गया, जब उनके पिता डॉ  सम्पूर्णानन्द के गहरे मित्र और राज्य के मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास को यह सन्देश भेजना पड़ा कि वे ‘अपने रत्न को यथाशीघ्र वापस बुलालें।‘        सर्वदानन्द जी त्याग-पत्र देकर लखनऊ प्रस्थान कर गये और इस प्रकार इस दिलचस्प प्रकरण का अन्त हुआ। राजस्थान शासन में अब तक पच्चीस से अधिक जनसंपर्क निदेशक रह चुके होंगे,  पर सर्वदानन्द तो सर्वदानन्द ही थे।

मंगलवार, 12 जून 2012

अथ डिज़ायर महात्म्य



कामिल बुल्के के कोश के अनुसार डिजायर शब्द का अर्थ है - अभिलाषा, इच्छा, चाहना, और कामना, जबकि वैब्स्टर डिक्शनरी के अनुसार डिजायर शब्द के उक्त अर्थों के अतिरिक्त काम-बुभुक्षा (सैक्सुअल एपीटाइट) भी है। कदाचित् इसीलिए सुधीर कक्कड़ के उपन्यास ‘कामयोगी‘ का अंग्रेजी अनुवाद ‘द एसेटिक ऑफ डिजायर’ के नाम से छपा है। संयोग से हमारे मंत्री, विधायक और सांसद इस शब्द को दोनों ही संदर्भों में सार्थक कर रहे हैं। मीडिया साक्षी है।

इन पंक्तियों के लेखक ने इस शब्द के राजनीतिक अर्थ को पहली बार लगभग 48 वर्ष पूर्व तब सुना था, जब वह आयुर्वेद विभाग के तत्कालीन निदेशक प्रेमशंकर जी से एक वैद्यराज के स्थानान्तरण की सिफारिश के लिए ही गया था। वहाँ उन्होंने इधर-उधर की चर्चा करते हुए अपने निजी सहायक को विशेष निर्देश दिये थे कि अजमेर चलने से पूर्व वह सारी डिजायर्स की एक फाइल तैयार कर ले। मुझे यह आदेश सुनकर कुछ अचम्भा-सा हुआ कि डिजायर जैसी अमूर्त  अभिव्यक्ति को फाइल में कैसे बांधा जा सकता है। मुझसे रहा नहीं गया और मैंने आयुर्वेद निदेशक से इस आदेश का मन्तव्य पूछ ही लिया। तब प्रेमशंकर जी ने बताया कि मंत्री गण जिस वैद्य या उपवैद्य का स्थानान्तरण स्थान विशेष पर चाहते हैं,  उस अभिलाषा को आदेश के रूप में लिखकर भेजते रहते हैं,  उसके लिए ही डिजायर शब्द प्रचलन में आया है। उसके बाद से तबादलों के मौसम में इसका महात्म्य पूरी प्रखरता से उजागर होता रहा है।

हजारों की संख्या में अध्यापक, पटवारी, वैद्य, आदि से लेकर छोटे-मोटे अधिकारी तक अभीष्ट स्थान पर अपनी पदस्थापना के लिए अपने अंचल के विधायकों, मंत्रियों और सांसदों से यह बहुविज्ञापित इच्छा-पत्र लेकर संबंधित विभागाध्यक्षों और सचिवों के कार्यालयों के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। किसकी इच्छा-पूर्ति होती है और किसकी नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इच्छा-पत्र भेजने वाला राजनेता कितना पावरफुल है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि हर कर्मचारी की पहुँच मंत्रियों, विधायकों और सांसदों तक नहीं होती,  इसलिए इच्छा-पत्र प्राप्त करने के लिए बिचौलियों, दलालों और राजनेताओं के चमचों की मदद जरूरी हो जाती है। इच्छा-पत्र उपलब्ध कराने की इस मदद का महनताना  कैश और काइन्ड दोनों में ही हो सकता है। इन दिनों इच्छा-पत्रों और तबादलों को लेकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं में और यहाँ तक कि मंत्रियों के बीच भी जो सिर-फुटव्वल हो रही है, वह अब जन-जन को ज्ञात है और धन्य है हमारा मीडिया जो प्रतिदिन ऐसी खबरों से जन-मानस का मनोरंजन करता है।

सारी स्थिति का विश्लेषण करें,  तो प्रश्न यह उठता है कि सुखाड़िया शासन में उत्पन्न हुई यह डिजायर प्रणाली अब तक कैसे चल रही है। क्या कभी किसी सत्तासीन के मस्तिष्क में यह विचार नहीं आया कि व्यक्ति कोई भी हो, किसी भी जात-पांत या सम्प्रदाय का हो, वह अपना कार्य पूरी दक्षता के साथ करे,  केवल इसे सुनिश्चित किया जाय। किसी अकर्मण्य कर्मचारी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित करने से क्या उसमें सुधार आ जायेगा और क्या वह मेहनत से अपना काम करने लगेगा?  एक भ्रष्टाचारी कर्मचारी या अधिकारी को कहीं भी पदस्थापित किया जाय,  उसके आचरण में कोई कायापलट होगा, यह अपेक्षा करना निरर्थक है। हमारे यहाँ चुनावी वर्ष में तो आचार-संहिता लागू होने  से पूर्व ऐसे-ऐसे इच्छा-पत्र क्रियान्वित होते हैं कि देख और सुनकर आश्चर्य होता है।

दर असल जब तक सरकारी विभागों में नौकरियों के लिए भर्ती की प्रक्रिया बहुत कड़ी और पारदर्शी नहीं होगी, चयनित कर्मचारियों का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं होगा और फिर उसकी तैनाती सही स्थान पर नहीं होगी, कार्मिक व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं दैत्याकार स्वरूप लेती ही रहेंगी।

ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जब राजनीतिक दलों के कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारियों की सन्तानें और रिश्तेदार नितान्त अयोग्य होते हुए भी राज्य सेवाओं के पदों पर चुन लिये गये हैं। राजनेताओं और उनकी सहधर्मिणियों की सेवा में रत रहने वाले कर्मचारी अपनी इस निकटता का पूरा लाभ उठाते हैं। सरकार के विभिन्न विभागो में नियुक्त मझले दर्जे के अधिकारी भी विभागाध्यक्ष या विभागीय सचिव का कृपा-प्रसाद प्राप्त कर अपनी सन्तति को राज्य-सेवा में प्रवेश कराने में सफल हो जाते हैं। कितने ही कनिष्ठ अधिकारी एक-दो ज्योतिषियों और तान्त्रिकों को अपने साथ रखकर आला अफसरों और नेताओं से अपने निजी संबंध उस तापमान पर बना लेते हैं, जहाँ मनोरथ-सिद्धि सहज हो जाती है। राजस्थान लोक सेवा आयोग का तो जिस तरह राजनीतिकरण हुआ हैं, उसके बारे में तो जितना कहा जाए उतना ही कम है। हालात जो भी और जैसे भी हैं, वर्तमान शासन से यह अपेक्षा करना अनुचित नहीं होगा कि कम से कम इस ‘डिजायर-प्रणाली’ को तो अविलम्ब समाप्त कर दे और विभिन्न वर्गों के राज्यसेवियों के लिए एक कारगर और व्यावहारिक स्थानान्तरण नीति का निर्माण अविलम्ब करे।

सोमवार, 4 जून 2012

एक खुला ख़त मैडम मारग्रेट अल्वा के नाम



परम आदरणीया मैडम मारग्रेट अल्वा जी,

एक प्रबुद्ध नागरिक और विनम्र शब्द-शिल्पी के नाते मुझे यह व्यक्त करते हुए बहुत सुखद प्रतीति होती है कि आप जैसी विदुषी और जन-जीवन की नब्ज पहचानने वाली महीयसी ने राजस्थान के राज्यपाल का पद-भार ग्रहण किया है। संसद में लम्बी पारियाँ खेलने और केन्द्र सरकार में विभिन्न मंत्रालयों की राज्यमंत्री के रूप में दीर्घ अनुभव से सम्पन्न आपकी शख्सियत अपने आप में बहुत विलक्षण और विशिष्ट रही है। इसलिए आपसे यह अपेक्षा करना स्वाभाविक ही है कि आप राजभवन में सादगी,  संवेदनशीलता और कर्त्तव्य परायणता की ऐसी परम्पराएं स्थापित करेंगी जो अनुसरणीय होंगी।

आपको अप्रिय न लगे तो कहना चाहूँगा कि हमारे देश के राज्यपालों के राजभवन तत्वतः राजसी वृद्ध-निवास ही सिद्ध हो रहे हैं। ये राजभवन अपनी लोक-सेवा तथा भव्यता के लिए नगण्य और अपनी चाकचक्य के लिए अधिक जाने जाते है। जहाँ तक राजस्थान के राज्यपालों का संबंध है,  कुछ अपवादों को छोड़कर यहाँ श्रेष्ठतम बौद्धिक सम्पदा से सम्पन्न राज्यपाल रहे हैं। किन्तु आपकी सूचनार्थ एक राज्यपाल ऐसे भी आये जिन्होंने अपने पदार्पण के साथ ही मर्सीडीज गाड़ी की मांग कर डाली। तब समूचा प्रदेश घोर अकाल की चपेट में था,  पर ऐसे में भी लगभग हठधर्मिता के साथ वे मर्सिडीज प्राप्त करके ही रहे। उसमें बैठने का सुख आप चाहेंगी, तो आपको भी सुलभ होगा ही,  पर अन्य विकल्प भी सामने हैं। हमारे प्रातः स्मरणीय प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा राज्यपालों की शाही जीवन शैली पर की गई यह टिप्पणी दृष्टव्य है, जो उन्होंने 28 जून, 1958 को सभी राज्यपालों को लिखे अपने पत्र में की थी। उन्होंने कहा था कि जिस ढंग से हमारे गवर्नर्स बाहर निकलते हैं और जिस शान-शौकत से उनके आगे-पीछे गाड़ियाँ चलती हैं,  राजमार्गों पर ट्रेफिक को रोक दिया जाता है, उससे लगता है जैसे वे कोई जंग लड़ने जा रहे हों। नेहरू का कथन था कि राजभवनों में ए.डी.सी. राज्यपालों को सारे नियम, कानून और प्रोटोकोल समझाते हैं। लगता है जैसे वे पूर्णतः उन पर निर्भर हों। विदेशों का हवाला देते हुए उन्होंने अपने पत्र में कहा कि स्कैंडेवियन देशों के महाराजा भी हमारे राज्यपालों की तुलना में अधिक सादगी से रहते हैं। नेहरूजी के पत्र का सार यही था कि एक राजपाल का सर्वोपरि कर्त्तव्य अपने राज्य में ‘गुडगवर्नेंस’ को सुनिश्चित करना और यह देखना है कि वे आम लोगों से अधिक से अधिक मिलें और इस धारणा को विलोपित करें कि गवर्नर कोई सामान्य जन न होकर विशिष्ट विभूति है। इस दृष्टि से नेहरू जी के वे पत्र परम पठनीय हैं।

माननीया,  आप एक ऐसे राज्य की राज्यपाल हैं,  जहाँ सामन्ती परम्पराएं आज भी टूटी नहीं हैं और सत्ता के केन्द्र चाटुकारों और दरबारियों से घिरे रहते हैं। इस प्रदेश में आज भी गरीबों,  वंचितों, शोषितों और आर्थिक दृष्टि से निर्बल वर्गों का बड़ा जन-समुदाय है। फिर भी यहाँ के राज्यपाल पुराने अंग्रेजी लाट साहबों की तरह गर्मियों में माउन्ट आबू में अपना प्रवास करते रहे हैं, जबकि राजभवन आज पूर्णरूप से एयर-कन्डीशन्ड है। करोड़ों रूपयों की धनराशि आबू में ग्रीष्म गुजारने के इस इम्पीरियल शौक पर बर्बाद हो चुकी है। पर हमारी संवेदनाएं भोंथरी हो चुकी है।

राज्यपाल होने के नाते आप विभिन्न विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति भी हैं, जहाँ उच्चतर शिक्षा का स्तर तो गिरता ही जा रहा है, शिक्षकों के सदाचरण का भी इतना क्षरण हो चुका है कि कुछ मानसिक रोगी प्रोफेसर्स अपनी छात्राओं को पीएच.डी. दिलाने के लिए कथित रूप से उनसे दैहिक समर्पण की मांग भी कर बैठते बताये जाते हैं। मीडिया में छपी खबरें इसकी साक्षी हैं। इसलिए बहुत जरूरी है कि आप हालात का प्रामाणिक जायजा लें और ऐसे कारगर कदम उठायें, जिनसे हमारे विश्वविद्यालयों में ज्ञान की उपासना का लक्ष्य सर्वोपरि हो। आप चूँकि राज्याध्यक्ष की भूमिका में हैं, आप राज्य के ख्यातनाम रहे शोध संस्थानों, प्राचीन पांडुलिपि भंडारों और हमारी विरासत को सहेज कर रखने वाले संग्रहालयों और प्राचीन स्मारकों की सुरक्षा पर भी शासन को सावचेत करें, जो अब तक बहुत उपेक्षित रहे हैं।

मुझे याद पड़ता है कि अमरीका के दिवंगत राष्ट्रपति कैनेड़ी अपने कार्यकाल में समय-समय पर व्हाइट हाउस में नोबेल पुरस्कार विजेता विद्वानों और वैज्ञानिकों को दावत पर आमंत्रित कर उनके साथ विचार-विमर्श करते थे। इससे प्रेरणा लें, तो आप भी समय-समय पर राज्य के विशिष्ट बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों आदि को आमंत्रित कर उनके साथ राज्य में लोक-हित से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श कर ‘गुड गवर्नेन्स’ में अपना योगदान कर सकती हैं।

क्षमा चाहता हूँ कि मैंने अपने पत्र में आपको ‘महामहिम’  के विशेषण से संबोधित नहीं किया, चूँकि मैं मानता हूँ कि ये अलंकरण भी आज के हमारे लोकतान्त्रिक मूल्यों को दृष्टिगत रखते हुए अप्रासंगिक हो गये हैं। मैंने हमारे समाचार-पत्र के कॉलम्स के माध्यम से आपको यह खुला पत्र लिखने की धृष्टता इसलिए की कि राजभवन को राज्यपाल के विशिष्ट ध्यानाकर्षण के लिए जो पत्र भेजे जाते हैं, प्रायः उनकी अवज्ञा होती रही है या बहुत कनिष्ठ स्तर के किसी अधिकारी द्वारा एक रूटीन और जड़ता भरा जवाब भेज दिया जाता है। उम्मीद है कि आपकी कार्यशैली में ऐसी विसंगति नहीं होगी। विश्वास है कि आप इस पत्रकारीय पत्र को पढ़ेंगी और मुझसे कोई अविनय हुई हो तो क्षमा करेंगी।

भवदीय,

डॉ मनोहर प्रभाकर