रविवार, 16 दिसंबर 2012

कितने विलक्षण थे वे पेथोलॉजी प्रोफेसर


चिकित्सा शास्त्र में एक ऐसी मनोवैज्ञानिक बीमारी का उल्लेख है,  जिसके रोगी को,  चाहे वह कितना ही भद्रजन हो,  चुपके-से छोटी-मोटी मन पसंद चीज़ चुरा लेने में पराक्रम बोध होता है। कहते हैं, इंग्लैण्ड के एक शहज़ादे को यही रोग था। इसलिए जब कभी वे सेवकों के साथ शॉपिंग   पर जाते थे और किसी प्रिय स्टोर पर खरीदारी करने लगते थे, तो सेवक और सेल्स काउण्टर के प्रभारी इधर-उधर हो जाते थे। इस बीच शहज़ादा नज़र चुरा कर अपनी पसंद की चीज़ें ओवर कोट में डाल लेता था। उनके जाने के बाद जो भी वस्तुएं वहां से मिसिंग पाई जातीं,  उनका बिल राज भवन को भेज दिया जाता था। कुछ ऐसा ही रोग बताया जाता था पेथोलॉजी के एक अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रोफेसर को, जो कभी जयपुर में ही निवास करते थे। उनकी असाधारण प्रतिभा का आलम यह था कि उन्होंने पेथोलॉजी के क्षेत्र में शीर्षतम उपाधियां प्राप्त की थीं और श्रेष्ठतम कोटि का शोध कार्य किया था। यही कारण था कि वे सीधे प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किए गए थे। खद्दर का धोती कुर्ता पहनने वाले वे मेडिकल कालेज के एक ही विचित्र प्राध्यापक थे। एक आइ.ए.एस. अधिकारी के ज़रिए मैं उनके निकट सम्पर्क में आया था। उनके साहित्यानुराग के कारण वे मेरे पास अक्सर आते रहते थे। मैं स्तंभित रह गया था,  जब मैंने उन्हें प्राच्य विद्या विदों और संस्कृत विद्वानों के एक सेमिनार में धारा प्रवाह संस्कृत में बोलते देखा। वे सचमुच अपने विषय के अतिरिक्त संस्कृत के उद्भट विद्वान भी थे। उनकी परिकल्पना एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा हिन्दी के माध्यम से संभव बनाने की थी। प्रयोगात्मक रूप से उन्होंने ‘’प्रज्ञान’  के नाम से एक पत्रिका भी निकाली थी।

टी.पी. भारद्वाज के नाम से विख्यात् ये प्रोफेसर मेडिकल कॉलेज में अपने विभाग के लिए की गई बड़ी खरीद के सिलसिले में वित्तीय अनियमितताओं में फॅंस गए। भ्रष्टाचार विभाग द्वारा धरपकड़ हुई। जांच का लम्बा सिलसिला चला। जैसा कि प्रवाद प्रचलित था,  जांच के दौरान उन्होंने एक बार कुछ कागज़ जांच अधिकारी के हाथ से छीन कर मुंह में चबा लिए और निगल गए। उनका निलम्बन हुआ। कई बरस जांच चलती रही। बेचारे बड़े परेशान थे। अक्सर ऐसा देखा गया है कि इस कोटि के विशिष्ट विद्वान् प्रशासनिक मामलों में शातिर न होने के कारण ऐसे कुचक्रों में फॅंस ही जाते हैं। डा. भारद्वाज ऐसे ही अभागों में थे। लम्बी एन्क्वाइरी के बाद उन्हें कुछ प्रकरणों में दोषी पाया गया और शासन के शीर्ष स्तरों पर पड़ताल के बाद कार्मिक विभाग ने उनके लिए यह दण्ड तज़बीज़ किया कि उन्हें रीडर के पद पर पदावनत कर दिया जाए। इस प्रस्तावित दण्ड पर लोक सेवा आयोग की सहमति भी आवश्यक थी। पत्रावलि आयोग को डिस्पैच होने वाली थी कि डा. भारद्वाज मेरे पास भागे हुए आए। वे हाइकोर्ट जाने की तैयारी मानसिक रूप से कर चुके थे। मैंने उन्हें थोड़ा ठंडे दिमाग से समझाया-‘डा. साहब, आपकी नियुक्ति सीधे प्रोफेसर के पद पर हुई थी। आप लेक्चरर से रीडर और रीडर से प्रोफेसर नहीं बने थे। दण्ड स्वरूप नीचे के पद पर उसे डिमोट किया जाता है,  जो प्रमोशन से ऊपर गया हो। सरकार आपको पदावनत करने की कानून सम्मत स्थिति में नहीं है। वह या तो आपकी सेवाएं समाप्त करे या आपको पुनः प्रोफेसर के पद पर स्थापित करे। डा. भारद्वाज को मेरा तर्क उचित लगा। उन्होंने मामला लोक सेवा आयोग में जाने पर आयोग-अध्यक्ष से भेंट कर अपना तर्क रखा। उनका तर्क विवेक सम्मत था। डा. भारद्वाज की योग्यता का दूसरा व्यक्ति सहज ही उपलब्ध नहीं होने वाला था। अन्ततः कुछ वेतन वृद्धियां खो कर ही सही,  डा. भारद्वाज अपनी  जंग में विजयी रहे।

अनुमान है कि साल-दो साल बाद वे जोधपुर मेडिकल कॉलेज में प्रिन्सिपल हो कर चले गए। एक दिन शाम तक भारद्वाज अपने बंगले पर नहीं लौटे। खोज-बीन शुरु  हुई। उनकी कार कॉलेज के मार्ग में एक पेड़ से टकराई हुई दिखाई दी। नज़ारा हृदय विदारक था। डा. टी.पी. भारद्वाज के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। विशेषज्ञों ने निर्णय दिया कि उन्हें फेटल हार्ट अटैक हुआ था। एक विद्वान् प्रोफेसर की यह दुःखान्तिका सभी परिचितों के लिए त्रासद थी।

अज्ञेय जी के साथ आचमन



    ज़िन्दगी का यह तमाशा  कुछ पहर है ।
             भूल मत यह तो जनाज़े का सफर है ।।

राजस्थान के यशस्वी कवि और साहित्यकार स्वर्गीय प्रकाश  आतुर की ये पंक्तियां  उनकी स्मृति के साथ रह रह कर याद आती हैं। प्रकाश  भाई का रोम-रोम प्रबल जिजीविषा की उत्ताल तरंगों से तरंगायित रहता था। हर समय गर्म जोशी  के साथ मिलना और कहकहे लगाना  उनके व्यक्तित्व की बुनावट का बेहद खूबसूरत हिस्सा था,  पर वे जीवन की क्षण भंगुरता के प्रति भी हर समय सजग रहते थे और कदाचित् यही कारण था कि वे हर दिन को उत्सव की तरह व्यतीत करते थे। वे भोर की पहली किरण के साथ गुनगुनाते उठते थे और शाम की तन्हाइयों को ज़िन्दादिल दोस्तों की सोहबत और उनके साथ होने वाली चुहलबाज़ी और आपान गोष्ठियों के आयोजन से आनन्दमय बना लेते थे।

मैं अकेला ही ऐसा व्यक्ति नहीं हूं,  जिसके साथ प्रकाश  आतुर के अन्तरंग रिश्ते  थे। बाड़मेर से ले कर बांसवाड़ा तक बीसियों सृजनधर्मी उनकी मैत्री की उस परिधि में समाविष्ट थे,  जिसका विस्तार निरन्तर होता ही रहता था।

आज उनके पुण्य स्मरण के समय मुझे एक ऐसे प्रसंग का ध्यान सहसा आ जाता है,  जिसे विस्मृत कर देना मेरे लिए कठिन होगा।

राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के रूप में प्रकाश आतुर के साहित्यिक रिश्तों  का विस्तार बहुत हो गया था और उन्हीं के लोकप्रिय व्यक्तित्व के कारण राजस्थान के साहित्यिक बन्धुत्व ने भी बहुत प्रसार पाया था। बड़े-बड़े लेखक उनके आग्रह को टाल नहीं सकते थे । कुछ वर्षों पहले की बात है - माउण्ट आबू में एक लेखक सम्मेलन का आयोजन किया गया था,  जिसमें अज्ञेय जी विशिष्ट  अतिथि थे। अज्ञेय जी का व्यक्तित्व भारतीय लेखक समुदाय में अपूर्व था। उनकी शान  और उनके सृजन की धाक तो थी ही, उनका वाणी संयम भी गज़ब का था। बहुत कम बोलते थे,  बहुत कम खुलते थे। अनेक बार उनके इस संयम को ‘स्नॉबरी’  भी समझा जाता था। उस दिन 26  जून थी। रात्रि को मैंने उन्हें बताया कि आज प्रकाश  जी का जन्म दिन है। वे सुन कर बड़े प्रसन्न हुए। इतनी देर में प्रकाश भाई जी भी आ पहुंचे और अज्ञेय जी से अनुरोध किया कि कुछ समय हमारे साथ रह कर आशीर्वाद प्रदान करें। प्रकाश  जी के कक्ष में आकस्मिक आगन्तुकों के कारण विघ्न हो सकता था,  इस आशंका  से आयोजन मेरे कक्ष में रखा गया। अज्ञेय जी, प्रकाश  भाई,  सावित्री परमार और हमारे आत्मीय मित्र ओम थानवी उस अनौपचारिक जन्मोत्सव में शामिल थे। लोगों को बड़ा आश्चर्य  हुआ, जब हमने बताया कि प्रकाश जी का जन्म दिन होने के कारण अज्ञेय जी ने हमारे आग्रह पर चषक ग्रहण कर हमारी हैसियत में इज़ाफा किया था।

कुछ अरसे पहले अज्ञेय जी के शताब्दी वर्ष में ओम  थानवी जी ने, जो अज्ञेय जी के बहुत निकट रहे थे,  उनके संस्मरणों के दो खंड ’अपने-अपने अज्ञेय’  शीर्षक से प्रकाशित किए थे।  पृथुल कलेवर वाले ये संस्मरण-संकलन दो खंडों में प्रकाशित किए गए हैं। वाणी प्रकाशन द्वारा किए गए इस साहसिक उपक्रम की सराहना निश्चित ही की जानी चाहिए, किन्तु पंद्रह सौ रुपए के मूल्य के प्रत्येक खंड की पहुंच सामान्य पाठक तक न हो कर केवल पुस्तकालयों तक ही हो सकेगी।

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

समस्याएं सत्तर के पार पेन्शनर्स की


वैसे तो राज्य सरकार के आदेश हैं कि जिस दिन भी राज्य कर्मचारी सेवा-निवृत्त हो, उसकी पेन्शन, ग्रेच्युटी, लीव-एनकैशमैन्ट आदि के सारे कागजात उसी दिन डिलीवर कर दिये जाने चाहिए, किन्तु यह तथ्य भी छिपा नहीं है कि अनेकानेक कारणों से उनकी इन प्राप्तियों में अडंगे लगते रहते हैं और पीड़ित व्यक्तियों को न्यायालयों की शरण भी लेनी पड़ती है। बहरहाल!

समस्यायें गौर तलब उन पेन्शनर्स की हैं, जो सत्तर के पार पहुँच चुके हैं। उनमें 75  से लेकर 80-85  और 90-95  तक की आयु के पेन्शनर्स हैं, जो शारीरिक रूप से नितान्त असमर्थ हो चुके हैं। इनमें अच्छी खासी संख्या पारिवारिक पेन्शन प्राप्त करने वाली विधवाओं की है। इस आयु वर्ग के पेन्शनर्स को अपनी पेन्शन प्राप्त करने में कितनी कठिनाइयाँ होती हैं, इसका अनुमान कदाचित् राज्य के पेन्शन विभाग को भी नहीं है। किस प्रकार पहली तारीख को या इसके बाद ये बुजुर्ग पेन्शनर्स बसों में धक्के खाते हुए विभिन्न बैंकों तथा पेन्शन डिस्बर्समैन्ट केन्द्रों तक पहुँचते हैं, इस पीड़ा को मुक्त भोगी लोग ही जानते हैं। इतनी अधिक आयु के पेन्शनर्स में कुछ तो हतने अशक्त हैं कि उनसे चला भी नहीं जाता। बड़ी उम्र के इन लोगों में अधिकांशतः किसी न किसी बीमारी से पीड़ित होते हैं। उनके हाथों की अँगुलियाँ काँपने लगती हैं। बैंक में स्पेसीमैन सिग्नेचर नहीं मिलते, तो दिक्कत होती है, बार-बार हस्ताक्षर कराये जाते हैं। पेन्शन राशि लेने की प्रक्रिया में ही दिन पूरा हो जाता है।

वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण का जो कानून राज्य में लागू हुआ है, उसके नियमों में यह भी प्रावधान है कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए गरिमापूर्ण और सुविधापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट नियमों में प्रावधित कर्तव्यों के अतिरिक्त और भी बिन्दु जोड़ सकते हैं। ऐसे में क्या यह व्यवस्था नहीं की जा सकती कि हर जिले में ऐसा तन्त्र विकसित किया जाय, जिसके माध्यम से 70  से लेकर ऊपर की अधिकतम आयु के पेन्शनर्स की पेन्शन उनके निवास पर ही भुगतान कर दी जाये। सरकार को इसके लिए कोई तन्त्र विकसित करने के लिए अतिरिक्त कार्मिक व्यवस्था करने की आवश्यकता भी नहीं होगी। सरकार के कितने ही विभाग ऐसे हैं, जिनमें आवश्यकता से अधिक कर्मचारी हैं और वे अधिकांश समय में मस्ती ही मारते रहते हैं। ऐसे कर्मचारियों को उन विभागों से लेकर लेखा सेवा के किसी अधिकारी के अधीन इस सेवा-कार्य में लगाया जा सकता है।

60  से 65 वर्ष की आयु तक के कुछ पेन्शनर्स को भी तर्कसम्मत पारिश्रमिक देकर उनकी सेवाओं का उपयोग इस कार्य के लिए किया जा सकता है। नगर निगम के अन्तर्गत जितने जोन्स हैं, उन्हें ध्यान में रखकर प्रत्येक जोन के लिए ऐसे पेन्शन-वितरक तैनात किये जा सकते हैं। इस प्रकृति की व्यवस्था में किसी तरह की त्रुटि, विलम्ब, या भ्रष्टाचरण न हो, इसके लिए ‘इन बिल्ट सेफ गार्ड’  सावधानीपूर्वक रखे जा सकते हैं। आशा की जानी चाहिए कि राज्य का वित्त विभाग पूरी संवेदनशीलता के साथ ऐसे किसी तन्त्र को स्थापित करने की पहल करेगा।

बुजुर्गों पर बढ़ते अत्याचारः निवारण कैसे हो ?


हमारे जन-जीवन में आदर्श और आचरण के बीच जितनी गहरी खाई है, उसका शब्दों में बखान करना मुश्किल है। हम लोग तरह-तरह के दिवस मनाते हैं। प्रेम दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस, पर्यावरण दिवस और न जाने क्या-क्या दिवस। इन दिवसों के पीछे भावनात्मक प्रेरणा और शक्ति कितनी है, यह तो हम व्यावहारिक रूप से जानते ही हैं। इन दिवसों पर छपने और बँटने वाले कार्डों का भी करोड़ों का कारोबार होता है, जिसका तात्पर्य प्रकटतः यही है कि हमने मनुष्य के अन्तर्मन की भावनाओं को भी तिजारत में बदल दिया है। मीडिया भी इन दिवसों पर अपना धन्धा करने से नहीं चूकता। फिर भी यह सन्तोष का विषय है कि समय-समय पर हमारे समाचार पत्र सामाजिक सरोकारों के मुद्दों को सुर्खियों में छापते हैं। पितृ दिवस अभी दो दिन पूर्व ही गया है और उससे कुछ दिन पूर्व समाचार पत्रों में हैल्पेज इन्डिया के अध्ययन की एक रिपोर्ट छपी है, जिसमें कहा गया है कि बुजुर्ग लोग अपनी पुत्र-वधुओं की तुलना में पुत्रों द्वारा अधिक सताये जाते हैं। हैल्पेज इन्डिया बड़ी प्रतिष्ठित समाजसेवी संस्था है और उसके निष्कर्ष विश्वसनीयता के निकट होने चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार 31  फीसदी बुजुर्गों को उनकी बहुएं नहीं, बल्कि उनके बेटे दुःखी करते हैं। बुजुर्गों के उत्पीड़न के लिए केवल 23  फीसदी बहुएं जिम्मेदार हैं, जबकि 57  प्रतिशत बेटे अपने नृशंस व्यवहार के लिए उत्तरदायी हैं। हैल्पेज इन्डिया की यह रिपोर्ट 20  शहरों में करीब 6000  बुजुर्गों से साक्षात्कार करके तैयार की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में बुजुर्गों को सताने और परेशान करने के कसूरवार उनकी बहुओं से ज्यादा उनके अपने बेटे हैं। हर शहर में यही ट्रेंड देखा गया, जो हैरान करने वाला था। सर्वे में हर इनकम ग्रुप और एजुकेटेड क्लास के लोगों की राय ली गई। सभी में ट्रेंड एक जैसे दिखाई दिए।

बुजुर्गों के लिए मुश्किल भरे शहरों में भोपाल सबसे आगे है, यहां 77.12  फीसदी बुजुर्ग परेशानी झेलते हैं। सबसे बेहतर स्थिति जयपुर की दिखी, जहां यह आंकड़ा सिर्फ 1.67  फीसदी है। यह मुद्रण की त्रुटि भी हो सकती है।

यदि ऐसा नहीं है तो, जयपुर का यह आँकड़ा चौंकाने वाला है, क्योंकि आये दिन माता-पिताओं के उत्पीड़न की जैसी खबरें छपती रहती हैं, उसे दृष्टिगत रखते हुए यह धारणा नितान्त अविश्वसनीय प्रतीत होती है। वैसे भी सैम्पल सर्वे की अपनी सीमाएं होती हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि राज्य में केन्द्र द्वारा पारित माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम-2007  लागू किये जाने और उसके अन्तर्गत नियम बन जाने के बाद इस कानून के तहत बुजुर्ग लोग राहत के लिए आवेदन करने से कतराते हैं, जिसके पीछे उनका यही भय छिपा रहता है कि ऐसा करने से उनके परिवार का अपयश होगा। किन्तु इस तरह की भावना को निर्मूल करने और इस कानून के प्रावधानों का व्यापक प्रचार-प्रसार करने की दिशा में सरकार और सोशल एक्टीविस्ट दोनों ही निष्क्रिय प्रतीत होते हैं। चूँकि अभी इस संबंध में जन-मानस में जागरूकता नहीं आई है, जिला मजिस्ट्रेटों के लिए यह अनिवार्य है कि वे उपनियम (2) और (3)  में उल्लिखित कर्तव्यों और शक्तियों का प्रयोग यह सुनिश्चित करने के लिए करें कि अधिनियम के उपबन्धों का उनके जिले में समुचित रूप से क्रियान्वयन किया जा रहा है। जिला मजिस्ट्रेटों के मुख्य कर्तव्य उक्त प्रावधान के अन्तर्गत निम्न प्रकार हैं -

1. यह सुनिश्चित करना कि जिले के वरिष्ठ नागरिकों का जीवन और सम्पत्ति सुरक्षित है और वे सुरक्षा और गरिमा के साथ जीवन-यापन करने में समर्थ है;

2. भरण पोषण के आवेदनों के यथासमय और उचित निपटान और अधिकरणों के आदेशों के निष्पादन को सुनिश्चित करने की दृष्टि से जिले के भरण पोषण अधिकरणों और भरण पोषण अधिकारियों के कार्य का निरीक्षण और मॉनीटर करना;

3. जिले के वृद्धाश्रमों के कार्यकरण का निरीक्षण और मॉनीटर करना ताकि यह सुनिश्चित किया जाये कि वे इन नियमों और राज्य सरकार के अन्य मार्गदर्शक सिद्धान्तों और आदेशों में अधिकथित मानकों के अनुरूप हैं;

4. अधिनियम के उपबंधों और वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों के कार्यक्रमों के नियमित और व्यापक प्रचार को सुनिश्चित करना;

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सरकार के संबंधित विभाग वरिष्ठ नागरिकों के गरिमापूर्ण जीवन को सुनिश्चित करने के लिए कानून के प्रावधानों की जानकारी समाचार पत्रों और टी.वी. चैनल्स पर डिस्प्ले विज्ञापनों के जरिये घर-घर पहुँचायें और जो वास्तविक हालात हैं उनका सर्वेक्षण भी करायें। गैर सरकारी स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस दिशा में बहुत कुछ योगदान कर सकती है। आशा है, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जो न केवल मन से बहुत संवेदनशील हैं, अपितु अपने माता-पिता की सेवा के लिए भी बहुत चर्चित रहे हैं, राज्य में बुजुर्गों के बेहतर जीवन के लिए और अधिक कारगर कदम उठायेंगे।

आत्म-विज्ञापन में उलझी अफसरशाही


प्रशासन के ऊँचे पदों पर बैठे आला अफसरों का राजन्य भाव और समाज के सभी वर्गों पर बढ़ता उनका दबदबा अब कोई रहस्य नहीं रह गया है। राजनीति विज्ञानियों की भाषा में भले ही चुने हुए जनप्रतिनिधि  ‘स्वामी’  की संज्ञा से अभिहित होते हों और नौकरशाही की जमात ‘लोकसेवकों की बिरादरी’  कहलाती हो,  किन्तु व्यावहारिक जीवन में आलम कुछ और ही है। भर्तृहरि ने शताब्दियों पूर्व कहा था कि सेवाधर्म सामान्यजन के लिए तो क्या,  योगियों के लिए भी परम गहन है। किन्तु आज के आला अफसरों को ऐसी प्रतीति कदाचित् दूर-दूर तक नहीं होती। उनके स्वभावगत अहंकार,  सर्वज्ञता के भ्रम और राजसी शैली से तो सभी वाकिफ रहे हैं,  किन्तु हाल के वर्षों में उनमें आत्म-विज्ञापन का आसव पीकर उन्मत्त होने की जैसी उत्कट लालसा देखने में आ रही है,  वह चिन्तनीय है।

एक समय वह था,  जब सरकार के बड़े अफसर भले ही कितने सुविधाभोगी रहे हों,  किन्तु आत्म-प्रचार की व्याधि से ग्रस्त नहीं थे। मुझे याद आता है,  पाँच दशक से अधिक समय पूर्व का वह प्रसंग,  जब राजस्थान के सबसे लंबे समय तक मुख्य सचिव रहे स्व. भगवत सिंह मेहता ने शासन द्वारा प्रकाशित एक पत्रिका में इन पंक्तियों के लेखक द्वारा सम्पादक की हैसियत से उनका एक चित्र छापे जाने पर पत्र लिखकर आगाह किया था कि भविष्य में कभी भी सरकारी अधिकारियों के चित्र विकास विभाग की उस पत्रिका में न छापे जायें। किन्तु बदलाव कितना आ गया है कि पिछले दिनों एक सरकारी विभाग की पत्रिका में उनके अपने शासन सचिव और विभागाध्यक्ष के ही एक दर्जन से अधिक चित्र प्रकाशित किये गये थे। ऐसी एक नहीं अनेक शासकी पत्रिकाएं और समय-समय पर प्रकाशित होने वाले सामयिक प्रकाशन आपकी दृष्टि से गुजर जायेंगे, जिनमें सरकार के आला अफसरों की तस्वीरें बड़ी संख्या में आये दिन अनिवार्य रूप से छपती रहती हैं।
मजे की बात तो यह है कि आजकल किसी भी सरकारी विभाग या गैर सरकारी संस्थान का कोई भी सार्वजनिक आयोजन हो, विभागीय मंत्रियों के साथ विभागीय सचिव और विभागाध्यक्ष भी समारोह में विशिष्ट अतिथि बनते हैं और अध्यक्षता करते हैं। इतना ही नहीं नेताओं को जिस प्रकार शाल ओढ़ाकर या सिर पर साफा पहनाकर सम्मानित किया जाता है,  उसी तर्ज पर अधिकारियों का भी सार्वजनिक सम्मान किया जाता है। बात चाहे राज्य की राजधानी की हो या कि किसी प्रदेश के जिला क्षेत्रों की,  परिदृश्य वही नजर आता है। जिला कलक्टर तो आये दिन ही इस प्रकार के समारोहों को अपनी उपस्थिति से उपकृत करते रहते हैं। ऐसे अवसरों पर निकलने वाली स्मारिकाओं और पुस्तिकाओं में उनके नयनाभिराम चित्र भी सैकड़ों की संख्या में देखने को मिल जायेंगे। इतना ही नहीं,  आला अफसरों के संदेशों से भी सभी सरकारी और गैर-सरकारी प्रकाशन भरे रहते हैं,  जिनके साथ अनिवार्य रूप से उनके चित्र लगे होते हैं। प्रायः प्रत्येक राज्य के सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय के अन्तर्गत कार्य कर रहे जिला जनसंपर्क अधिकारी तो जिला कलक्टरों के भाषण और तस्वीरें आंचलिक साप्ताहिकों और पाक्षिकों में छपाकर उनका कृपा-प्रसाद पाने में ही अपने कर्म की सार्थकता समझते हैं। राज्य की राजधानियों और बड़े नगरों में होने वाले साहित्यिक,  सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों पर यदि दृष्टि डालें,  तो अक्सर दूरदर्शन,  आकाशवाणी और सूचना निदेशालयों के अधिकारी मंच पर मुख्य अतिथि,  विशिष्ट अतिथि या अध्यक्ष के रूप में बिराज रहे होंगे। आयोजकों द्वारा मंच पर उन्हें सुशोभित करने का मंशा एक ही होता है कि उनके कार्यक्रम को प्रचार मिल जाये। प्रचार की इस प्रक्रिया में संचार माध्यमों के कीर्ति पुरूषों के चित्र तो मुद्रित या इलेक्ट्रानिक मीडिया में स्वतः स्थान पा ही लेते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि राज्य शासन या केन्द्र शासन द्वारा इसका कोई नोटिस नहीं लिया जाता कि ये अधिकारी इन रस्मी आयोजनों के उद्घाटन और समापन समारोह में राज-काज को परे रखकर अपना कितना समय बर्बाद करते हैं। यूंकि इस कोटि के अधिकारी प्रायः सरकारी वाहनों में ही ऐसे आयोजन स्थलों पर जाते हैं, इसलिए वाहनों का दुरूपयोग भी प्रकटतः होता ही है। पिछले डेढ़-दो दशकों में आला अफसरों में आत्म-प्रचार की यह प्रवृत्ति इतनी तेजी से बढ़ी है कि वह राजनेताओं की आत्म-विज्ञापन-कामिता से होड़ लगाती है। राज्य कोष में निरन्तर सेंध लगाने वाले ये उच्च वेतन भोगी आला अफसर इन प्रचारात्मक प्रवृत्तियों में कितनी ऊर्जा,  समय और सार्वजनिक धन का अपव्यय करते हैं,  इसकी कल्पना की जा सकती है। क्या सरकारें अपने इन लोकसेवकों पर उनकी इस आत्म-प्रचारात्मक मानसिकता को तोड़ने और उनके द्वारा जनप्रतिनिधियों के साथ समारोहों में मंचस्थ होने पर कोई अंकुश नहीं लगा सकती?

इतना ही नहीं,  विशेष अवसरों और अभियानों के दौरान जो बड़े-बड़े विज्ञापन मंत्रियों के नयनाभिराम चित्रों और उपलब्धियों के अतिरंजित आंकड़ों के साथ छापे जाते हैं,  उनमें भी अनेक बार आयोजनकर्ताओं में नौकरशाही की चाटुकारिता के अभ्यस्त लोग आला अफसरों के फोटोग्राफ छपाते रहते हैं। पीछे मुड़कर देखें, तो स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश के पुर्ननिर्माण की दिशा में नेहरू युग में जो कार्य हुआ,  उसकी उपलब्धियों के आंकड़े और उनके साथ बड़े-बड़े चित्र कभी भी उस बेहूदा ढंग से नहीं छापे गये जिस तरह से आजकल छापे जा रहे हैं। आज के वरिष्ठ नागरिकों को वह युग भूला नहीं है,  जब कभी भी न तो सरकारी उपलब्धियों के बड़े-बड़े इश्तहारों पर करोड़ों रूपये स्वाहा किये जाते थे और न गाहे-बगाहे छपने वाले प्रचारात्मक विज्ञापनों में कभी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू,  सरदार पटेल या गोविन्द वल्लभ पंत के चित्र छपते थे। किन्तु अब तो नेताओं की तो बात ही क्या है विभिन्न आयोजनों के अवसरों पर छपने वाले विज्ञापनों में जिला स्तर तक के अधिकारियों के चित्र धड़ल्ले से छप रहे हैं।

इन दिनों एक और रोग बड़ा तेजी से फैल रहा है। देश में अनेक व्यक्ति और संस्थाएं सम्मानों का कारोबार कर रही हैं। बीसियों ऐसी संस्थाएं महानगरों में बनी हैं,  जिनके संरक्षक अधिकांशतः अब महत्वहीन हो चुके बड़े नेता, पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद हैं। ये संस्थाएं और इनसे जुड़े चालाक व्यक्ति नाना प्रकार के सम्मानों का आयोजन करते हैं और विविध क्षेत्रों में सेवाओं के लिए विभिन्न वर्गों के लोगों को मोटी रकम लेकर सम्मानित करने की तिजारत करके अपनी तिजोरियां भरते रहते हैं। उनकी व्यूह रचना ही यह होती है कि वे ऐसे पुरस्कारों और सम्मानों का बड़ा प्रभावशाली नामकरण करते हैं और फिर उसके लिए ऐसे यशपिपासु ढूंढते हैं,  जो अक्ल के अंधे और गांठ के पूरे होते हैं। सम्मानों के इस कारोबार को पनपाने में वे आला अफसर भी बड़े सहायक होते हैं,  जो स्वयं इन सम्मानों और अलंकरणों को निःशुल्क प्राप्त कर अपने को धन्य समझते हैं। इन सम्मानों के कारोबारी और धंधेबाज लोगों की रणनीति ही यह होती है कि वे कुछ आला अफसरों को सम्मान के इस मोहजाल में फांसें,  ताकि वे उनके नामों का उल्लेख करके कुछ ऐसे धनी लोगों को भी फांस सकें जो विभिन्न व्यवसायों में लगे रहने के साथ मिथ्या  सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के व्यामोह में ऐसे विकृत सम्मान प्राप्त करने के लिए मोटी रकम दे सकें। अभी कुछ वर्षों पहले ही अपने एक परिचित व्यवसायी को ऐसे ही तथाकथित राष्ट्रीय सम्मान से दिल्ली में सम्मानित किया गया था और उनके साथ कुछ आला अफसर भी सम्मानित हुए थे। अपने उन परिचित व्यवसायी की भव्य तस्वीर जब मैंने एक समाचार पत्र में छपी देखी,  तो मैंने उन्हें फोन पर बधाई देना चाहा तो उनसे यह दुखड़ा रोये बिना नहीं रहा गया कि वह सम्मान प्राप्त करने और फोटो छपाने में उन्होंने पूरे 50,000  हजार रूपये व्यय किये हैं।

ऐसे आला अफसरों की भी कमी नहीं हैं जो अपने को बड़ा कवि या गायक समझने की भ्रान्ति पाले रहते हैं। अक्सर ऐसे नौकरशाह कवि कार्यालय समय में भी अपना काव्य पाठ अपने मित्रों और सहधर्मी अधिकारियों के सामने करने से बाज नहीं आते। अपने प्रभाव का उपयोग करके वे न केवल अपनी घटिया किस्म की तुकबन्दियों के संकलन छपाते रहते हैं,  बल्कि पुरस्कार और सम्मान प्राप्त करने की टोह में भी रहते हैं। आला अफसरों द्वारा अपने मिथ्या अहम् की तुष्टि के लिए कराई जाने वाली इस प्रकृति की वैनिटी पब्लिशिंग के सैकड़ों नमूने पुस्तक विक्रेताओं की दुकानों पर देखे जा सकते हैं। काश! राज्य सरकार अपने अफसरों के इस आत्म-विज्ञापन के व्यामोह पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक निर्देश जारी कर सके।

धन्यवाद के पात्र हैं राष्ट्रपति महोदय


वैसे तो पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी कुछ सामन्ती परम्पराओं को तोड़ा था। उदाहरणार्थ,  उन्होंने इस सामन्ती प्रचलन को बंद किया था कि राष्ट्रपति को उनके जूते कोई सेवक पहनाए,  चाहे राष्ट्रपति भवन में और चाहे समाधि स्थलों पर श्रद्धांजलि अर्पित करते समय जूते उतारने की ज़रुरत पड़ी हो। सेवकों द्वारा जूते पहनाने और जूते उतारने में उन्होंने सेवकों की सहायता का सर्वथा परित्याग कर दिया था। उसी प्रकार राष्ट्रपति भवन में इतना बड़ा अमला होते हुए भी वे स्वयं कम्प्यूटर पर बैठ कर इण्टरनेट के ज़रिए वैज्ञानिक गतिविधियों का लेखा-जोखा लेते रहते थे। उनकी यह जीवन शैली सब ओर सराही गई थी,  किन्तु हाल ही में पदासीन हुए राष्ट्रपति महोदय प्रणब मुखर्जी ने तो औपनिवेशिक शब्दावली के बहिष्कार की घोषणा करके निश्चित रूप से एक ऐसा स्तुत्य कार्य किया है,  जिसकी ओर किसी का ध्यान अब तक नहीं गया था। उन्होंने पहले तो अपने वक्तव्य में इस बात की निन्दा करते हुए कि ‘’हिज़ एक्सिलेन्सी’  और ‘’महामहिम’  जैसे शब्द हमारी मानसिक दासता के प्रतीक हैं और उनके लिए इन शब्दों का प्रयोग न किया जाए। अधिक से अधिक जहॉं नामोल्लेख ज़रूरी हो,  उन्हें ‘श्री प्रणब मुखर्जी ही कहा जाए। उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति प्रकट की थी कि राजकीय और गैर राजकीय समारोहों में जहॉं वे पधारें वहॉं उनके लिए मंच पर ऊॅंची कुर्सी न लगाई जाए। अब तो राष्ट्रपति भवन से भी औपचारिक विज्ञप्ति जारी कर दी गई है। उसमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि देशवासियों द्वारा उन्हें किसी भी प्रसंग में ‘’हिज़ एक्सिलेन्सी’  और ‘’महामहिम’  जैसे विशेषणों से अलंकृत न किया जाए। इस विज्ञप्ति में इतनी-सी व्यवस्था अवश्य की गई है कि विदेशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ जुड़े आयोजनों और कार्यक्रमों में अन्तरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल का पालन किया जाता रहेगा।

आश्चर्य की बात यह है कि जब राष्ट्रपति जी ने ‘’हिज़ एक्सिलेन्सी’  और ‘’महामहिम’  जैसे शब्दों का बहिष्कार करने की बात अपने वक्तव्य में कही थी,  उसके बाद भी देश के किसी भाग के राज्यपाल ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी और न ही ऐसा कोई संकेत किया था कि वे भी भारी भरकम उपनिवेशवादी विशेषण अपने लिए प्रयुक्त किए जाने का मोह त्याग देंगे।

   किन्तु, अब जबकि राष्ट्रपति भवन से राष्ट्रपति जी के लिए उन विशेषणों का उपयोग न करने की विज्ञप्ति जारी की जा चुकी है,  तो राज्यपालों को भी क्या इस प्रकार के निर्देश राष्ट्रपति भवन से जारी किए जाएंगे?  क्योंकि राज्यपाल सीधे वहीं से नियंत्रित होते हैं। यहां तक कि कोई राज्यपाल अपने प्रदेश की राजधानी छोड़ कर अन्यत्र जाता है,  तो उसे राष्ट्रपति भवन को सूचित करना होता है। औपनिवेशिक शब्दावली के अन्तर्गत और ऐसी  कितनी ही संज्ञाओं का प्रयोग प्रचलन में है। मिसाल के तौर पर राज्यपाल लोग जहां रहते हैं उनके निवास स्थल को राज भवन क्यों कहा जाता है, जबकि मुख्य मंत्री जहां रहते हैं,  उसे मुख्य मंत्री निवास के नाम से जाना जाता है। राज्यपाल के रहने के स्थान को भी उसी प्रकार राज्यपाल निवास के नाम से पुकारा जा सकता है। इसी प्रकार राजधानी में और ज़िला मुख्यालयों पर जहां राजन्य व्यक्तियों के निवास होते हैं,  उस क्षेत्र को सब जगह,  यहां तक कि दौसा और बारां जैसे छोटे ज़िलो में भी,  जहां कलेक्टर और ज़िला स्तर के अन्य अधिकारी रहते हैं,  सिविल लाइन्स कहा जाता है और जयपुर की सिविल लाइन्स तो मशहूर है ही। प्रकटतः इस क्षेत्र को सामान्य लोगों की बस्तियों से एक विशिष्ट बस्ती के रूप में पहचान दी गई है,  जो सर्वथा अनुचित है। सिविल लाइन्स के नाम से जो बस्तियां जानी जाती हैं,  उनका नाम किसी ऐसे व्यक्ति के नाम पर भी रखा जा सकता है,  जिनका सार्वजनिक जीवन में असाधारण योगदान रहा हो।

एक और अद्भुत बात यह है कि जब-जब भी विभिन्न आयोजन गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस,  गॉंधी जयन्ती आदि के अवसर पर सरकार द्वारा किए जाते हैं,  तो राज्य का सामान्य प्रशासन विभाग समाचार पत्रों में जनता को जिस भाषा में आमंत्रित करता है,  वह सर्वथा सामन्ती प्रकृति की होती है। हर विज्ञापन इस पंक्ति के साथ ही प्रारम्भ होता है ‘सर्व साधारण को सूचित किया जाता है कि-- प्रकटतः ‘’सर्व साधारण’  जुमले का यह प्रयोग नागरिकों की एक तरह से अवमानना ही है। इन शब्दों के प्रयोग से स्पष्टरूप से यह गंध आती है कि आमंत्रण देने वाले राजसी लोगों की दृष्टि में नगर निवासी अपने मुकाबले में कमतर होते हैं। इस तरह का प्रयोग नितांत अवांछनीय है और अविलम्ब बंद हो जाना चाहिए।

हमारी अदालतों के जो सम्मन समाचार पत्रों में छपते हैं उनमें से अधिकांश की भाषा में उसी पुराने  औपनिवेशिक युग की झलक मिलती है,  जबकि केन्द्र सरकार के विधि मंत्रालय के राज भाषा विभाग ने विशुद्ध हिन्दी में अच्छे-अच्छे मानक प्रारूप उपलब्ध करा दिए हैं।

निष्कर्षतः राष्ट्रपति महोदय को इस बात के लिए हार्दिक धन्यवाद किया जाना चाहिए कि उन्होंने राष्ट्रपति भवन से ही औपनिवेशिक विशेषणों को विदाई देने की पहल की है।    

नगर निगम के मुख्यालय में अग्नि-कांड


वैसे तो कदाचित् ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब जयपुर नगर-निगम से संबंधित कोई न कोई निन्दात्मक न्यूज स्टोरी स्थानीय समाचार पत्रों में न छपती हो। पर अभी दो दिन पूर्व नगर-निगम के मुख्यालय में हुए अग्नि-कांड में दो अनुभागों की फाइलें भस्मीभूत होने की खबर सचमुच चिन्ताजनक है। दफ्तरों में फाइलों को गुम करवा देना, दो चार महत्वपूर्ण फाइलों को निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा जलाया जाना तो समय-समय पर घटित होता रहा है। किन्तु इस प्रकार का फाइल-विनाशी अग्निकांड पहली बार ही सुना गया है। आग कैसे लगी, इसके बारे में तो स्थिति तभी स्पष्ट होगी, जब जाँच-समिति की रिपोर्ट सामने आयेगी, किन्तु यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इस अग्निकांड में मेयर-विरोधी कुछ तत्वों का हाथ जरूर है। आग लगने का कारण बिजली का शॉर्ट सर्किट हो जाना भी हो, तब भी यह जाँच का एक मुख्य बिन्दु अवश्य होना चाहिए कि आग के पूरी तरह प्रज्जवलित हो जाने और उसमें पत्रावलियाँ जलते रहने की सूचना कब और कितने विलम्ब से दी गई और अग्निशामक कार्यवाही कितने विलम्ब से शुरू हुई। जो कुछ हुआ है, वह नगर के प्रबुद्ध जनों के मस्तिष्क को आन्दोलित करने वाला है।

पीछे मुड़कर देखें तो जब से ज्योति खंडेलवाल मेयर पद के लिए चुनी गई तबसे उन्हें शान्तिपूर्ण ढंग से काम करने देने का वातावरण नगर निगम परिसर में रहा ही नहीं। विपक्षी दल के साथ सिर-फुटव्वल और सी.ई.ओ’ज. के साथ संघर्ष का सिलसिला इस तरह चलता रहा है कि नगर-निगम तत्वतः एक कलह-केन्द्र बन गया है। मेयर पर तरह-तरह के आरोप भी लगते रहे हैं और सब ओर से उनके विरूद्ध चैन-चुरैया हरकतें होती रही हैं। तथ्यात्मक और सत्यात्मक स्थिति क्या है, कहना कठिन है। पर इन हालात का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करें, तो कहना होगा कि जब जब कोई मध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग की कोई महिला किसी महत्वपूर्ण आसन पर विराजमान होती है, तो लोग उसे कम ही बर्दाश्त कर पाते हैं। विशेष रूप से अधीनस्थ पुरूष कर्मियों की तो यह प्रवृत्ति ही है कि वे महिला-विरोधी ब्यूह-रचना में पूरी दिलचस्पी लेते रहें। यद्यपि राज्य में नारी-सशक्तीकरण की दुन्दुभी बराबर बजती रही है, पर महिला सरपंचों से लेकर महिला मेयरों और महिला मंत्रियों की जो स्थिति है, उस पर दृष्टि-निक्षेप करें, तो निराशाजनक निष्कर्ष ही प्राप्त होते हैं। आलम यह है कि बरसों पहले सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किये थे कि सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही क्षेत्रों के कार्यालयों में महिला यौन-उत्पीड़न और अशिष्टाचरण पर निगरानी रखने के लिए ऐसी समितियाँ गठित की जायें जिनकी अध्यक्ष न केवल महिला ही हो, अपितु उसके सदस्यों की संख्या में भी महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व हो। पूरे राज्य में सरकारी विभागों और सरकार द्वारा वित्त पोषित कितने संस्थानों में ऐसी समितियाँ बनी और उन्होंने क्या भूमिका निभाई, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है।

कोई एक दशक पूर्व इन पंक्तियों के लेखक ने एक अध्ययन सेंम्पल सर्वे पद्धति से कराया था, जिसका परिणाम यही निकला था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अन्तर्गत गठित समितियाँ पूर्णतः निष्क्रिय हैं और महिलाओं का उत्पीड़न कार्य-स्थलों पर पूर्ववत् जारी है। कितने दोषी अब तक दंडित हुए हैं, इसकी सरकारी स्रोतों से कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। कहने का आशय यह है कि वर्किंग वूमन किसी भी पद पर नियुक्त हो, या किसी भी शीर्ष पद पर वह लोकतान्त्रिक पद्धति द्वारा चयनित होकर बैठी हो, उसका मार्ग कंटकाकीर्ण ही रहता है। जयपुर नगर-निगम भी इसकी एक मिसाल ही प्रतीत होती है।

थोड़ी देर के लिए नगर-निगम प्रकरण को नजरन्दाज कर दें, तब भी यह तो सोचना ही होगा कि कार्यालयों में फाइलों का रख-रखाव बहुत प्रभावी एवं कड़ी सुरक्षात्मक व्यवस्था की मांग करता है। सरकार में अलबत्ता ऐसे भी कुछ कुशल और चौकन्ना रहने वाले आला अफसर हैं, जो गोपनीय फाइलों को आलमारियों में स्वयं बन्द करके रखते हैं और उनके निजी सहायकों की भी ऐसी पत्रावलियों तक पहुंच नहीं होती। वे अनुकरणीय हैं। बहरहाल, जयपुर नगर निगम में हुआ अग्नि-कांड गंभीर चिन्ता का विषय है और ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति किसी कार्यालय में न हो सके, इसके लिए उपचारात्मक कदम पूरी शिद्दत से उठाये जाने चाहिए।

चुनाव चर्चा: सात दशक पहले


पत्रकारिता के इतिहास में गहरी दिलचस्पी के कारण पुराने समाचार पत्रों की तलाश करते रहना मेरा व्यसन रहा है। अपनी इसी खोज के सिलसिले में मेरी मुलाकात अचानक कोई तीस साल पहले श्री प्रियतम कामदार से हो गई। कामदार उन उत्कट विद्यानुरागियों में थे जो सुदूर सन् 1928 में भी प्रसिद्ध प्रकाशक डी.बी. तारापुरवाला से अंग्रेजी के ग्रन्थ मंगाकर पढ़ते थे। सन् 1942 में कामदार ने अन्य पत्रों के अलावा ‘’प्रचार’ नाम से एक ऐसे तेजस्वी साप्ताहिक का प्रकाशन किया था,  जिसके सामाजिक और राजनीतिक सरोकार सघन और गहरे थे। सन् 1945 में जब प्रजामंडल की मांगों के फलस्वरूप जयपुर रियासत में उत्तरदायी शासन की मांग उठने लगी, तो सर मिर्जा इस्माइल के जमाने में धारा सभा और प्रतिनिधि सभा की स्थापना की गई और इसके लिये चुनाव कराये गये। एक सीमित दायरे में ही सही,  जयपुरवासियों का चुनावों की प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया से गुजरने का यह पहला अनुभव था। इसलिए प्रबुद्ध पत्रकार प्रियतम कामदार ने अपने समाचार पत्र के जरिये लोक-शिक्षण का बीड़ा उठाया और अपने पत्र में तरह-तरह के मनोरंजक विज्ञापन,  कविताएं,  लेख और टिप्पणियां प्रकाशित कीं,  ताकि जन सामान्य चुनाव-प्रचारकों की चिकनी-चुपड़ी बातों और मीठे वादों के भुलावे में न आयें और योग्य उम्मीदवारों को ही विजयी बनायें। यहां मैं उन विज्ञापनों को उद्धृत करने का मोह संवरण नहीं कर सकता,  जो कामदार जी ने आज से लगभग सात दशक पूर्व प्रकाशित किये थे।

जयपुर में नृसिंह चतुर्दशी का जुलूस बड़ी धूम-धाम से निकलता है। इसकी तैयारियां भी बड़े जोर शोर से होती हैं। नृसिंह के विभिन्न अवतारों के मुखौटे लगाये लोगों की यह शोभायात्रा दर्शनीय होती है। इसी शोभायात्रा की उपमा देते हुए चुनाव-चेतना का एक विज्ञापन जयपुरी बोली में इस प्रकार छापा गया थाः
‘चुनाव ‘चतरदशी’ आ गई छै
रंग विरंग्या चेहरा लेर
चैरावां चैरावां चक्कर लगाता हुयां
लोग
गळी गळी में घूम रह्या छै
सावधान!
वोट की ढोक कोई नकली नरसिंगजी के
देद्योला,  तो
आशीष को अस्यो हांथ माथा पर फेरेला
कि
थांका
चोटी-पट्टा साफ हो जायला
और
वांकी जटा
घेर-घुमेर हो जायली।

उन्होंने अपने समाचार पत्र में बुद्धि-कौशल से भरा एक ऐसा फार्म भी तैयार करके छापा था,  जिसमें उम्मीदवारों से जयपुर की सेवा करने और कुछ विशेष मांगों को पूरा करने की प्रतिज्ञा निहित थी। इस फार्म पर उम्मीदवारों के हस्ताक्षर कराने के लिये मतदाताओं का इस प्रकार आह्वान किया गया थाः

“यदि आप चोरों के चक्रव्यूह,  पापियों के पाखण्ड,  हरामियों के हथकंडे,  ठगों के गिरोह से अपने बहुमूल्य वोट की रक्षा करना चाहते हैं तथा अपने पवित्र वोट के बदले में अपने इष्ट मित्र,  कुटुम्बियों व मूक जनता और इसके सच्चे प्रतिनिधियों के लिये इस दिन से अगले चुनावों तक कष्ट,  चिन्ता और अपमान नहीं खरीदना चाहते हैं,  तो आपके ‘’प्रचार’  द्वारा प्रेषित पब्लिक के हित,  उन्नति और सम्मान भरे इस फार्म पर उम्मीदवार के हस्ताक्षर कराके अपना वोट दीजिये-‘

मनोरंजक विज्ञापनों के साथ-साथ पत्र के ‘’चुनाव चर्चा’  शीर्षक स्तंभ में मतदाताओं को आगाह किया गया है कि वे उम्मीदवारों को मत देने से पहले निम्नलिखित बातें सुनिश्चित कर लें:
1. अमुक उम्मीदवार ने ‘’चोर बाजार’ से मूक जनता की रक्षा करने के लिये क्या-क्या किया और अब क्या करने की प्रतिज्ञा करता है।
2. अमुक उम्मीदवार ने राज्य के विभागों में बढ़ती हुई अभूतपूर्व रिश्वतखोरी से जनता की कितनी रक्षा की और अब क्या कर सकता है।
3. जनता द्वारा उठाये गये ‘’हिन्दी’  तथा ‘’वृक्ष नहीं कटेंगे’  आदि आन्दोलनों में अमुक उम्मीदवार ने क्या क्रियात्मक कार्य किये और आगे से जनमत विरूद्ध प्रश्न उपस्थित होने पर क्या कर सकेगा।
4. राज्य के उच्च स्थानों पर जयपुर वाले योग्य व्यक्ति नियुक्त किये जायें,  इस जननाद को किस उम्मीदवार ने सहारा दिया और आगे इस दिशा में क्या कर सकता है।
5. बहुत ही कम वेतन पाने पर भी कम भत्ता व बहुत बड़ा वेतन पाने पर बड़ा भत्ता दिये जाने के विरूद्ध किस उम्मीदवार ने क्या प्रतिरोध किया और आगे क्या करने का वादा करता है।
6. जयपुरवासी छोटे से छोटे सरकारी नौकर को पेट भराऊ वेतन अवश्य मिलना चाहिये,  इस आवाज में किस उम्मीदवार ने सहारा लगाया और भविष्य में लगाएगा क्या?
7. शहर की गलियों की बढ़ती हुई गंदगी के विषय में किन-किन उम्मीदवारों ने म्यूनिसिपैलटी व हैल्थ ऑफिस का गला पकड़ा और अब क्या वादा करते हैं।

एक साप्ताहिक द्वारा लगभग सत्तर वर्ष पूर्व चुनावों में इतनी गहरी रूचि लेकर लोक-शिक्षण की प्रभावी भूमिका निभाने का यह उपक्रम निश्चय ही प्ररेणास्पद और आज भी प्रासंगिक है।

वे बेमिसाल शिष्ट-मिष्ट लोग!


सन् 1962 का वह दिन मुझे अभी भी याद है,  जब तत्कालीन मुख्य सचिव भगवत सिंह मेहता ने प्रशासनिक शिष्टाचार और नए अफसरों के पहनावे पर विनोदपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा था,  ”प्रभाकर,  तुम अभी बच्चे हो। हमने तो वे दिन देखे हैं जब मेवाड़ में किसी रस्मी आयोजन में कोई बिना पगड़ी पहने जाने की जुर्रत नहीं कर सकता था। किसी ने अगर हिमाकत की तो उसकी खैर नहीं थी।“

लगभग 35 साल पहले का एक और किस्सा याद आता है,  यह मेरी आंखों के सामने ही घटित हुआ था। राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एस. अड़वियप्पा उन दिनों विकास विभाग में रूरल हाउसिंग सैल के प्रभारी अधिशासी अभियन्ता थे। उन्हें उन दिनों हिन्दी पढ़ने का चाव चढ़ा था। इसी सिलसिले में मैं एक दिन उनके कक्ष में बैठा था कि उसी समय उनके निजी सहायक ने वहां प्रवेश किया। निजी सहायक के मुंह में इतनी बुरी तरह पान भरा था कि बोलने में भी सहजता भंग होती थी। अड़वियप्पा साहब बहुत शान्त प्रकृति के बड़े शिष्ट व्यक्ति थे। किन्तु बड़ी कठोरता के साथ उन्होंने अपने निजी सहायक को निर्देश दिया,‘”तुम आज कैजुअल लीव पर रहो। अब दुबारा मेरे कमरे में आने की जरूरत नहीं है।“

कुछ वर्षों पूर्व मैं एक संगोष्ठी के सिलसिले में कोटा में था। संगोष्ठी की संध्या को एक स्थान पर आठ-दस व्यक्तियों के अनौपचारिक संवाद और आस्वाद का कार्यक्रम था। वहां जिला स्तर के एक युवा अधिकारी ने प्रवेश के साथ ही वह पराक्रम दिखाया कि धूम्रपान विहीन उस शालीन वातावरण को भंग करते हुए सिगरेट मंगाने का आदेश दिया और सिगरेटें फूंक फूंक कर उसका धुआं उन वयोवृद्ध विशिष्ट अतिथियों पर उड़ाते रहे,  जिनमें साठ के आसपास की मीडिया जगत से जुड़ी एक महिला भी थी। अगली सुबह जब इन महिला ने मेरे साथ बातचीत की और मैंने गत संध्या की घटना पर खेद प्रकट किया, तो उत्तर में उन्होंने हँसते हुए कहा ”ये सब बाल-लीलाएं हैं। इनसे अच्छा मनोरंजन हो जाता है।“

शिष्टाचार-हन्ता इन उदाहरणों के ठीक विपरीत अतिशय शिष्टाचार और विनम्रता का एक प्रसंग आज भी मुझे ममत्व से अभिभूत कर देता है। बहुत पुरानी घटना है। मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और राजस्थानी साहित्य के मर्मज्ञ कैलाश दान उज्जवल से मिलने उनके निवास पर गया था। गृह-सेवक ने मेरा नाम पूछा और मुझे बरामदे में बैठने को कहा। बाड़मेर की तरफ का ठेठ ग्रामीण नौकर था। कदाचित् मेरा नाम ठीक से नहीं बता पाया। करीब पन्द्रह मिनट बैठा होऊंगा कि उज्जवल साहब जो उस समय टीवी देख रहे थे,  किसी काम से उठे। शाम का समय था। रोशनी में जाली के दरवाजे से मेरी मुखाकृति दिखाई दी। वे तुरन्त बाहर आए। मुझ से पूछा कि मुझे आए कितनी देर हुई थी। मैंने उन्हें स्थिति बता दी। उन्होंने पहले तो सेवक को डांट-फटकार लगाई और फिर क्षमा-याचना करते हुए मुझे भीतर ले गए। मैंने बहुत कहा कि मुझे अधिक समय नहीं हुआ है और नौकर की गलती नहीं है,  वह मेरे नाम का उच्चारण ठीक से नहीं कर पाया। मैं थोड़ी देर उनके साथ रहकर घर लौट आया। रात्रि को अचानक करीब साढ़े दस बजे उज्जवल साहब का फोन आया। वे कह रहे थे,  ”प्रभाकरजी,  थे म्हांनैं माफ करियो क नहीं?  म्हारा मन मैं घणों पछतावो होरियो है।“ मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मेरे मन में कुछ नहीं है। मैं आपके स्नेह से विह्वल हूं।

एल.एन. गुप्ता,  जिनका पूरा नाम लक्ष्मीनारायण गुप्ता है,  प्राचीन भारतीय जीवन मूल्यों को आत्मसात् किये आज कल अपनी बँगलाभाषी सहधर्मिणी के साथ दुर्गापुरा के निकट प्रेम-निकेतन-आश्रम में अपना पिचहत्तर के पार जीवन निर्विकार भाव से व्यतीत कर रहे हैं। वे केन्द्र सरकार और राज्य सरकार में सचिव स्तर के पदों पर रहने के अतिरिक्त प्रधानमंत्री नरसिंहाराव के कार्यकाल में राजस्थान में राष्ट्रपति शासन के दौरान परामर्शदाता भी रहे। पर सिद्धान्तों से समझौता उनके लिए संभव ही नहीं था। उन्होंने कुछ माह बाद ही त्याग पत्र दे दिया। गुप्ता जी ने अन्य आला अफसरों की तरह कभी अपने घर पर सरकारी ऑर्डरली या सेवक नहीं रखा। उनका एक मात्र निजी सेवक भँवर नाम का युवक था,  जिसकी पत्नी को उन्होंने घर की बीनणी कह कर ही सम्मान दिया। एक बार मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे प्रशासनिक सेवा के दौरान घटित सर्वाधिक स्मरणीय घटना पर आधारित कोई एक संस्मरण प्रकाशनार्थ दें। गुप्ता जी मुस्कुराकर बोले “मुझे कुछ याद नहीं,  मैं जिस दिन सेवा-निवृत्त हुआ,  उसी दिन मैंने अपनी स्मृति के इस पक्ष का स्विच ऑफ  कर लिया था कि मैं कभी भारतीय प्रशासनिक सेवा में था और फिर कोई भी व्यक्ति जब संस्मरण लिखता है, तो उसमें कहीं न कहीं ‘’मैं’ तो आ ही जाता है,  जो अहंकार का द्योतक है।“ उनकी असहमति भी कितनी शालीनता पूर्ण थी!

बी. एच. यू. का वह बदरंग कवि-सम्मेलन


आज भले ही देश  में विश्व  विद्यालयों की बाढ़ आ रही है,  पर पं. मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित बनारस हिन्दू विश्व  विद्यालय का आज भी कोई सानी नहीं है। लेकिन मैं हैरत में पड़ गया था,  जब मैंने एम.एन.आई.टी. जयपुर के समारोह में कुछ छात्रों से पूछ लिया था कि मालवीय महाराज कौन थे,  और वे निरुत्तर थे। उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में जो गिरावट आई है,  यह उसका एक नमूना था। जो भी हो,  यहां मैं जिस घटना का ज़िक्र कर रहा हूं,   वह तकरीबन 36-37 वर्ष पुरानी है।

कदाचित् 1976  का ही कोई कालखण्ड था। बी. एच. यू. की हीरक जयन्ती बड़े ज़ोर-शोर  से मनाई जा रही थी। इस महोत्सव की श्रृंखला में एक राष्ट्रीय स्तर का कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया था,  जिसमें हिन्दुस्तान के सभी सरनाम कवि,  जिनकी संख्या कोई तीस-चालीस के आस पास होगी,  आमंत्रित किए गए थे। अगर मुझे ठीक से याद है,  तो आमंत्रित कवियों में सबसे अधिक उम्र की  कवयित्री जो उस समय अस्सी के भी पार थीं,  चंद्रमुखी ओझा ‘’सुधा’  थीं और दूसरे नंबर पर डा. राम कुमार वर्मा थे। यह एक संयोग ही था कि इन पंक्तियों के लेखक को भी उस कवि-कुम्भ में आमंत्रित कर लिया गया था। सबसे कम  उम्र के कवि बुद्धिनाथ मिश्र थे,  जिन्हें आगे चलकर गीतकार के रूप में अच्छी प्रसिद्धि मिली थी। मेरी अपनी पात्रता उस आयोजन के प्रतिभागी के रूप में कितनी थी,  कहना कठिन है। पर हकीकत यह है कि उस समय बी. एच. यू. के हिन्दी विभाग में राजस्थान के एक रत्न बूंदी निवासी डा. भोला शंकर व्यास थे। व्यास जी भाषा विज्ञान के प्रकाण्ड विद्वान् थे। यद्यपि कवि सम्मेलन के समय वे अस्वस्थ चल रहे थे,  पर मेरा खयाल है कि उनकी संस्तुति पर ही मुझे आमंत्रित किया गया होगा। व्यास जी जब तक जीवित रहे,  जब कभी जयपुर आते,  तो मुझे दर्शन दे कर अवश्य  कृतार्थ करते थे। जयपुर में उनके कई निकट संबंधी थे और वे प्रवास में प्रायः एक संबंधी के यहां बापू नगर में ही ठहरते थे। बहरहाल।

उस विशाल कवि सम्मेलन के संयोजक और प्रभारी उस समय के यशस्वी गीतकार और बी. एच. यू. के हिन्दी विभाग में ही कार्यरत डा. शंभू नाथ सिंह थे। मैं बड़े उत्साह के साथ बनारस पहुंचा था। आयोजन स्थल के  मार्ग में एक पान की दुकान थी। वहां मैंने पनवाड़ी से एक बनारसी पान बनाकर देने को कहा। वह हॅंसा और बोला, बाबू,  बाहर से आए दिखते हो,  यहां एक पान नहीं,  पान का जोड़ा दिया जाता है। खैर। पान का जोड़ा खाया। विश्व  विद्यालय के प्रमुख द्वार पर स्वागत कर्ताओं  से माल्यार्पण कराया। उनके सायंकालीन आतिथ्य का सुख प्राप्त कर ठीक समय पर उस सभागार में पहुंचा जहां कवि सम्मेलन होना था। रात्रि के आठ बजते-बजते पूरा सभागार खचाखच भर गया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कदाचित् डा. राम कुमार वर्मा कर रहे थे। उत्तर प्रदेश  के तत्कालीन जन सम्पर्क निदेशक और प्रसिद्ध कवि ठाकुर प्रसाद सिंह भी उसमें भाग ले रहे थे। बड़े उल्लास और आनन्द के वातावरण में कवि सम्मेलन उर्दू मुशायरों की परम्परा के अनुसरण में सबसे युवा कवि बुद्धिनाथ मिश्र के गीत से प्रारम्भ हुआ। उसके बाद कुछ और कवियों ने काव्य पाठ किया। पर यह क्या, जैसे-जैसे बहुत वरिष्ठ और राष्ट्रीय ख्याति के कवि काव्य पाठ के लिए खड़े हुए,  बड़ी संख्या में छात्र हूटिंग करने लगे और पुरजा़र ध्वनि में शंख  बजाने लगे,  जो वे अपने साथ लाए थे। भले ही कवि सम्मेलन सुबह के चार बजे तक चला,  पर छात्रों के उत्पात ने रंग में भंग कर दिया। बाद में ज्ञात हुआ कि इस सब के पीछे विश्व  विद्यालय के प्राध्यापकों की अपनी राजनीति थी और वे इस आयोजन को फ्लॉप  कराने पर उतारू थे।

मेरी अपनी खिल्ली तो ऐसी उड़ाई गई कि वह घटना भुलाए नहीं भूलती। कवयित्री चंद्रमुखी ओझा ‘’सुधा’  जो मेरी दादी की उम्र की रही होंगी,  बराबर ज़र्दे का पान चबाए जा रही थीं और उनकी मंचीय टिप्पणियों का मैं ही एक मात्र निरीह और धैर्यवान् श्रोता था। उन्होंने बड़े दुराग्रह से मुझे ज़र्दे का पान ठीक उस समय खिला दिया,  जब मेरा टर्न आने वाला था। मैंने इससे पहले कभी ज़र्दे का पान नहीं खाया था। मेरा नाम पुकारे जाने पर मैं जैसे ही माइक के सामने जा कर खड़ा हुआ,  पान की पीक निगल जाने के कारण मेरी खुल्ल-खुल्ल शुरू  हो गई। मैं दो छंद भी नहीं पढ़ पाया कि छात्रों ने मुझे बुरी तरह हूट करना शुरु कर दिया। विवश  होकर मुझे बैठ जाना पड़ा। मैं,  जो उन दिनों राजस्थान के अच्छे मंचीय लोकप्रिय गीतकारों में समझा जाता था और शायद इसीलिए भोला शंकर जी व्यास ने मेरी सिफारिश  की होगी,  बहुत बेआबरू होकर बनारस से लौटा। तसल्ली इतनी ही थी कि मैं तो नाचीज़ था,  पर उस कवि सम्मेलन में बड़े-बड़े महारथियों की प्रतिष्ठा धराशायी हुई थी।

गृह सेवक-सेविकाओं की समस्याएं और समाधान


प्राचीनकाल से लेकर आज तक समाज के समृद्ध और खाते-पीते वर्गों में गृह सेवक रखने की परम्परा रही है। एक समय था,  जब गृह सेवक भी एक परिवार के साथ न केवल अपने जीवन का श्रेष्ठतम भाग सेवा धर्म में गुज़ारते थे,  अपितु उनकी हैसियत यह भी हो जाती थी कि वे अपने स्वामी के पारिवारिक मामलों में भी यथा आवश्यकता अपना परामर्श देते थे और कई बार पारिवारिक विग्रह और कलह का निवारण करने में अपनी भावनात्मक भूमिका निभाते थे। गृह स्वामी भी उनकी सेवाओं के लिए उनको यथोचित ढंग से पुरस्कृत और सम्मानित करते थे। शुक्र नीति में कहा गया है कि स्वामी का कर्तव्य है कि वह सेवकों की हथेलियों को स्निग्ध रखे। इस नीतिगत कथन का मंतव्य यही था कि व्यक्तिगत सेवा चाकरी में रहने वाले व्यक्तियों को हमेशा उन्हें अपनी उदारता से प्रसन्न रखने का प्रयत्न करना चाहिए। किन्तु आज तो सारी स्थितियां  ही बदल गई हैं। भौतिकता की इस दौड़ में न पहले जैसे स्वामी रहे और न सेवक। फिर भी किसी-न- किसी रूप में घरों में नौकर-चाकर रखे ही जाते हैं,  भले ही उनका स्वरूप बदल गया हो। आजकल जब पढ़े-लिखे परिवारों में महिलाएं जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय सहभागिता करने लगी हैं,  या वेतनभोगी पदों पर कार्य करने लगी हैं,  तो ऐसी कामकाजी महिलाओं के लिए तो किसी-न-किसी रूप में आया,  बाई,  महाराजिन,  महरी या अन्य कोई सेवक रखने की आवश्यकता बढ़ती ही जा रही है। किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि सम्भ्रांत घरों में भी पढ़े-लिखे स्त्री-पुरुष अपने सेवकों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं,  जो मानव मूल्यों की दृष्टि से सर्वथा निन्दनीय है।

प्रायः देखा गया है कि अधिकांश ऐसे घरों में सेवकों के लिए रूखा-सूखा अलग खाना बनवाया जाता है। परिवार के अन्य सदस्य जैसा आहार लेते हैं,  उसकी तुलना में उनका भोजन प्रायः पोषक तत्वों से विहीन होता है। परिणामतः वे कुपोषण के शिकार भी हो जाते हैं। सबसे आपत्तिजनक बात तो यह होती है कि जब घर में कोई मिठाई अथवा कोई सुस्वादु व्यंजन परिजनों द्वारा उपयोग में लाया जाता है और जब वह उपयोग के योग्य भी नहीं रहता,  तो उसे गृहसेवकों को अपने घर ले जाने के लिए दे दिया जाता है। एक क्षण के लिए भी उनके मन में यह विचार नहीं आता कि जो वस्तु वे स्वयं खाने योग्य नहीं समझते,  उसे अपने सेवक को खाने के लिए क्योंकर दिया जाना चाहिए। फ्रिज में पड़े-पड़े फल या सब्जी़ जब ख़राब होने की स्थिति में आती है,  तो वह भी प्रायः गृह सेवकों को या उनके परिजनों को उदरस्थ करने के लिए दे दी जाती है। अनेक बार तो इस दुष्प्रवृत्ति के कारण गृह सेवक बीमार भी हो जाते हैं।

यही आलम वस्त्रों के मामले में नज़र आता है। अक्सर ऐसे  वस्त्र जो फटे-पुराने होते हैं या परिवार के सदस्यों की पसन्द से गिर जाते हैं,  उन्हें गृह सेवकों को ही भेंट में देकर अपनी उदारता का परिचय दिया जाता है।

शादी-ब्याह या अन्य मांगलिक अवसरों पर भी अक्सर यही होता है कि एक ओर जहॉं दूसरे सदस्यों के लिए हज़ारों रुपए के महंगे परिधान अवसर विशेष के लिए बनाए जाते हैं,  वहीं सेवकों के हिस्से में चालाकी और चतुराई से बाहर से चमकदार दिखाई देने वाले घटिया किस्म के कपड़े ही आते हैं।

हालांकि इस तथ्य को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ अर्से से इन सेवकों द्वारा गृह स्वामी या स्वामिनियों की हत्या कर उनके गहने,  नकदी आदि चुरा कर ले जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं,  पर इसके पीछे भी कारण निर्धनता ही है। यदि इन्हें भी अच्छा वेतन और खाने-पीने की समुचित सामग्री मिलती रहे तो कदाचित् इन चिन्ताजनक घटनाओं में कमी आ सकती है।

इसी प्रसंग में हम घरों में अंशकालिक रूप से काम करने वाली उन स्त्रियों का भी ज़िक्र कर सकते हैं,  जिन्हें राजस्थान में आमतौर पर ‘’बाई’  कहकर सम्बोधित किया जाता है। अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवारों में ये ‘’बाइयॉं’  यूं तो काम के लिहाज़ से गृहस्थी का एक अनिवार्य अंग हैं और पड़ोसनों तथा परिचितों की आपसी बातचीत का एक प्रिय विषय भी हैं,  जो इनकी अहमियत को ही रेखांकित करता है,  परन्तु इन्हें भी जो मासिक वेतन दिया जाता है,  वह मोटे अनुमान के आधार पर परिवार की कुल आमदनी का पचासवें हिस्से से भी कम ही होता है। यही नहीं,  उसे भी इस अंदाज़ से दिया जाता है कि तीन से अधिक छुट्टी की तो प्रतिदिन के हिसाब से पैसा काटा जाएगा।

ये ‘’बाइयॉं’  जो पिछले 10-15  वर्षों पूर्व सैंकड़ों मील दूर अपने परिवार के साथ काम की तलाश में यहॉं आई हैं,  किन स्थितियों में रह रही हैं,  हम इसका आकलन तब तक नहीं कर पाते,  जब तक इनके तथाकथित आवासों को हम एक बार देख नहीं लेते। जिन बस्तियों में ये रहती हैं और जिस तरह का अपौष्टिक भोजन इन्हें प्राप्त होता है,  वह इनके आए दिन रोग ग्रस्त हो जाने का बहुत बड़ा कारण है।

आज आवश्यकता यह विचार करने की है कि इन्हें कैसे सम्माननीय नागरिकों का दर्जा देते हुए इनके जीवन स्तर में सुधार लाया जाए और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि इनके बच्चे भी विद्यालयों में पढ़ने जा सकें।

जिन परिवारों में ये अंशकालिक सेविकाएं काम करती हैं,  उनका तो यह कर्तव्य बनता ही है,  कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं भी इनके जीवन स्तर और इन परिवारों की आमदनी के बारे में सर्वे कराकर अपने सुझाव दे सकती हैं।                          
 


प्राच्य विद्या, साहित्य और पत्रकारिता को समर्पित डॉ इन्दु शेखर


अपनी वाणी और लेखनी दोनों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के सन्देश को समुद्र पार पहुंचाने वाले संस्कृत और हिन्दी के विद्वान् एवं प्राच्य विद्याविद् डॉ. इन्दुशेखर डेढ़ दशक पूर्व कीर्तिशेष हो गये थे। यद्यपि अपनी आयु के लगभग बीस वर्ष उन्होंने कभी भारत-विद्या के प्रोफेसर के रूप में और कभी सांस्कृतिक सहचारी के रूप में विदेशों में ही व्यतीत किए थे,  तथापि जीवन के प्रारम्भिक और अन्तिम दौर में वे गुलाबी नगर की गोद में ही रहे। सुदर्शन देह-यष्टि,  मधुर संभाषण और अहर्निश आनन्दभाव में रहने वाले डॉ. इन्दुशेखर सही अर्थों में संस्कृति पुरुष थे। उनके मित्रों,  प्रेमियों,  श्रद्धालुओं और शिष्यों की एक बड़ी संख्या थी।

पांडित्य परम्परा में शिक्षा-दीक्षा
इन्दुशेखर का जन्म नाम देवदत्त था और उनका जन्म हरियाणा के गुड़गांव में 1 फरवरी,  1911 को हुआ था। उनका बाल्यकाल हरिद्वार के हृदय में बसी गुरुकुल कांगड़ी के उस सुरम्य वातावरण में व्यतीत हुआ था जहां पतितपावनी भागीरथी अठखेलियां करती है। उनके पिता कन्हैयालाल शास्त्री संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित थे और गुरुकुल में अध्यापन करते थे। परिणामतः देवदत्त की शिक्षा भी आर्य समाज की पांडित्य परम्परा में ही हुई। उन प्रारम्भिक संस्कारों का ही प्रताप था कि डॉ. शेखर को अथर्ववेद की सैंकड़ों ऋचाएं कंठस्थ थीं। शास्त्री तक अध्ययन करने के बाद इन्दुशेखर लाहौर चले गए जहां उन्होंने एम.ओ.एल. और एम.ए. की परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। उन दिनों वे लाहौर में पं. उदयशंकर भट्ट,  हरिकृष्ण प्रेमी,  चन्द्रगुप्त विद्यालंकार आदि साहित्यकारों के निकट सम्पर्क में आए।

सन् 1935 में शिक्षा समाप्त करने के बाद इन्दुशेखर ने शिमला-दिल्ली में हारकोर्ट बटलर स्कूल में संस्कृत-हिन्दी के अध्यापक के रूप में जीविकोपार्जन का श्रीगणेश किया। तदन्तर वे दिल्ली के प्रसिद्ध सेंट स्टीफन कॉलेज में प्राध्यापक और दिल्ली प्रेस समूह के ‘’कारवां’ तथा  ‘एअरग्राफ’ पत्रों के सम्पादकीय विभाग में रहे। पांचवे दशक के आरम्भ में सर मिर्जा के सम्पर्क में आने के परिणामस्वरूप वे जयपुर के महाराजा कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुए और इसी के साथ उनके अभ्युदय की शुरूआत हुई। वे तीन वर्ष तक कूच-बिहार में शिक्षा सचिव और सूचना निदेशक के रूप में भी प्रतिनियुक्ति पर गए।

1957 से लेकर 1960 तक तेहरान विश्वविद्यालय में इण्डोलॉजी के प्रोफैसर रहने के तुरन्त बाद वे विदेश मंत्रालय द्वारा नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में सांस्कृतिक सहचारी के पद के लिए चुन लिए गए। तेहरान में वे सी. कुन्हन राजा जैसे दिग्गज प्राच्य विद्याविद् के उत्तराधिकारी थे,  तो नेपाल में उन्होंने शिवमंगल सिंह ’सुमन’ का स्थान लिया था। इन दोनों ही रूपों में उन्होंने इन पदों पर रहने वाले विद्वानों की विरासत में विस्तार किया। नेपाल में 12 वर्ष रहने के बाद अल्प समय के अन्तराल के अनन्तर विदेश सचिव टी.एन. कौल के आग्रह पर वे फिर थाईलैण्ड स्थित चिंगमाई विश्वविद्यालय में भारत विद्या के प्रोफेसर होकर चले गए।

1975 में वहां से लौटने के बाद वे कुछ समय तक ‘इतवारी पत्रिका’ से सम्बद्ध रहे और फिर भारतीय विद्या भवन के राजस्थान केन्द्र से जुड़ गए।

अनेक भाषाओं के ज्ञाता
आजीविका अर्जित करने के लिए वे जहां कहीं भी,  किसी भी स्थिति में रहे हों,  उनकी सृजन-धर्मिता सदाबहार रही। वे कवि,  नाटककार और भारतीय संस्कृति के व्याख्याता के रूप में देश-विदेशों में जाने जाते रहे। उन्होंने प्राच्य विद्याविदों के मास्को में आयोजित विश्व-सम्मेलन में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की ओर से सहभागिता की थी। मूलतः इन्दुशेखर संस्कृत के विद्वान थे,  पर वे अनेक भाषाएं जानते थे। निरन्तर अध्ययन द्वारा उन्होंने अंग्रेजी में ऐसी महारत हासिल कर ली थी कि अन्तर्राष्ट्रीय सभा-सम्मेलनों में वे धाराप्रवाह अंग्रेजी में भाषण करने में समर्थ थे। तेहरान-प्रवास के दौरान उन्होंने फारसी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था और ‘’पंचतंत्र’ तथा ‘’अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का फारसी में अनुवाद भी किया था,  जिसे स्वयं ईरान के शाह की सरकार द्वारा प्रकाशित किया गया था।

अपने नेपाल-प्रवास के दौरान उन्होंने नेपाली भाषा पर बहुत अच्छा अधिकार कर लिया था। यहां तक कि नेपाल के तत्कालीन नरेश महेन्द्र वीर विक्रमशाह की प्रेम कविताओं के एक संग्रह का हिन्दी अनुवाद उन्होंने ‘’तुम्हारे लिए’ शीर्षक से प्रकाशित किया था। नेपाल के नृप से उनकी अंतरंग मैत्री हो गई थी।

हॉलैण्ड के प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान और भारत-विद्याविद् प्रो. जे. गौंडा से उनकी इतनी घनिष्टता हो गई थी कि सन् 1960 में उन्होंने इन्दुशेखर को युट्रेक्ट विश्वविद्यालय में आमंत्रित कर उन्हें डी.लिट्. के लिए शोध-प्रबन्ध लिखने को ही प्रेरित नहीं किया,  अपितु प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति विषयक ग्रन्थों के विश्व-विख्यात प्रकाशक ई.जे.ब्रिल द्वारा उन्होंने उनके शोध ग्रन्थ ‘’संस्कृत ड्रामाः इट्स ओरीजिन एण्ड डिक्लाइन’ को लाइडन से प्रकाशित  भी कराया। बाद में इस ग्रन्थ का भारतीय संस्करण मुंशीराम मनोहरलाल,  दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया।

सांस्कृतिक चेतना में भूमिका
राजस्थान और विशेषकर जयपुर की आज की पीढ़ी के बुद्धिजीवियों और लेखकों को यह तथ्य अल्प ज्ञात है कि डॉ. इन्दुशेखर ने अपने जयपुर-निवास के प्रारम्भिक दौर में यहां सांस्कृतिक चेतना लाने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

1944 या 1945 में उन्होंने पैन (PEN) का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन जयपुर में आहूत किया था जिसमें जवाहर लाल नेहरू,  सरोजिनी नायडू,  डॉ. राधाकृष्णन,  शेखअब्दुल्ला और अंग्रेजी लेखक ई.एम. फोर्स्टर  तक ने भाग लिया था। वे जयपुर में रोटरी क्लब के संस्थापकों में से थे और वर्षों तक इसके सचिव रहे। मुझे आज भी स्मरण है,  1950 से 1957 तक का वह दौर जब इन्दुशेखर के सवाई मानसिंह अस्पताल के निकट स्थित निवास पर आए दिन कवि गोष्ठियों का आयोजन होता रहता था। इन गोष्ठियों में सहभागिता करने वालों में कविवर कर्पूरचन्द्र कुलिश,  रामनाथ कमलाकर,  मदनगोपाल शर्मा,  ताराप्रकाश जोशी आदि मुख्यतः होते थे। मैं स्वयं भी यदा-कदा उन गोष्ठियों में सहभागी होता था। कुलिशजी के डॉ. इन्दुशेखर के साथ बहुत आत्मीयता पूर्ण सम्बन्ध थे।

कारों के शौकीन
डॉ. इन्दुशेखर बहुत आमोद-प्रमोद प्रिय और राजसी प्रकृति के व्यक्ति थे। मैंने जब से उन्हें जाना,  वे उन गिने-चुने बुद्धिजीवियों में थे जो आज से 45 वर्ष पूर्व भी कार में ही चलते थे। उनकी वह हरे रंग की कार,  जो अक्सर हम कवियों को ‘’मौजी’ खिलाती थी,  मुझे आज भी याद है।

विदेश सेवा में चले जाने के बाद तो वे मर्सीडीज में बैठने लगे थे। संस्कृत का कोई पंडित अपनी निजी मर्सीडीज रखे,  यह अकल्पनीय लगता है। साठ के दशक में तो जयपुर की सड़कों पर एक-दो मर्सीडीज ही होंगी। अच्छी मदिरा और अच्छी मोटरों का उन्हें बेहद शौक था। अपने महाप्रयाण से पूर्व मात्र एक वर्ष की अवधि में उन्होंने तीन गाड़ियां बदली थीं और कुछ महीनों पहले तक वे स्वयं ड्राइव करके मेरे घर तक आ जाते थे। विदेशी लेखकों की तरह वे अपना अधिकांश पत्र-व्यवहार अंग्रेजी में ही सीधे टाइप राइटर पर स्वयं करते थे। सुरुचिपूर्ण संगीत के इतने शौकीन थे कि कैसेट्स का चलन होने से पूर्व उन्होंने मुझे एक बार बताया था कि उनके पास प्रसिद्ध गायकों की चुनी हुई रचनाओं के लगभग 1500 रैकार्ड हैं। कभी कुत्ते पालने का शौक भी उन्हें बहुत रहा था। बेहतरीन नस्ल के तीन-तीन कुत्ते उनके पास होते थे। एक बार तो उनके श्वान-शिशु पर,  जब वे काठमांडू में थे,  प्रसिद्ध नर्तक गोपीकृष्ण अपने प्रवास के दौरान इतने लट्टू हो गए थे कि डॉ. शेखर से उसे उन्हें देने का दुराग्रह कर बैठे थे।

संघर्षपूर्ण जीवन
डॉ. इन्दुशेखर उन लोगों में थे जो जीवन के संघर्ष को सहर्ष झेलते थे और हंसते-हंसते कटु अनुभवों का हलाहल पीते रहते थे। वे जब तक जिये,  जीवन की हर हलचल में उनकी दिलचस्पी बनी रही। नगर के किसी सिनेमाघर में चाहे नई फिल्म लगी हो,  कहीं नाटक हो रहा हो,  कवि सम्मेलन या मुशायरा हो,  सर्कस का शो हो रहा हो या क्रिकेट का मैच हो- वे सभी का आनन्द लेते थे। एक बार उन्होंने मुझसे कहा था - ‘‘”दोस्त! जब तक जीवन में एक भी व्यक्ति तुम्हें प्यार करता है,  जीवन जीने के लायक है।“

डॉ. इन्दुशेखर ने जीवन को अपने वैविध्य में जिया था,  सृष्टि की सारी रंगीनियों में उनका मन रचा-रमा था। उन्होंने निर्भीक और मुक्त जीवन जीने की अपनी जो आनन्द शैली अख्तियार की थी,  उसे अन्त तक नहीं छोड़ा,  किन्तु जीवन के सन्ध्याकाल में अपने 44 वर्षीय पुत्र अभिजात शेखर की एक सड़क दुर्घटना में अकाल मृत्यु हो जाने के कारण भीतर से टूट चुके थे। फिर भी उनके लबों पर अपने लोकप्रिय गीत की ये पंक्तियां थिरकती रहीं:
जी रहा हूं,  क्योंकि
जीवन पर मुझे विश्वास है।
जी रहा हूं,  क्योंकि
जीने का मुझे अभ्यास है।।


दुखान्तिका एक आई. पी. एस. अफसर की


यादें उस कालखंड की हैं,  जब कुंभाराम आर्य राज्य के गृह और स्वास्थ्य मंत्री थे। कदाचित् वर्ष 1957 का घटना-चक्र रहा होगा। कुंभाराम आर्य बिना किसी औपचारिक शिक्षा के भी किस प्रकार प्रखर बुद्धि-वैभव के धनी थे,  इसका आस्वाद मैंने सरकारी पत्रावलियों पर दी गई उनकी उन तीखी टिप्पणियों से किया था,  जो मुझे दिवंगत आई.ए.एस. अधिकारी बाला सहाय शर्मा के सौजन्य से सुलभ हुआ था। बाला सहाय जी दौसा के रहने वाले थे,  जहाँ मेरा ननिहाल था और मुझे यह सौभाग्य भी प्राप्त था कि मैंने हाईस्कूल में उनके पिता वृद्धिचन्द शर्मा से अंग्रेजी विषय पढ़ा था। बाला सहाय शर्मा के पुत्र गोपाल शर्मा अभी हाल तक जम्मू-कश्मीर शासन में डी.जी. (पुलिस) थे।

कुंभाराम आर्य की राजनीतिक सूझबूझ और उनकी पर दुःख-कातरता के अनेक किस्से आज भी लोगों की जुबान पर है। उन्हीं के एक परम मित्र और परामर्शदाता थे ‘’बादळी’ और ‘’लू’ जैसी श्रेष्ठ राजस्थानी काव्य-कृतियों के रचयिता चन्द्रसिंह। चन्द्रसिंह जी की शिक्षा-दीक्षा बहुत कैंडे की हुई थी। वे पहले सादूल पब्लिक स्कूल में और फिर बनारस विश्वविद्यालय में पढ़े थे। जिन दिनों कुंभाराम जी अपनी राजनीतिक शक्ति के शिखर पर थे,  चन्द्रसिंह जी अपने गाँव बिरकाळी को छोड़कर जयपुर आ गये थे। बिरकाळी तब गंगानगर जिले में और अब हनुमानगढ़ जिले में है। खासा कोठी के 18 और 19 नम्बर के दो कमरे चन्द्रसिंह जी के राजधानी-निवास के लिए सुरक्षित कर दिये गये थे। जैसे ही शाम होती,  अठारह नम्बर के कमरे में सरकार के कुछ चुने हुए आला अफसरों और काव्य-प्रेमियों की महफिल सजने लगती। इस मंडली का मैं सबसे कम आयु का सदस्य था। स्मृतियों के सहारे कहना चाहूँगा कि इस महफिल में पुलिस अधिकारियों में डी.आई.जी. जसवन्त सिंह,  जो राजस्थान के गठन के फलस्वरूप बीकानेर यूनिट से आये थे,  प्रमुख थे। दूसरे एक युवा आई.पी.एस. अधिकारी एस.पी. (सी.आई.डी.) जगन्नाथन थे। कुछ वरिष्ठ डॉक्टर भी नियमित आने वालों में थे,  क्योंकि कुंभाराम जी के पास स्वास्थ्य विभाग भी था। इस महफिल में मदिरा के चषकों के साथ बौद्धिक चर्चाएं बड़ी लम्बी चलतीं और कोई आधी रात के समय महफिल बिखरती। कदाचित् इस मेल-मिलाप का ही सुफल था कि डी.आई.जी. जसवन्त सिंह जी के बड़े भ्राता कर्नल फतहसिंह जी की सुपुत्री का विवाह विख्यात् कलाकार कृपाल सिंह शेखावत से सम्पन्न हुआ,  जो उन दिनों चित्रकला का अध्ययन करके जापान से लौटे ही थे। मुझे छोड़कर सब लोग कारों में आते थे,  पर मुझे भी प्रायः जसवन्त सिंह जी अपनी हरे रंग की एम्बेसेडर आर.जे.एल. 1000 में मेरे बापू नगर स्थित नन्हें से निवास पर छोड़ देते। जसवन्त सिंह जी सड़क के उस पार लगभग मेरे सामने की दिशा में एक बड़े बंगले में रहते थे,  जहाँ आजकल एक हाईकोर्ट जज रहते हैं।

यह भूमिका आई.पी.एस. अधिकारी जगन्नाथन की दुःखान्तिका को समझने के लिए जरूरी थी। जगन्नाथन नाटे कद के दाक्षिणात्य मूल के सांवले रंग के व्यक्ति थे। वे जब खासा कोठी में चन्द्रसिंह जी की महफिल में प्रवेश करते, तो पूरी तरह मदिरा के नशे में धुत होते और उनके साथ अनिवार्यतः एक सारंगी वादक होता,  जो राजस्थान की लोकधुनें बजाकर उनका मनोरंजन करता था। शराब के नशे में वे जिस कदर चूर रहते थे,  उससे यह अनुमान लगाना कठिन नहीं रह गया था कि उनकी यह मयखोरी एक दिन उनके लिए आत्मघाती सिद्ध होगी। जगन्नाथन किसी भी अर्थ में ऐयाश व्यक्ति नहीं थे, पर मदिरा की मस्ती में कभी-कभी चाँदपोल बाजार की संगीत-नृत्य प्रवीणा गणिकाओं के यहाँ भी चक्कर काट लेते थे। उन दिनों चाँदपोल बाजार में रात होते ही रसिकगण मुजरा सुनने अपनी प्रिय गणिकाओं के आनन्द-गृहों की सीढ़ियाँ चढ़ने लगते थे। रामगंज तो रैड लाइट एरिया के रूप में पूरे भारत में ही बदनाम था। बहरहाल! एक दिन जगन्नाथन भी चाँदपोल बाजार की एक गणिका को झूमते हुए अपने साथ कार में बैठाकर ले आये और पहुँच गये सीधे पहली चौपड़ स्थित कोतवाली पर,  जहाँ कोतवाल रात की ड्यूटी पर था। जगन्नाथन को देखकर वह सकपका कर अपनी कुर्सी से उठकर सैल्यूट कर ही रहा था कि जगन्नाथन साहब ने आदेश दे दिया कि वह अपनी कुर्सी छोड़ दे और उस पर उस गणिका को बैठा दे। कोतवाल बड़ा सख्त और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति था। इधर गणिका कुर्सी पर बैठी और उधर थानेदार ने बाहर जाकर रात के दो बजे बड़ा साहस जुटाकर आई.जी. बी.जी. कानेटकर को फोन पर इस विचित्र घटना की सूचना दी। तब पूरे राजस्थान का एक ही आई.जी. होता था और कानेटकर कोई साधारण पुलिस अफसर नहीं थे। वे आई.सी.एस. के समानान्तर आई.पी. सेवा के सदस्य थे। तब पुलिस की भारतीय सेवा का नाम आई.पी.एस. नहीं था। वे राजस्थान में आई.पी. के आखिरी इन्सपैक्टर जनरल थे। वे तुरन्त कोतवाली आये और सारा माजरा देखा। दूसरे ही दिन कानेटकर ने उन्हें केन्द्र सरकार के कार्मिक विभाग की स्वीकृति लेकर निलंबित करने की कार्यवाही शुरू कर दी। जगन्नाथन सस्पेन्ड कर दिये गये। पर अपने उच्च स्तरीय संपर्कों के कारण,  जो जाँच-कमेटी बैठाई गई,  उसकी सिफारिश पर उन्हें जल्दी ही बहाल कर दिया गया। पर कानेटकर मानने वाले नहीं थे। उन्होंने व्यक्तिशः राष्ट्रपति से मुलाकात की और संविधान के एक विशेष प्रावधान के अन्तर्गत जगन्नाथन को राष्ट्रपति के विशेष आदेश से बर्खास्त कर दिया गया। इस तरह एक युवा आई.पी.एस. अधिकारी,  जिसने अपनी प्रखर बुद्धि और कार्य कुशलता के लिए जल्दी ही अपनी विशिष्ट पहचान बना ली थी,  अपने ही दुर्व्यसनों  से अपने कैरियर का सत्यानाश कर लिया। आगे की उनकी कष्ट-कथा आंखों को नम कर देने वाली है।

रक्षा विज्ञान के आलोक-स्तम्भ: डी. एस. कोठारी


यह एक त्रासदी ही है कि दृश्य के बुहत निकट रहे होने के कारण प्रायः हम उन व्यक्तियों और संस्थाओं को लगभग विस्मृति के गर्भ में ले जाते हैं जिनका महान् अवदान ऐतिहासिक महत्व का होता है। किन्तु झीलों की विश्वविख्यात नगरी उदयपुर में जन्मे डॉ. डी.एस. कोठारी तो ऐसी विलक्षण विभूतियों में थे, जिन्होंने अपनी मात्र एक पृष्ठीय वसीयत में इस निर्देश को रेखांकित किया कि जो भी धनराशि उन्होंने अहिंसा और विज्ञान के उन्नयन के लिए छोड़ी है, उसका उपयोग कहीं भी उनके नाम से न किया जाय। ऐसे निष्काम, किन्तु ऋषि-तुल्य विज्ञानी के नाम का स्मरण मात्र करना किसी वैदिक ऋचा का पाठ करने से कम नहीं है। दौलत सिंह कोठारी महान् वैज्ञानिक और शिक्षाविद् तो थे ही,  पर उन जैसे महामानव भी विरले ही होते हैं। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति और महान् वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने विज्ञान दिवस पर अपने भाषण और अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘’इग्नाइटेड माइन्ड्स’ में यह ठीक ही कहा था कि भारत के पुनर्निर्माण में जिन महान् वैज्ञानिकों की अमूल्य भूमिका रही है,  उनमें डॉ. डी.एस. कोठारी,  डॉ. होमी जहांगीर भाभा और डॉ. विक्रम साराभाई का अवदान ऐतिहासिक महत्व का है। इसके पूर्व कि डॉ. कोठारी के विज्ञान और शिक्षा जगत को दिये गये असाधारण योगदान को संक्षेप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जाये,  उनकी जीवन यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा।

दौलत सिंह कोठारी का जन्म 6 जुलाई 1906 को उदयपुर में हुआ था। उनके पिता फतेहलाल कोठारी एक अध्यापक थे और दुर्भाग्य से 38 वर्ष की आयु में ही अपनी पत्नी और चार अल्प वयस्क पुत्रों को छोड़कर इस संसार से विदा हो गये। दौलत सिंह कौठारी का शैक्षणिक जीवन असाधारण रूप से बहुत उज्जवल रहा। उदयपुर में प्रारम्भिक शिक्षा के बाद मेवाड़ के महाराणा द्वारा प्रदत्त 50 रूपये प्रतिमाह की छात्रवृत्ति पर वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उच्चतर अध्ययन के लिये चले गये,  जहां उन्होंने 1926 में बी. एससी.  और 1928 में एम. एससी.  की परीक्षा वायरलैस में विशेष अध्ययन के साथ उत्तीर्ण की। उस समय इलाहाबाद में मेघनाथ साहा जैसे श्रेष्ठ वैज्ञानिक भौतिकी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष थे। अल्प अवधि के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में डेमोन्सट्रेटर के पद पर कार्य करने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार की छात्रवृत्ति पर वे सितम्बर 1930 में इंगलैण्ड चले गये,  जहां उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय स्थित कैवेंडिश लेबोरेट्री में महान् वैज्ञानिक लॉर्ड रूथरफोर्ड के साथ कार्य किया। कैम्ब्रिज से पी- एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने के बाद वे अप्रेल 1933 में भारत लौटे और पुनः उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया। इसके थोड़े दिन बाद जैसे ही दिल्ली विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में एक रीडर का पद खाली हुआ,  उनके गुरू प्रोफेसर साहा ने उन्हें उस पद के लिए आवेदन करने का परामर्श दिया और वहां उनका चयन हो गया।

डॉ. डी.एस. कोठारी का दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर पर आना जैसे वहां के वैज्ञानिक विषयों से जुड़े विभागों में शिक्षण और शोध के क्षेत्र में एक क्रान्ति युग की शुरूआत थी। उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझा। सन् 1948 तक डॉ. कोठारी ने अपनी असाधारण प्रतिभा, कल्पनाशीलता और मानव कल्याण के लिए अर्जित अपनी उपलब्धियों को समर्पण-भावना के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय को जिन बुलंदियों पर पहुंचाया, उसका अनुमान लगाना आज बहुत कठिन है। अगस्त 1948 में भारत सरकार ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अनुरोध किया कि वे डॉ. कोठारी की सेवाएं वैज्ञानिक परामर्शदाता के रूप में उन्हें दे दें। विश्वविद्यालय ने तीन वर्ष के लिए उनकी सेवाएं रक्षा मंत्रालय को दीं, किन्तु इस अवधि में भी डॉ. कोठारी समय-समय पर विश्वविद्यालय में अपने छात्रों से रूबरू होते रहे। 1952 में वे विश्वविद्यालय में वापस लौट आये, किन्तु वे रक्षामंत्री के मानद परामर्शदाता लगभग एक दशक तक बने रहे। 1961 में उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, किन्तु दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद पर उनका स्थान यथावत् रखा गया,  जहां से वे 65 वर्ष की आयु में जुलाई 1971 में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद वे प्रोफेसर एमरिटस नियुक्त किये गये और आयु पर्यन्त उससे जुड़े रहे।

स्वाधीनता के बाद जैसे ही पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश की बागडोर संभाली,  उन्होंने इस यथार्थ को तुरन्त अनुभव कर लिया कि देश की नानाविध समस्याओं का निराकरण विज्ञान के माध्यम से ही हो सकता है। परिणामस्वरूप उन्होंने अनेक विशाल वैज्ञानिक शोध संस्थानों की स्थापना की। डॉ. होमी भाभा के नेतृत्व में अणु ऊर्जा आयोग बनाया,  तो डॉ. एस.एस. भटनागर के नेतृत्व में काउंसिल ऑफ  साइंटिफिक एंड इन्डस्ट्रीयल रिसर्च की शुरूआत की। इसके साथ ही रक्षा विज्ञान को संगठित करने का दायित्व डॉ. डी.एस. कोठारी को सौंपा गया। भारत सरकार ने रक्षा-विज्ञान को संगठित करने के मामलों में परामर्श देने के लिए इंग्लैण्ड के विश्व-प्रसिद्ध प्रोफेसर पी.एम.एस. ब्लैकेट को भी आमंत्रित किया,  जिन्होंने द्वितीय महायुद्ध में रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान किया था। यह संयोग ही था कि प्रोफेसर ब्लैकेट, नेहरू जी और डॉ. कोठारी दोनों के ही मित्र थे। कैम्ब्रिज में प्रोफेसर ब्लैकेट और कोठारी ने साथ ही अनुसंधान कार्य किया था। इस प्रकार डॉ. कोठारी का यह मैत्री सम्बन्ध भारत में रक्षा विज्ञान की ठोस आधारशिला रखने में बहुत सहायक हुआ। जून 1949 में सरकार ने रक्षा विज्ञान संगठन स्थापित करने का निर्णय लिया,  जिसकी शुरूआत 40 वरिष्ठ वैज्ञानिकों और 100 कनिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ हुई थी। आज यह संगठन इतना विस्तार पा गया है कि उसमें 25000 वैज्ञानिक सेवारत हैं। डॉ. कोठारी के प्रयत्नों से ही देश के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में प्रयोगशालाएं स्थापित की गई। डॉ. कोठारी ने इस तथ्य को भली भांति समझ लिया था कि रक्षा विज्ञान का लक्ष्य सशस्त्र सेनाओं की आवश्यकताओं की सम्पूर्ति करना था। विश्वविद्यालयों के तत्कालीन शान्त वातावरण की पृष्ठभूमि से सम्पन्न डॉ. कोठारी ने अपने मधुर स्वभाव और विनयशीलता से जल, थल और वायुसेना तीनों के ही प्रमुखों के साथ अपना अच्छा संवाद स्थापित कर लिया था। रक्षा मंत्रालय के अधिकारी और तीनों सेनाध्यक्ष डॉ. कोठारी के विस्तृत ज्ञान से बेहद प्रभावित थे। उनकी कार्यशैली लोगों के लिए एक उदाहरण बन गई थी। जब द्वितीय महायुद्ध में अमरीका ने जापान में नागासाकी और हिरोशिमा पर अणुबम का विस्फोट किया, उसके बाद डॉ. कोठारी ने इस विषय पर दो व्याख्यान दिये, जिनमें से एक सामान्य जन के लिए था और दूसरा मिलिट्री के अधिकारियों के लिए। पंडित नेहरू उनके विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यह प्रस्ताव किया कि डॉ. कोठारी और डॉ. भाभा इस विषय पर एक पुस्तक लिखें। पुस्तक का सारा लेखन डॉ. कोठारी ने ही किया और ’न्यूक्लियर एक्सप्लोजन्स एंड देयर इफैक्ट्स’ नामक यह पुस्तक भारत सरकार द्वारा 1956 में प्रकाशित की गयी। इस पुस्तक का रूसी, जापानी और जर्मन भाषाओं में अनुवाद हुआ। जर्मन अनुवाद की भूमिका में यह कहा गया कि डॉ. कोठारी की यह पुस्तक एक ऐतिहासिक कार्य था, जिसने इस विषय पर वैचारिक मंथन के द्वार खोल दिये थे।

डॉ. डी.एस. कोठारी की जन्म शताब्दी के अवसर पर एक श्रेष्ठ ग्रंथ ‘’विजन एण्ड वैल्यूज’ उनके सुपुत्र डॉ. ललित के. कोठारी और प्रो. रमेश के. अरोड़ा द्वारा संपादित किया गया था। पैरागॉन इन्टरनेशनल पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित इस वृहत् ग्रंथ में हमारे तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सहित 50 से अधिक विद्वानों ने,  जिनमें विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक, समाज विज्ञानी और संस्कृति पुरूष समाविष्ट हैं, विभिन्न विषयक अपने आलेखों में डॉ. कोठारी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एक स्वर से उन्हें भारत में रक्षा विज्ञान के अग्रदूत के रूप में रेखांकित किया है। नोबल पुरस्कार विजेता सर माइकल फ्रांसिस ने कहा कि डॉ. कोठारी एक विख्यात भौतिक विज्ञानी ही नहीं बल्कि महान् शिक्षाशास्त्री भी थे,  जिन्होंने भारत में उच्चतर शिक्षा को गतिशील बनाने में अपनी प्रभावी भूमिका अदा की थी।

डॉ. कोठारी विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म में भी गहरी रूचि रखते थे। उनकी मान्यता थी कि बहिरंग जगत तो विज्ञान के कर्मक्षेत्र और उसकी पड़ताल-परिधि में आता है,  किन्तु मनुष्य के भीतरी संसार के अनेक रहस्य ऐसे हैं,  जो विज्ञान की सीमा से परे हैं। संस्कृति पुरुष और प्राचीन भारतीय संस्कृति के व्याख्याता डॉ. कर्ण सिंह ने अपने एक संस्मरण में कहा है कि डॉ. कोठारी उनसे वेदान्त और विज्ञान के पारस्परिक सम्बन्धों पर अक्सर चर्चा करते रहते थे।

प्रसिद्ध रक्षा-वैज्ञानिक ए. नागरत्नम् ने भारत में 1948 से 1961 तक की अवधि को रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में कोठारी युग की संज्ञा दी है। उनका कथन है कि आज देश में जो रक्षा विज्ञान का हमारा संगठन है और जिसके अन्तर्गत इस समय देश के विभिन्न भागों में 50 प्रयोगशालाएं कार्य कर रही हैं, उसका श्रीगणेश दिल्ली में राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला की दूसरी मंजिल पर मात्र 20 कमरों में किया गया था। उन्होंने बहुत सीमित संख्या में जिन वैज्ञानिकों को वहां कार्य करने के लिए आमंत्रित किया, उन्हें आज की तरह वैज्ञानिक अधिकारी का पदनाम न देकर केवल साइंटिस्ट या वैज्ञानिक का ही पदनाम दिया था। वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में आज से लगभग 6 दशक पूर्व जब उन्हें ढाई हजार रूपये प्रति माह का वेतन देने की पेशकश की गई,  तो उन्होंने उसे लेने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के रूप में उन्हें जो 1250 रूपये प्रति माह का वेतन मिल रहा है,  वह पर्याप्त है। 1961 में जब वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के संस्थापक अध्यक्ष बने तो उसके साथ-साथ वे मानद विज्ञान परामर्शदाता भी रहे और मात्र एक रूपये प्रतिमाह का मानदेय उन्होंने स्वीकार किया।

रक्षा वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने अनुसंधान के लिये जिन मुख्य क्षेत्रों को चिन्हित किया उनमें आपरेशनल रिसर्च, बैलिस्टिक्स,  विस्फोटक,  शस्त्रीकरण,  रॉकेट्स और मिसाइल्स,  इलैक्ट्रानिक्स,  नौसेना सम्बन्धी तकनीकी,  इंजीनियरिंग,  खाद्य सामग्री,  जीवन विज्ञान,  प्रतिकूल पर्यावरण की समस्याएं और रक्षा सम्बन्धी संस्थानों में प्रशिक्षण आदि विषय मुख्य थे। वे कहा करते थे कि हमारे संसाधन सीमित हैं,  इसलिए हमें विज्ञान को पूरी तरह समझकर मितव्ययता के साथ और विवेक के साथ अपनी रक्षा-सामग्री का निर्माण करना चाहिए। इस संबंध में एक दिलचस्प प्रकरण का उल्लेख अक्सर किया जाता है। जब नाटो देशों द्वारा ग्नाट (Gnat) लड़ाकू विमान को नकार दिया गया,  तो नेहरूजी असमंजस में थे कि भारतीय वायुसेना के लिए उसे क्रय करें या नहीं। जब उन्होंने डॉ. कोठारी से परामर्श किया,  तो उन्होंने बड़े विमानों की तुलना में उस छोटे आकार के अल्पमौली विमान के लाभ उन्हें डाइग्राम बनाकर समझाए। उन्होंने मनोरंजक ढंग से उस मच्छर का उदाहरण दिया,  जिसकी गुन-गुन तो सुनाई देती है,  पर जिसे पकड़ना मुश्किल होता है। यह प्रकरण इस तथ्य का पुष्ट प्रमाण है कि डॉ. कोठारी प्रधानमंत्री के कितने विश्वासपात्र थे। डॉ. कोठारी की यह मान्यता थी कि विज्ञान और तकनीकी की प्रगति मानव कल्याण के लिए निरन्तर हो,  यह जरूरी है,  किन्तु वह संकट में पड़ जाएगी अगर उसके साथ-साथ मनुष्य का नैतिक विकास रूक गया और मानवता की भावना का क्षरण हो गया। उनका कहना था कि आत्म नियंत्रण और अहिंसा में आस्था के बिना विज्ञान और तकनीकी विकास,  गरीब और अमीर देशों के बीच में खाई को और अधिक चौड़ा  करता चला जायेगा।

डॉ. कोठारी अपने निजी जीवन में कितने सरल और विनयशील थे,  इसकी कल्पना करना कठिन है। उनके घर में विवाह जैसा कोई मांगलिक कार्य होता तो प्रकटतः उसमें समाज के हर क्षेत्र के शीर्ष लोगों का जमघट तो होता ही,  किन्तु डॉ. कोठारी ऐसे अवसर पर अपने गृहसेवकों को भी अतिथि के रूप में आमंत्रित करना नहीं भूलते थे,  और स्वयं उनकी आवभगत करते थे।

प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक ‘’बिटवीन दी लाइन्स’ में एक बड़ा दिलचस्प रहस्योद्घाटन किया है,  जिसमें कहा गया है कि जब मोरारजी देसाई ने मंत्री बनने से इन्कार कर दिया तो लालबहादुर शास्त्री ने जगजीवन राम से संवाद न करके डॉ. होमीभाभा और डॉ. डी.एस. कोठारी दोनों को मंत्री पद देने की पेशकश की,  किन्तु दोनों वैज्ञानिकों ने इस आमंत्रण को विनयशीलता के साथ अस्वीकार कर दिया। अमेरिका के चिकित्सा विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक जार्ज वाल्ड जिनके साथ कोठारीजी का जीवन्त सम्पर्क था,  जब उन्हें कोठारी जी के निधन की सूचना मिली तो उन्होंने बड़े मर्मस्पर्शी शब्दों में अपने संवेदना-संदेश में कहा था कि मैंने उनके साथ एक पुस्तक लिखने की योजना बनाई थी,  किन्तु उनका हस्तलेख ऐसा था जिसे पढ़ने में बड़ी कठिनाई होती थी। वाल्ड के साथ दिल्ली में जब पहली बार उनकी मुलाकात हुई,  तो दोनों वैज्ञानिक इस बात पर सहमत थे कि मनुष्य द्वारा अब तक की गई सबसे बड़ी खोज इस सत्य को पाना है कि इन्द्रियों को जो प्रिय लगता है,  जरूरी नहीं कि वह मानव कल्याण के लिए भी उपयुक्त हो। अहिंसा,  नैतिकता और सारी समाज व्यवस्था इसी तत्व-चिन्तन की उपज है।

डॉ. कोठारी नैतिक मूल्यों के बड़े जबर्दस्त पक्षधर थे। उनके पुत्र ललित के. कोठारी जो सवाई मानसिंह मेडीकल कॉलेज में शरीर विज्ञान के सरनाम प्रोफेसर रहे हैं, उन्होंने अपने एक आलेख में कहा है कि अपने अंतिम दिनों में जब उनके पिता उनके साथ रह रहे थे,  तो उनके इस द्वितीय पुत्र ने कोई व्याधि न होते हुए भी उनकी शारीरिक जांच कराने का प्रस्ताव किया था। इसके उत्तर में पिता ने इतना ही कहा ‘’तुम्हें यह समझना चाहिए कि अब मेरे लिए कोई कार्य करना शेष नहीं है।‘

भारत की स्वातंत्र्योत्तर बौद्धिक विरासत के अविछिन्न अंग दौलत सिंह कोठारी 4 फरवरी 1993 को बिना किसी को कोई कष्ट दिये नींद में ही इस मर्त्यलोक को छोड़कर गोलोकवासी हो गये। जिस समय उन्होंने अपना देह त्याग किया, उस समय भी उनके तकिये के नीचे गीता और भक्तामर स्तोत्र की प्रतियां रखी थीं।

एक आला अफ़सर का सांस्कृतिक संकल्प


प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति के विश्व-विख्यात् विद्वान् और राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डॉ. गोविन्द चन्द्र पांडेय के छोटे भ्राता विनोद चन्द्र पांडेय राजस्थान काडर के बड़े प्रखर बुद्धि आई.ए.एस. अधिकारी और सृजनधर्मी थे। जयसलमेर के जिला कलक्टर रहने के बाद जब वे 1962 में राजस्थान सचिवालय में वित्त विभाग के उपशासन सचिव होकर आये,  तो यह पद संभालने के चन्द दिनों बाद ही उन्होंने अपने विद्यानुराग के कारण मुझसे संपर्क की पहल की। मैंने ही उनके प्रथम उपन्यास ‘’रेत, शून्य, हवा’ की समीक्षा लिखी थी। साहित्यिक मैत्री की यह शुरूआत कुछ ऐसे शुभ मुहुर्त में हुई कि वह निरन्तर पल्लवित होती रही और उनके कैबीनेट सचिव बनने से लेकर बिहार, पश्चिम बंगाल और अरूणाचल प्रदेश का गवर्नर पद धारण करने और अन्ततः 73 वर्ष की आयु में गोलोकवासी होने तक बनी रही। दोनों की हैसियत में जमीन-आसमान का अन्तर होने के बावजूद मेरे अन्तरंग संबंधों की कल्पना इससे की जा सकती है कि उनके नई दिल्ली निवास डी-41 भारती नगर में ही अक्सर मेरा दिल्ली-प्रवास का समय कटता था।

उन्होंने अपना एक काव्य-संग्रह भी मुझे डेडीकेट किया था। पांडेय जी बड़े उर्वर मस्तिष्क के धनी थे। राज्य का विशिष्ट योजना-संगठन जो पूरे देश में चर्चित था,  उन्हीं की सूझ-बूझ से खड़ा हुआ था। वे बड़े दम-खम वाले और अपने नवाचारी विचारों को दृढ़ संकल्प के साथ क्रियान्वित करने वाले व्यक्ति थे। उनके कक्ष में एक मन्दिर का सुन्दर मॉडल सुसज्जित था। उनकी दृढ़ धारणा थी कि हमारे असंख्य देवालयों को संस्कृत और संस्कृति के केन्द्रों में विकसित किया जा सकता है। सन् 1982 में केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर जाने से कुछ दिनों पूर्व ही उन्होंने यह हठ कर लिया कि नई पीढ़ी को भारतीय जीवन मूल्यों में संस्कारित करने के लिए रामचरित मानस और महाभारत की प्रतियाँ राज्य के समस्त माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में पहुँचाई जायें। पर उनकी डैड लाइन के अनुसार यह संकल्प साकार कैसे हो,  यही समस्या थी। उन्होंने एक वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी,  विनय व्यास को जो रूसी भाषा के प्रकांड विद्वान् थे,  और मुझे गीता प्रेस गोरखपुर भेजा। दुर्भाग्य से वहाँ तब कुछ आन्तरिक अव्यवस्थाएं चल रही थी। दोनों ग्रन्थों की लगभग 10 हजार प्रतियाँ वे देने की स्थिति में नहीं थे,  फिर भी उन्होंने हमें ये दोनों ग्रन्थ राज्य सरकार के स्तर पर छपाने का अधिकार पत्र इस शर्त के साथ दे दिया कि यदि ये ग्रन्थ समूल्य दिये जायेंगे,  तो इनकी कीमत वही रहेगी,  जो गोरखपुर संस्करणों पर छपी थी। हम दोनों वापस लौट आये। अब समस्या यह थी कि इसके लिए फंड कहाँ से आये। पांडेयजी स्वयं तो उस समय रीजनल स्कीम्स और समाज कल्याण के सचिव थे। पर पांडेयजी का दबदबा कुछ ऐसा था कि वे दूसरे विभागों में भी हस्तक्षेप कर लेते थे। उस समय के.के. भटनागर शिक्षा सचिव थे। ज्ञात हुआ कि उनके पास ‘आपरेशन ब्लैक बोर्ड’ स्कीम के तहत 21 लाख रूपये हैं। डॉ. आदर्श किशोर सक्सेना उस समय मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर के सचिव थे और पांडेय जी उन्हें बहुत वत्सल भाव से देखते थे। शायद इसलिए भी कि वे आदर्शजी के सबसे बड़े भाई डी.के. सक्सेना के मित्र थे, जिन्होंने एक मोड़ पर आई.ए.एस. छोड़कर संयुक्त राष्ट्र की सेवा का स्थायी रूप से वरण कर लिया था। स्मृति धोखा नहीं देती तो अनुमानतः 7 लाख रूपये पांडेयजी को इस पुण्य कर्म के लिए मिल गये। लेकिन मुद्रण की लागत गीताप्रेस गोरखपुर की कीमतों के समतुल्य कैसे आये। मेरी जानकारी के आधार पर उन्होंने कुछ प्रकाशकों की मीटिंग बुलाई। केवल एक साहसी प्रकाशक इस शर्त के साथ तैयार हुआ कि राष्ट्रीय पाठ्य पुस्तक मंडल से उन्हें अपने भंडार से रियायती दरों पर कागज मिले और आयकर विभाग इन दो महान् ग्रन्थों के प्रकाशन को लाभ का उपक्रम न माने। पांडेयजी ने पाठ्य पुस्तक मंडल के चेयरमैन और चीफ कमिश्नर इन्कम टैक्स को सादर आमंत्रित किया इन दोनों शर्तों से सहमत होने के लिए। पांडेय जी की वाणी में ही कुछ ऐसा प्रभाव था कि समझौता होते कुछ देर नहीं लगी। निश्चित तिथि तक दोनों पुनीत ग्रन्थ छापने के लिए जिस प्रकाशक ने चुनौती स्वीकार की थी,  उसे निर्धारित सरकारी प्रक्रिया के अनुसार आदेश दे दिया गया।

पुस्तकें छपकर तैयार हुई ही थी,  कि पांडेयजी 1982 के किसी माह में योजना आयोग में परामर्शदाता बनकर चले आये। मकान तुरन्त मिला नहीं,  वे राजस्थान हाउस में ही ठहरे थे। कोई सप्ताह बाद ही फोन आया कि ‘मन नहीं लग रहा। तुम थोड़े दिन के लिए आ जाओ।‘  मैं जयपुर में इन्हीं दिनों मुक्त छन्द में छपा उनका वैराग्य-शतक का अनुवाद लेकर राजस्थान हाउस पहुँच गया। आग्रह था कि जब तक रहूँ शाम का भोजन उन्हीं के साथ करूँ। एक दिन रात को जब भोजनोपरान्त पांडेयजी मुझे वैराग्य शतक के अपने रूपान्तर के कुछ अंश सुना ही रहे थे कि वहाँ अचानक विनय व्यास आ टपके। व्यासजी अपने नाम के अनुरूप ही बहुत विनयशील थे। वे हमारे पास के सोफे पर आकर बैठे ही थे कि पांडेयजी गरजे “विनय,  तुम अभी यहाँ से भाग जाओ, तुमने मदिरा पी रखी है,  तुम अभी तमस भाव में हो और हम साहित्य की सुरसरि में अवगाहन कर रहे हैं।“ विनय व्यास पांडेयजी से कुछ ही बैच नीचे के अधिकारी थे,  और अपनी विद्वत्ता के लिए भी सरनाम थे। मुझे पांडेयजी का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा। मैंने उन्हें अपनी भावनाएं आहत होने से भी अवगत कराया। दूसरे दिन विनय व्यासजी के साथ मुझे भी नाश्ते पर बुलाया। बड़ी मनुहार से गोविन्द जी और प्रेमजी नामक वेटर्स ने हमें नाश्ता कराया। वे दोनों पहाड़ी थे,  इसलिए पांडेजी को विशेष प्रिय थे।

विनय व्यास उस समय प्राथमिक शिक्षा आयुक्त थे और सोवियत लैंड से लौटने पर उन्हीं की खातिर उस पद को अपग्रेड किया गया था।

पांडेय जी को हम दोनों से यह जानकारी प्राप्त कर परम संतुष्टि हुई थी कि रामचरितमानस और महाभारत इन दोनों ग्रन्थों का वितरण उनके केन्द्र में आ जाने पर भी यथा समय शालाओं में हो चुका था। पांडेय जी के साथ मेरे संबंधों ने मुझे एक ही सबक सिखाया कि याचना से व्यक्ति छोटा हो जाता है। मनुष्य की विश्वसनीयता आज नष्ट हो चुकी है। फिर भी कहना चाहूँगा कि मैंने पांडेय जी से कभी कोई याचना नहीं की और कदाचित् इसलिए उन जैसे कद्दावर व्यक्ति से मेरा भावनात्मक रिश्ता तीन दशक तक चलता रहा।

बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

अखबारों के भरोसे हकूमत नहीं होती


वनस्थली विद्यापीठ जैसी महिला-शिक्षा की विश्व प्रसि़द्ध संस्था के संस्थापक और विधान सभा के अस्तित्व में आने से पूर्व राजस्थान के प्रथम मनोनीत मुख्य मंत्री पं. हीरालाल शास्त्री अपनी योग्यता और नेतृत्व क्षमता दोनों के लिए विख्यात् थे। जिस काल खंड में वे स्वल्प अवधि के लिए सत्तारूढ़ हुए, उस समय उनका पदनाम प्रधान मंत्री था,  जिसमें बाद में परिवर्तन हुआ। शास्त्री जी की लेखन-क्षमता अद्भुत थी। उन्होंने बड़ी संख्या में जन-जागरण और नारी-चेतना के गीत ढूंढ़ाड़ी बोली में लिखे थे। वे हिन्दी,  अंग्रेज़ी और संस्कृत तीनों भाषाओं में पारंगत थे,  पर उनके अनेक असाधारण गुणों के साथ उनका सबसे बड़ा अवगुण उनका अहंकार था। इस अवगुण के कारण ही आगे चलकर राजनीति के क्षेत्र में उनका पराभव हुआ। उनकी अहमन्यता से जुड़े कुछ रोचक प्रसंगों में एक बहुचर्चित प्रसंग अखबारी दुनिया से सम्बंधित है।

अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत सजग रहने वाले शास्त्री जी अपने मुख्य मंत्रित्व काल में एक बार विश्राम के लिए तीन दिन के अज्ञातवास में गए। जाने से पूर्व उनकी सबसे बड़ी हिदायत अपने निजी सचिव को यह थी कि उन्हें विश्राम काल में अखबार नहीं भेजे जाएं। उनसे मानसिक शान्ति भंग होती है। जब उनके अति विश्वास पात्र ने समाचार पत्रों के प्रातःकालीन अवलोकन की अनिवार्यता बताई, तो उन्होंने फटकार लगाते हुए कहा-‘”अखबारों के भरोसे हकूमत नहीं चलती। क्या मैं अखबारों से ही राज्य की हलचल जान सकूंगा?” बेचारे निजी सचिव के पास आदेशों की अनुपालना के सिवा क्या विकल्प हो सकता था!

इसी प्रकार जब वे मुख्य मंत्री थे,  तो उन्होंने अपने एक पुराने कार्यकर्ता और वनस्थली में रहे अपने पूर्व निजी सचिव इन दोनों को,  जो अब उनके विरोधी हो गए थे और सक्रिय राजनीति में आ कर वे जय नारायण व्यास और टीका राम पालीवाल का समर्थन कर रहे थे,  एक बार गाड़ी भेज कर अपने बनीपार्क स्थित निवास पर आमंत्रित किया। दोनों व्यक्ति कदाचित् मन ही मन पुलकित हुए होंगे। पर जब वे वहां पहुंचे, तो लम्बे इन्तज़ार के बाद उन्हें भीतर बुलाया और बोले- ‘”मैंने तुम दोनों को यह कहने बुलाया है  कि तुम दोनों चूहे हो और मैं डूंगर हूं। चूहे चाहें तो डूंगर में बिल बना कर रह सकते हैं,  डूंगर को उखाड़ कर नहीं फेंक सकते। बस तुम्हें इतना ही बताना था। अब जा सकते हो।“  बेचारे दोनों बड़े बे आबरू हो कर नीचे आए, जो गाड़ी उन्हें लेने गई थी,  वह वहां से नदारद थी। लाचार होकर दोनों को पैदल ही लौटना पड़ा।

उन का अहंकार सत्ता से च्युत होने पर भी कम नहीं हुआ था। वे मुख्य मंत्री पद से हटने के कई साल बाद एक बार टोंक या मालपुरा क्षेत्र की यात्रा करते हुए एक डाक बंगले में ठहरे। वहां के वी. आई. पी. कक्ष में उन्होंने देखा कि एक पंक्ति में जिन राज नेताओं की तस्वीरें लगी हैं,  उनमें एक तस्वीर उनकी भी है। शास्त्री जी के तीखे तेवर सजग हो उठे। डाक बंगले के मैनेजर को बुला कर बोले-‘”ये जो तस्वीरें लगा रखी हैं,  उनमें से मेरी तस्वीर उतरवालो। किन कीड़े-भुनगों के साथ मेरी तस्वीर को टांग दिया गया है।“  बेचारा मैनेजर स्तब्ध रह गया। करता भी तो क्या करता।

पटवारी कॉट रेड हैंडेड......


घटना कोई पचपन बरस पहले की है। पांचवे दशक के उत्तरार्द्ध का यह कालखंड उस दौर में था,  जब अंग्रेज़ी के संवाददाता सरकारी सर्किल्स में साहबों की तरह समझे जाते थे। हिन्दी संवाददाताओं और अन्य पत्रकारों को प्रायः अंग्रेज़ी के अखबार नवीसों की तुलना में कमतरी का एहसास कराया जाता था और कुछ अपवादों को छोड़ कर वे स्वयं भी इस कॉम्प्लेक्स से पीड़ित रहते थे। अंग्रेज़ी अखबारों के प्रतिनिधियों में एक मिस्टर राणा थे। वे स्टेट्समैन के विशेष संवाददाता थे, उन दिनों में जब इस अखबार की धाक थी और इसे पढ़ने वाला वर्ग भी समाज का उच्चतर अंग्रेज़ी प्रेमी भद्रलोक होता था। राणा एक बड़ी कार में चलते थे और उनकी दम्भोक्तियां अक्सर चर्चा का विषय रहती थीं। कार में चलने वालों में एक अन्य पत्रकार टाइम्स आव इंडिया के वाई. डी. लोकुरकर थे। वे एक ऐसी नन्ही बेबी फिएट कार में चलते थे,  जिसमें केवल दो लोग ही बैठ सकते थे। तब इस कार की कीमत मात्र 6900 रुपए होती थी। कौतूहलवश मैंने इसकी कीमत की जानकारी स्थानीय डीलर से प्राप्त कर ली थी। अंग्रेज़ी के जिन पत्रकारों के पास कारें नहीं थीं,   उनकी सेवा में राजन्य वर्ग के लोगों की कारें प्रायः उपलब्ध रहती थीं। अंग्रेज़ी अखबारों के इन प्रतिनिधियों का मिज़ाज भी स्वाभाविक रूप से भिन्न-भिन्न था। राणा साहब की यह गर्वोक्ति कि स्टेट्समैन उन्हें इतना भारी भरकम वेतन देता है कि उसके सामने राज्य के मुख्य सचिव का वेतन भी बहुत बौना है, एक प्रकार से उनका तकिया कलाम ही बन गया था।

राणा साहब के इस मिज़ाज की बात छोड़ दें,  तो अन्य पत्रकार एक प्रकार का गांभीर्य अपनी संवाद शैली में ओढ़े रहते थे। उनकी मितभाषिता मेरी अपनी दृष्टि में उनके लोक व्यवहार की व्यूह रचना अधिक प्रतीत होती थी,  चारित्रिक बुनावट का अंग नहीं। यहां यह उल्लेख भी प्रासंगिक होगा कि स्टेट्समैन के जो अन्य संवाददाता डी. डी. भारद्वाज साहब आए वे बड़े गंभीर और सी.वाई. चिन्तामणि जैसे महान् लोगों के साथ कार्यरत रहे उच्चतम पत्रकारी प्रतिमानों का पालन करने वाले व्यक्ति थें। बाद में सेवा निवृत्त हो कर वे यहीं बस गए थे। बहरहाल।

यहां प्रस्तुत रोचक प्रसंग वाई. डी. लोकुरकर साहब से संबंधित है। वे नाटे कद के महाराष्ट्रियन थे। उनका सिर लगभग गंजा था,  किन्तु खुशमिज़ाजी और मराठी नाटककारों की तरह अपने सम्भाषण में गज़ब का गुड ह्यूमर और वक्रोक्ति क्षमता रखते थे। न जाने मेरे प्रति वे किंचित् मोहाविष्ट क्यों हो गए थे, पर जब भी जन सम्पर्क निदेशालय की समाचार शाखा में आते तो मुझसे ज़रूर संवाद करते थे। वे अक्सर पूछते ‘कहिए क्या कोई ठीक-ठाक खबर है?  मैं उन्हें उत्तर देता उसके पहले ही वे हंस कर प्रहार करते-‘क्या खबर होगी। बस यही कि पटवारी कॉट  रेड हैंडेड,   टेकिंग फुल पान एन्ड हाफ बीड़ी। अर्थात् पटवारी एक पान और आधी बीड़ी की रिश्वत  लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। उनकी ऐसी एक नहीं,   अनेक दिलचस्प वक्र व्यंजनाएं होती थीं। पर आधी सदी पहले के उनके रोचक जुमले अब विस्मृतियों के जंगल में खो गए हैं।





मुख्य मंत्री पर वैदिक विद्वान का कटाक्ष


पंडित मोती लाल जी शास्त्री और वैदिक अध्ययन-अनुसंधान के लिए उनका संस्थान पूरे भारत में ही नहीं,  समुद्र पार भी विख्यात था। वैदिक साहित्य पर उन्होंने अपने जीवन काल में 80 हज़ार से अधिक पृष्ठ लिखे थे। एक समय था जब देश के अनेक विद्वान् दूर-दूर से दुर्गापुरा स्थित मानवाश्रम में आकर पंडित जी से मार्ग दर्शन प्राप्त करते थे। डॉ  वासुदेव शरण अग्रवाल तो वहां प्रायः प्रति वर्ष आ कर लम्बी अवधि तक रहते थे। पंडित जी की वैदिक विद्वत्ता का इससे बड़ा सम्मान क्या हो सकता था कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें आमंत्रित कर उनके चरण पखार कर उनका अभिनन्दन किया था। मोती लाल शास्त्री जी ने वहां जो चार व्याख्यान दिए उनका संकलन आज भी अनुसंधित्सुओं के लिए मूल्यवान् संदर्भ सामग्री है। पंडित जी अपने प्रिय जनों और जयपुर वासियों से ढूंढ़ाड़ी में ही वार्तालाप करते थे,  पर संस्कृतनिष्ठ इतने थे कि विद्वानों के साथ पत्राचार में वे अक्सर अपने नाम का भी संस्कृत रूपान्तर कर मोती लाल के स्थान पर ‘’मुक्त रक्त’ शब्द का प्रयोग तक करने से नहीं चूकते थे।

पंडित मोती लाल शास्त्री ने अपने ग्रन्थों के प्रकाशन  के लिए जयपुर में बालचंद्र मुद्रणालय भी स्थापित किया था,  जो इस क्षेत्र के लोगों द्वारा जयपुर का अपने ढंग का प्रथम प्रिंटिंग प्रेस बताया जाता है। उनके अपने अनेक ग्रन्थ इसी मुद्रणालय में छपे थे।

मोती लाल शास्त्री जी के श्रद्धालुओं में अनेक विद्यानुरागी श्रेष्ठी जन कलकत्ता में थे,  जो मारवाड़ी उद्योग पतियों का बड़ा केन्द्र रहा है। उनके आमंत्रण पर जब पंडित जी कलकत्ता जाते थे,  तो विदा होते समय उन्हें जितनी बहुमूल्य भेंट दी जाती थी,  उसी के कारण शास्त्री जी बड़े समृद्ध विद्वानों में माने जाते थे। निकटस्थ लोगों का कथन है कि उनके यहां सोने-चांदी के बर्तन बड़ी संख्या में थे। पंडित जी उन दिनों में भी कार में चलते थे,  जब किसी संस्कृत विद्वान् के पास ऐसी वाहन-सुविधा दुर्लभ थी।

पंडित जी को अंग्रेज़ी बिल्कुल नहीं आती थी। इसलिए उनकी वैदिक व्याख्याओं को अंग्रेज़ी में उपलब्ध कराये जाने की बड़ी आवश्यकता थी। इस आवश्यकता की पूर्ति  की, तब जयपुर में कार्यरत पेट्रियट और लिंक के विशेष संवाददाता ऋषि कुमार मिश्र ने,  जो आगे चल कर इन पत्रों के संपादक बनने के साथ-साथ संसद सदस्य भी बने  और उनका प्रभाव राजनीतिक क्षेत्रों में भी असाधारण रूप से उल्लेखनीय रहा। ऋषि कुमार मिश्र पंडित मोती लाल शास्त्री के पट्ट शिष्य हो गए और उन्होंने लम्बी अवधि तक उनके सन्निकट रहकर वैदिक ज्ञान को आत्मसात् किया। इसी बीच मिश्र जी को दिल्ली शिफ्ट करना पड़ा और एक लम्बे अर्से बाद उनका अंग्रेज़ी में लिखित बहुचर्चित ग्रन्थ ^Before the Birth and After the Death* प्रकाशित हुआ,  जो उनके अपने गुरु से अर्जित ज्ञान पर ही आधारित था। पर तब तक इतना विलम्ब हो चुका था कि मोती लाल शास्त्री बहुत पहले ही गोलोक वासी हो चुके थे। बाद में आगे चलकर कीर्ति-पुरुष कर्पूर चंद्र कुलिश  ने भी पंडित जी द्वारा छोड़ी गई सामग्री का पूरा लाभ उठाया और शास्त्री जी के पुत्र कृष्ण चंद्र शर्मा  से पंडित जी के ग्रन्थों और अप्रकाशित सामग्री को प्राप्त करने के साथ ही पं मधुसूदन ओझा जी के ग्रन्थों के आधार पर अध्ययन कर वे भी वेद-मर्मज्ञ के रूप में पहचाने जाने लगे।

अब भले ही सारा परिदृष्य बदल गया है,  पर मानवाश्रम का परिसर तब बहुत विशाल  था। उनका उद्यान तो आम्र कुन्जों के लिए मशहूर ही हो गया था। एक रोचक प्रसंग इसी से संबंधित है। शास्त्री जी ने अपने वैदिक संस्थान के लिए राज्य सरकार से कभी कोई सहायता नहीं ली थी। फिर भी अपने श्रद्धालुओं द्वारा बहुत आग्रह किए जाने पर उन्होंने अपने समधी और राज्य सरकार के गृह मंत्री राम किशोर व्यास के माध्यम से मुख्य मंत्री मोहन लाल सुखाड़िया को मानवाश्रम में आमंत्रित किया। सुखाड़िया जी निर्धारित समय पर अपनी राजसी ताम-झाम के साथ संस्थान में पधारे। गर्मजोशी  के साथ उनका सादर सत्कार होने के बाद कोई दो घंटे तक पंडित मोती लाल शास्त्री उन्हें वेद-विज्ञान पर अपने काम के बारे में समझाते रहे और मुख्य मंत्री जी धैर्य पूर्वक सुनते रहे। अन्ततः जब विदाई का समय आया तो सुखाड़िया जी ने चलते-चलते कहा-‘’पंडित जी! आपका आमों का बगीचा बड़ा सुन्दर है।‘  इतना सुनना था कि शास्त्री जी ने कटाक्ष किया: ‘’करम फूट गए। दो घंटे तक माथा पच्ची की और समझ में आया,  तो यह आया।‘  मुख्य मंत्री जी केवल मुस्कुराए और उनका काफिला वापस चल पड़ा। पंडित मोती लाल जी शास्त्री की राज्य के मुख्य मंत्री पर यह वक्रोक्ति बहुत दिनों तक ब्यूरोक्रेसी और पत्रकारों की गपशप में चर्चा का विषय बनी रही।

रे मूर्ख! कोटिश: कह


जो लोग बीकानेर के डॅूंगर कालेज में पढ़े हैं उनसे और राजस्थान की पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों से पं. विद्याधर शास्त्री का नाम अजाना नहीं है। वे प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ  दशरथ शर्मा के बड़े भाई थे। संस्कृत का अध्यापन करने के साथ-साथ वे देव वाणी में काव्य रचना भी उच्च कोटि की करते थे। प्रकृति से बड़े विनोदी और वत्सल स्वभाव के थे। अपने शिष्यों को बेहद प्यार करने वाले और आवश्यकता होने पर फटकार लगाने में भी नहीं चूकते थे।

साहित्य अकादमी के प्रारम्भिक वर्षो में अकादमी के संस्थापक-अध्यक्ष पं. जनार्दन राय नागर विभिन्न नगरों से साहित्यिक विषयों पर उपनिषदों का,  जिन्हें आजकल सेमिनार कहा जाता है,  आयोजन कराते थे। इन उपनिषदों में शास्त्री जी अवश्य  सहभागिता करते थे। प्रतिभागियों की संख्या अधिक होने पर समूहों में वैचारिक मंथन होता था। दो-तीन बार ऐसा संयोग हुआ कि शास्त्री जी की अध्यक्षता वाले समूह में इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल था। मध्यान्होत्तर सत्र में शास्त्री जी बड़े उतावले हो जाते थे और झटपट समापन करने की चेष्टा करते थे। बात दर असल यह थी कि शास्त्री जी को भंग पीने का व्यसन था। एक बार ऐसा हुआ कि विचार-विमर्श  में शाम के पांच बजने को आए। ऐसे में पंडित विद्याधर शास्त्री सत्र समाप्ति के लिए बहुत आतुर हो उठे और हॅंसते हुए लगे कहने‘ ‘हरे! हरे! पंडितों! समय विशिष्ट हो चुका है। व्यर्थ ही क्यों तर्क-कुतर्क कर रहे हो। जो कुछ सत्य है वह तो वेद इत्यादि में पहले ही कह दिया गया है।‘ प्रतिभागियों ने करतल ध्वनि के साथ हॅंसते हुए सत्र समाप्त कर दिया।

शास्त्री जी से सम्बंधित एक और दिलचस्प प्रसंग है। जैसा कि कहा जा चुका है, शास्त्री जी  अपने शिष्यों को बड़े वत्सल भाव से देखते थे। कोई शिष्य किसी ऊॅंचं पद पर पहुंच जाता तो वे बहुत गर्व का अनुभव करते थे। शास्त्री जी के षिष्यों की लम्बी कतार में इतिहास के विद्वान् नाथूराम खड़गावत भी थे। खड़गावत मूलतः इतिहास के प्राध्यापक थे। किन्तु कुछ समय बाद मुख्यमंत्री सुखाड़ि़या जी ने उन्हें राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखने का काम सोंपा। खड़गावत जी ने बड़ी मेहनत से पहला वॉल्यूम तैयार किया,  जिसका नाम था ‘ राजस्थान ड्यूरिंग 1857। तारीख तो याद नहीं,  पर किसी ऐतिहासिक दिन पर इस ग्रन्थ के विमोचन का आयोजन बीकानेर में किया गया। स्वयं मुख्यमंत्री ने विमोचन किया। भारी भीड़ थी। बड़ा भव्य समारोह था। जैसे ही समारोह सम्पन्न हुआ,  परम्परा के  अनुसार पुस्तक के लेखक खड़गावत जी धन्यवाद देने के लिए उठे। जैसे ही उनके मुख से ये शब्द  उच्चारित हुए -‘”देवियो और सज्जनो! मैं आप लोगों को कोटिश  धन्यवाद देता हूं,   कि बीच ही में ही खड़गावत जी के गुरु शास्त्री जी ज़ोर से चिल्लाए -‘रे मूर्ख! कोटिश:  कह।‘  सब हक्के-बक्के रह गए। खड़गावत जी ने मंच से ही अपने गुरु से क्षमा याचना करते हुए अपनी भाषिक त्रुटि में संशोधन किया। समारोह की समाप्ति पर खड़गावत जी नीचे उतर कर आए,  गुरु के चरण स्पर्श  किए और उन पर आशिषों की झड़ी लग गई। ऐसे थे विलक्षण गुरु और ऐसे थे सहिष्णु शिष्य!  

जयपुर आकाशवाणी की पुरानी यादें और कोड़ाराम की चाय


आकाशवाणी से मेरा रिश्ता  लगभग 68 साल पुराना हो चुका है। मेरा पहला प्रसारण दिल्ली से हुआ था,  जिसे ‘’चित्रलेखा’  के ख्यातनाम लेखक भगवती चरण वर्मा ने रैकर्ड किया था। यह भी एक सुखद संयोग ही था कि 1955 में जब आकाशवाणी के जयपुर केन्द्र का उद्घाटन राजस्थान के राज प्रमुख सवाई मान सिंह ने किया था,  तो उसका श्रीगणेश  राजस्थान की प्रशस्ति में लिखे गए मेरे गीत से ही हुआ था। उसके बाद तो इस केन्द्र से निरन्तर बड़ा आत्मीयतापूर्ण जुड़ाव रहा। जयपुर केन्द्र की जब स्वर्ण जयन्ती निदेशक धर्मपाल के कार्यकाल में मनाई गई,  तो मुझे अन्य विद्वानों और कलाकारों के साथ सम्मानित भी किया गया। बहरहाल।

पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे याद आते हैं वे कद्दावर लोग,  जिन्होंने जयपुर केन्द्र को बड़ी हैसियत दी थी। केन्द्र के सबसे पहले प्रभारी सहायक निदेशक सत्य प्रकाश  कौशल थे। उन्हीं की देख-रेख में केन्द्र का भव्य उद्घाटन हुआ था। वे जल्दी ही स्थानान्तरित हो कर पूना चले गए, जहां उनका आकस्मिक निधन हो गया। उनके जाने के बाद एक और सहायक निदेशक आए डॉ  समर बहादुर सिंह, जिन्होंने रहीम पर बड़ी महत्वपूर्ण गवेषणा की थी। समर बहादुर सिंह तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री राम सुभग सिंह के दामाद थे। उनके बाद निदेशक स्तर के अधिकारियों ने केन्द्र को सम्भाला,  जिनमें रोमेश  चंद्र,  प्रताप कृष्ण और गोपाल दास जी तो अपनी कार्यशैली और विद्वत्ता के लिए इतने विख्यात हुए कि उनके नाम आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। रोमेश  चंद्र अपने प्रशासनिक कौशल,  उच्च स्तरीय जन सम्पर्क और लेखकों से सक्रिय संवाद के लिए सुपरिचित रहे,  तो गोपाल दास जी एक श्रेष्ठ लेखक और आकाशवाणी केन्द्र संचालन में दीर्घ अनुभव के धनी थे। जयपुर के बुद्धिजीवियों के बीच वे बड़े लोकप्रिय हुए और सेवा निवृत्ति पर यहीं बस गए। कोई लगभग 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। हिन्दी की विख्यात् लेखिका रजनी पनिकर भी इस केन्द्र की निदेशक रहीं,  किन्तु अपने कड़े अनुशासन के कारण वे थोड़ी विवादास्पद हो गईं थीं। यहां से स्थानान्तरित हो कर वे आकाशवाणी कलकत्ता जैसे बड़े केन्द्र की निदेशक बनीं।

दूसरी पंक्ति में जिन अनुभवी और प्रतिभावान् लोगों ने जयपुर केन्द्र के कार्यक्रमों को सुदूर तक चर्चित बनाया,  उनमें हिन्दी के प्रख्यात आलोचक रहे ललिता प्रसाद सुकुल के भतीजे गंगाधर शुक्ल,  ब्रह्म स्वरूप बहल,  गंगा प्रसाद माथुर,  एन. आर. टंडन,  मिस्टर विकर्स और लक्ष्मण टंडन के नाम विशेष  रूप से उल्लेखनीय हैं। गंगाधर शुक्ल तो इस समय 94 वर्ष के हैं और कुछ समय पूर्व ही उन्होंने अपनी एक पुस्तक ‘’वक्त गुज़रता है’  भेजी थी,  जिसमें जयपुर की यादें बड़ी खूबसूरती से संजोयी गई हैं। लक्ष्मण टंडन सेंट स्टीफन्स के प्रोडक्ट थे और वे कुछ समय बाद प्रसिद्ध पत्रकार अपने मित्र चंचल सरकार के आग्रह पर प्रेस इंस्टीट्यूट में ओ.एस.डी. होकर चले गए थे,  जहां से वे फिर टाइम्स ऑव  इंडिया में मैनेजर (डिवलपमेन्ट) हो गए। लक्ष्मण टंडन,  जिन्हें मित्र लोग प्यार से लच्छी कहते थे,  वे दूरदर्शन पर प्रश्न  मंच शीर्षक एक बड़ा श्रेष्ठ कार्यक्रम करते थे। इस कार्यक्रम से उनकी ख्याति और लोक प्रियता में बहुत विस्तार हुआ। मिस्टर विकर्स भी अपनी ड्यूटी के बड़े पाबंद थे। उनकी बड़ी पुत्री पैट्रीशिया तो विख्यात सर्जन हैं और एक अन्य पुत्री मोनिका राजस्थान पर्यटन निगम में वरिष्ठ अधिकारी हैं। यह परिवार जयपुर में ही बस गया था।

हिन्दी प्रोड्यूसर्स में भी इस केन्द्र पर कितने कद्दावर साहित्यकार आए, इसका अनुमान बहुत कम लोगों को है। उदयशंकर भट्ट, राज नारायण बिसारिया,  गोपाल कृष्ण कौल जैसी हस्तियां कार्यक्रमों को एक नई भंगिमा प्रदान करते थे।

संगीतकारों में विनायक राम चंद्र आठावले, जवाहर लाल मट्टू,  म्यूज़िक कम्पोज़र्स में राम सिंह और अन्य कई श्रेष्ठ संगीतकार थे। तबला वादक दायम अली का नाम भुलाए नहीं भूलता। कलाकारों में सर्व श्री नन्द लाल शर्मा,  ओम शिवपुरी,  असरानी,  मदन शर्मा और महिला कलाकारों में सुधा शर्मा कमला केसवानी,  कला हज़ारे,  माया इसरानी आदि अनेक नामचीन प्रतिभाएं स्टाफ पर थीं। लोक कलाकारों में गणपत लाल डांगी का कोई सानी नहीं था। भारत-चीन युद्ध के समय उनका कार्यक्रम ‘’लड़ै सूरमा आज जी’  बेहद लोक प्रिय हुआ। कितने ही नाम हैं,  जो अब स्मृतियों से ओझल हो चुके हैं। फिर भी आमेर के राज महलों में ओ.बी. वैन के सहारे आयोजित भव्य बिहारी उत्सव और आकाशवाणी के लॉन्स  पर आयोजित बीसियों अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों की अनुगूंज अवश्य  जयपुर आकाशवाणी के रसिक श्रोताओं की स्मृतियों में रमी होगी। परिसर में स्थित सिन्धी कोड़ा राम की कड़क चाय और उनके द्वारा आर्मी से ला कर सुलभ कराने वाली थ्री एक्स रम की यादें उन दिनों यहां रहे और कहीं भी बसे हों,  जयपुर आकाशवाणी कर्मियों के जेह्न  में अब भी मंडराती होंगी।