बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

रे मूर्ख! कोटिश: कह


जो लोग बीकानेर के डॅूंगर कालेज में पढ़े हैं उनसे और राजस्थान की पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों से पं. विद्याधर शास्त्री का नाम अजाना नहीं है। वे प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ  दशरथ शर्मा के बड़े भाई थे। संस्कृत का अध्यापन करने के साथ-साथ वे देव वाणी में काव्य रचना भी उच्च कोटि की करते थे। प्रकृति से बड़े विनोदी और वत्सल स्वभाव के थे। अपने शिष्यों को बेहद प्यार करने वाले और आवश्यकता होने पर फटकार लगाने में भी नहीं चूकते थे।

साहित्य अकादमी के प्रारम्भिक वर्षो में अकादमी के संस्थापक-अध्यक्ष पं. जनार्दन राय नागर विभिन्न नगरों से साहित्यिक विषयों पर उपनिषदों का,  जिन्हें आजकल सेमिनार कहा जाता है,  आयोजन कराते थे। इन उपनिषदों में शास्त्री जी अवश्य  सहभागिता करते थे। प्रतिभागियों की संख्या अधिक होने पर समूहों में वैचारिक मंथन होता था। दो-तीन बार ऐसा संयोग हुआ कि शास्त्री जी की अध्यक्षता वाले समूह में इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल था। मध्यान्होत्तर सत्र में शास्त्री जी बड़े उतावले हो जाते थे और झटपट समापन करने की चेष्टा करते थे। बात दर असल यह थी कि शास्त्री जी को भंग पीने का व्यसन था। एक बार ऐसा हुआ कि विचार-विमर्श  में शाम के पांच बजने को आए। ऐसे में पंडित विद्याधर शास्त्री सत्र समाप्ति के लिए बहुत आतुर हो उठे और हॅंसते हुए लगे कहने‘ ‘हरे! हरे! पंडितों! समय विशिष्ट हो चुका है। व्यर्थ ही क्यों तर्क-कुतर्क कर रहे हो। जो कुछ सत्य है वह तो वेद इत्यादि में पहले ही कह दिया गया है।‘ प्रतिभागियों ने करतल ध्वनि के साथ हॅंसते हुए सत्र समाप्त कर दिया।

शास्त्री जी से सम्बंधित एक और दिलचस्प प्रसंग है। जैसा कि कहा जा चुका है, शास्त्री जी  अपने शिष्यों को बड़े वत्सल भाव से देखते थे। कोई शिष्य किसी ऊॅंचं पद पर पहुंच जाता तो वे बहुत गर्व का अनुभव करते थे। शास्त्री जी के षिष्यों की लम्बी कतार में इतिहास के विद्वान् नाथूराम खड़गावत भी थे। खड़गावत मूलतः इतिहास के प्राध्यापक थे। किन्तु कुछ समय बाद मुख्यमंत्री सुखाड़ि़या जी ने उन्हें राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखने का काम सोंपा। खड़गावत जी ने बड़ी मेहनत से पहला वॉल्यूम तैयार किया,  जिसका नाम था ‘ राजस्थान ड्यूरिंग 1857। तारीख तो याद नहीं,  पर किसी ऐतिहासिक दिन पर इस ग्रन्थ के विमोचन का आयोजन बीकानेर में किया गया। स्वयं मुख्यमंत्री ने विमोचन किया। भारी भीड़ थी। बड़ा भव्य समारोह था। जैसे ही समारोह सम्पन्न हुआ,  परम्परा के  अनुसार पुस्तक के लेखक खड़गावत जी धन्यवाद देने के लिए उठे। जैसे ही उनके मुख से ये शब्द  उच्चारित हुए -‘”देवियो और सज्जनो! मैं आप लोगों को कोटिश  धन्यवाद देता हूं,   कि बीच ही में ही खड़गावत जी के गुरु शास्त्री जी ज़ोर से चिल्लाए -‘रे मूर्ख! कोटिश:  कह।‘  सब हक्के-बक्के रह गए। खड़गावत जी ने मंच से ही अपने गुरु से क्षमा याचना करते हुए अपनी भाषिक त्रुटि में संशोधन किया। समारोह की समाप्ति पर खड़गावत जी नीचे उतर कर आए,  गुरु के चरण स्पर्श  किए और उन पर आशिषों की झड़ी लग गई। ऐसे थे विलक्षण गुरु और ऐसे थे सहिष्णु शिष्य!  

जयपुर आकाशवाणी की पुरानी यादें और कोड़ाराम की चाय


आकाशवाणी से मेरा रिश्ता  लगभग 68 साल पुराना हो चुका है। मेरा पहला प्रसारण दिल्ली से हुआ था,  जिसे ‘’चित्रलेखा’  के ख्यातनाम लेखक भगवती चरण वर्मा ने रैकर्ड किया था। यह भी एक सुखद संयोग ही था कि 1955 में जब आकाशवाणी के जयपुर केन्द्र का उद्घाटन राजस्थान के राज प्रमुख सवाई मान सिंह ने किया था,  तो उसका श्रीगणेश  राजस्थान की प्रशस्ति में लिखे गए मेरे गीत से ही हुआ था। उसके बाद तो इस केन्द्र से निरन्तर बड़ा आत्मीयतापूर्ण जुड़ाव रहा। जयपुर केन्द्र की जब स्वर्ण जयन्ती निदेशक धर्मपाल के कार्यकाल में मनाई गई,  तो मुझे अन्य विद्वानों और कलाकारों के साथ सम्मानित भी किया गया। बहरहाल।

पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे याद आते हैं वे कद्दावर लोग,  जिन्होंने जयपुर केन्द्र को बड़ी हैसियत दी थी। केन्द्र के सबसे पहले प्रभारी सहायक निदेशक सत्य प्रकाश  कौशल थे। उन्हीं की देख-रेख में केन्द्र का भव्य उद्घाटन हुआ था। वे जल्दी ही स्थानान्तरित हो कर पूना चले गए, जहां उनका आकस्मिक निधन हो गया। उनके जाने के बाद एक और सहायक निदेशक आए डॉ  समर बहादुर सिंह, जिन्होंने रहीम पर बड़ी महत्वपूर्ण गवेषणा की थी। समर बहादुर सिंह तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री राम सुभग सिंह के दामाद थे। उनके बाद निदेशक स्तर के अधिकारियों ने केन्द्र को सम्भाला,  जिनमें रोमेश  चंद्र,  प्रताप कृष्ण और गोपाल दास जी तो अपनी कार्यशैली और विद्वत्ता के लिए इतने विख्यात हुए कि उनके नाम आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। रोमेश  चंद्र अपने प्रशासनिक कौशल,  उच्च स्तरीय जन सम्पर्क और लेखकों से सक्रिय संवाद के लिए सुपरिचित रहे,  तो गोपाल दास जी एक श्रेष्ठ लेखक और आकाशवाणी केन्द्र संचालन में दीर्घ अनुभव के धनी थे। जयपुर के बुद्धिजीवियों के बीच वे बड़े लोकप्रिय हुए और सेवा निवृत्ति पर यहीं बस गए। कोई लगभग 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। हिन्दी की विख्यात् लेखिका रजनी पनिकर भी इस केन्द्र की निदेशक रहीं,  किन्तु अपने कड़े अनुशासन के कारण वे थोड़ी विवादास्पद हो गईं थीं। यहां से स्थानान्तरित हो कर वे आकाशवाणी कलकत्ता जैसे बड़े केन्द्र की निदेशक बनीं।

दूसरी पंक्ति में जिन अनुभवी और प्रतिभावान् लोगों ने जयपुर केन्द्र के कार्यक्रमों को सुदूर तक चर्चित बनाया,  उनमें हिन्दी के प्रख्यात आलोचक रहे ललिता प्रसाद सुकुल के भतीजे गंगाधर शुक्ल,  ब्रह्म स्वरूप बहल,  गंगा प्रसाद माथुर,  एन. आर. टंडन,  मिस्टर विकर्स और लक्ष्मण टंडन के नाम विशेष  रूप से उल्लेखनीय हैं। गंगाधर शुक्ल तो इस समय 94 वर्ष के हैं और कुछ समय पूर्व ही उन्होंने अपनी एक पुस्तक ‘’वक्त गुज़रता है’  भेजी थी,  जिसमें जयपुर की यादें बड़ी खूबसूरती से संजोयी गई हैं। लक्ष्मण टंडन सेंट स्टीफन्स के प्रोडक्ट थे और वे कुछ समय बाद प्रसिद्ध पत्रकार अपने मित्र चंचल सरकार के आग्रह पर प्रेस इंस्टीट्यूट में ओ.एस.डी. होकर चले गए थे,  जहां से वे फिर टाइम्स ऑव  इंडिया में मैनेजर (डिवलपमेन्ट) हो गए। लक्ष्मण टंडन,  जिन्हें मित्र लोग प्यार से लच्छी कहते थे,  वे दूरदर्शन पर प्रश्न  मंच शीर्षक एक बड़ा श्रेष्ठ कार्यक्रम करते थे। इस कार्यक्रम से उनकी ख्याति और लोक प्रियता में बहुत विस्तार हुआ। मिस्टर विकर्स भी अपनी ड्यूटी के बड़े पाबंद थे। उनकी बड़ी पुत्री पैट्रीशिया तो विख्यात सर्जन हैं और एक अन्य पुत्री मोनिका राजस्थान पर्यटन निगम में वरिष्ठ अधिकारी हैं। यह परिवार जयपुर में ही बस गया था।

हिन्दी प्रोड्यूसर्स में भी इस केन्द्र पर कितने कद्दावर साहित्यकार आए, इसका अनुमान बहुत कम लोगों को है। उदयशंकर भट्ट, राज नारायण बिसारिया,  गोपाल कृष्ण कौल जैसी हस्तियां कार्यक्रमों को एक नई भंगिमा प्रदान करते थे।

संगीतकारों में विनायक राम चंद्र आठावले, जवाहर लाल मट्टू,  म्यूज़िक कम्पोज़र्स में राम सिंह और अन्य कई श्रेष्ठ संगीतकार थे। तबला वादक दायम अली का नाम भुलाए नहीं भूलता। कलाकारों में सर्व श्री नन्द लाल शर्मा,  ओम शिवपुरी,  असरानी,  मदन शर्मा और महिला कलाकारों में सुधा शर्मा कमला केसवानी,  कला हज़ारे,  माया इसरानी आदि अनेक नामचीन प्रतिभाएं स्टाफ पर थीं। लोक कलाकारों में गणपत लाल डांगी का कोई सानी नहीं था। भारत-चीन युद्ध के समय उनका कार्यक्रम ‘’लड़ै सूरमा आज जी’  बेहद लोक प्रिय हुआ। कितने ही नाम हैं,  जो अब स्मृतियों से ओझल हो चुके हैं। फिर भी आमेर के राज महलों में ओ.बी. वैन के सहारे आयोजित भव्य बिहारी उत्सव और आकाशवाणी के लॉन्स  पर आयोजित बीसियों अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों की अनुगूंज अवश्य  जयपुर आकाशवाणी के रसिक श्रोताओं की स्मृतियों में रमी होगी। परिसर में स्थित सिन्धी कोड़ा राम की कड़क चाय और उनके द्वारा आर्मी से ला कर सुलभ कराने वाली थ्री एक्स रम की यादें उन दिनों यहां रहे और कहीं भी बसे हों,  जयपुर आकाशवाणी कर्मियों के जेह्न  में अब भी मंडराती होंगी।


सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

कहां गया ट्रक लोड श्रीनाथ जी का प्रसाद?


सन् 1989 के उत्तरार्द्ध की घटना है। तारीख या तिथि का स्मरण नहीं। जब आर्य समाज के तेजस्वी नेता स्वामी अग्निवेश  ने वल्लभ सम्प्रदाय के विश्व  प्रसिद्ध तीर्थ नाथद्वारा स्थित श्रीनाथ जी के मन्दिर में दलितों के प्रवेश के लिए अपना अभियान छेड़ा और राज्य सरकार ने उनकी पद यात्रा को विफल कर अपने अभीष्ट तक नहीं पहुंचने  दिया,  तो उसके चंद दिनों बाद मुख्य मंत्री शिव  चरण माथुर ने घोषणा की कि वे स्वयं श्रीनाथ जी के मन्दिर में दलितों का ससम्मान प्रवेश कराएंगे। पूरी पूर्व तैयारियों के साथ निर्धारित तिथि को मुख्य मंत्री मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों,  सांसदों आदि के साथ चेतक नामक सरकारी विमान से डबोक हवाई अड्डे पर उतरे और कारों द्वारा मंदिर चौक  में पहुंचे,  जहां  से उनके साथ दलितों को मंदिर प्रवेश के लिए प्रस्थान करना था। चूंकि  घटना तेइस वर्ष पूर्व की है और यहां  प्रस्तुत विवरण मात्र स्मृति के आधार पर दिया जा रहा है,  अधिक विस्तार में तो जाना कठिन है,  पर फिर भी  इस आलेख की केन्द्रीय विषय वस्तु की रोचकता और विस्मयकारी तथ्य किसी फिक्शन या गल्प से भी अधिक मनोरंजक हैं।

इन पंक्तियों का लेखक जन सम्पर्क निदेशक की हैसियत से पहले ही सड़क मार्ग द्वारा नाथद्वारा पहुंच  चुका था। मुख्य मंत्री का जो संकल्प साकार होने वाला था,  उसमें किसी प्रकार का विघ्न उपस्थित न हो,  उसके लिए चाक-चौबंद बन्दोबस्त किए गए थे। पूरा नाथद्वारा दूर-दूर तक छावनी में तब्दील हो गया था।

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मुख्य मंत्री और अन्य नेताओं की अगुवाई में प्रवेश का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। कुल मिलाकर शायद पूरा प्रोग्राम दो घंटे से अधिक की अवधि का नहीं था। मुख्य मंत्री जी अपने साथ आए हुए राज नेताओं को ले कर विमान से वापस जयपुर प्रस्थान कर गए थे। भारी भीड़ भी तितर-बितर हो चुकी थी। उस समय देवस्थान विभाग के कमिश्नर कदाचित् डी. सी. शर्मा थे। वे साहित्यिक रुचि के विद्यानुरागी थे। अंग्रेज़ी-हिन्दी में कविताएं भी लिखते थे और स्वभाव से धार्मिक चित्तवृत्तियों के व्यक्ति थे। उनसे मेरा पूर्व परिचय था और वैसे भी प्रशासनिक शिष्टाचार की दृष्टि से हम दोनों को मिलना ही था। वे कार्यक्रम समाप्ति के थोड़ी देर बाद मुझे मंदिर में ले कर गए। एक बार फिर से भगवान् श्रीनाथ जी के दर्शन किए। अपने एक पूर्व परिचित विभागाध्यक्ष के प्रति अपना मैत्रीभाव प्रकट करने के लिए वे मुझे उस ओर ले गए जहां  श्रीनाथ जी का प्रसाद विशिष्ट  लोगों को दिया जाता था। देवस्थान कमिश्नर ने प्रसाद प्रभारी से कुछ प्रसाद मेरे लिए लाने का अनुरोध किया। ज्ञात हुआ कि वहां कोई प्रसाद षेष नहीं है। बहुत पूछताछ करने पर बताया गया कि जितना प्रसाद मंदिर में था,  वह ट्रक भर कर जयपुर मुख्य मंत्री निवास पर भेज दिया गया। बहुत अविश्वसनीय बात थी,  पर किया क्या जा सकता था?  जिस महिमामय मंदिर में रात-दिन दिव्य प्रसादी तैयार होती रहती हो,  वहां यह उत्तर चकित कर देने वाला था। बहरहाल।

मैं जयपुर लौटते समय मार्ग में प्रतिपल इसी अनहोनी लगने वाली घटना पर विचार करता रहा। दूसरे दिन प्रातःकाल ही मैं लगभग 9 बजे मुख्य मंत्री निवास पहुंच गया। मुझे चैन कहां था?  पहुंचने के तुरन्त बाद ही मुझे मुख्य मंत्री के ड्राइंग  रूम में प्रवेश करा दिया गया। वहां दो-तीन बड़े व्यक्ति पहले से विराजमान थे। मुख्य मंत्री जी ने इतनी सुबह बिना बुलाए उनकी सेवा में उपस्थित होने का कारण पूछा। मैंने उत्तर दिया कि मैं एकान्त में कुछ निवेदन करना चाहूंगा। वे मुझे उस ड्राइंग  रूम के भीतर स्थित एक अन्य ड्राइंग रूम में ले गए,  जो सम्भवतः गोपनीय किस्म की चर्चाओं के लिए बना होगा। मुझे उसमें बैठने का यह पहला ही अवसर था।  मैंने बैठते ही कुछ झिझकते हुए कहा- ‘’सर! मुझे परिजनों के लिए पाँच-दस  किलो श्रीनाथ जी का प्रसाद चाहिए।‘ वे मुस्कुराते हुए बोले- ‘’आज आपको क्या हो गया है?  इतना प्रसाद यहां कहां रखा है।‘  तब मैंने उन्हें पूरी घटना का विवरण दिया। वे भौंचक्के रह गए। उन्होंने अचानक अपनी पत्नी सुशीला जी को बुलाया और मेरी ओर संकेत करते हुए कहा ‘सुनिए,  ये क्या कह रहे हैं?  सुशीला जी ने अनभिज्ञता और आश्चर्य दोनों प्रकट किये। आनन-फानन में सी. आई. डी. के शीर्ष अधिकारी को इस घटना की तथ्यात्मक जानकारी जुटाने के आदेश दे  दिए गए।

इस बारे में मुख्य मंत्री जी से मेरी फिर कोई चर्चा नहीं हुई। पर बाद में होने वाली काना-फूसी के अनुसार मुख्य मंत्री के निजी स्टाफ का एक व्यक्ति,  जिसकी राज्य-सेवा में भले ही कोई हैसियत नहीं थी,  किन्तु जो अन्यथा बहुत पावरफुल हो गया था,  उसी के ग्राम में यह ट्रक लोड प्रसाद उसके निवास पर डिलीवर हुआ था,  जिसका सदुपयोग उसने अपने पिता की पुण्य तिथि पर दिए गए महा भोज में कर लिया था। यह आरोप कितना प्रामाणिक था,  यह कहना कठिन है। सत्य कब क्षेपक बन जाता है और क्षेपक कब सत्य की तरह स्थापित हो जाता है,  इसका विश्लेषण बहुत जटिल है। बकौल राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर केः-
   
       अलिखित ही रही सदा,  जीवन की सत्य कथा,
       जीवन की लिखित कथा,  सत्य नहीं क्षेपक है।

सम्पूर्णानंद! बेटा, बहुत मुटियाय गए हो!


हिन्दी के सुप्रसिद्ध कथाकार और विवादास्पद लेखक पांडेय बेचन शर्मा ‘’उग्र’ के नाम से शायद ही कोई हिन्दी भाषी अपरिचित हो। एक ज़माने में उनकी कहानी ‘चाकलेट’  को लेकर बड़ा बबाल मचा था। उनके यथार्थपूर्ण गहरे तक चोट करने वाले सृजन ने अनेक शुद्धतावादी आडम्बरधारी लेखकों को बहुत चौंकाया था। पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने तो उनके लेखन को घासलेटी साहित्य कहकर उनकी बड़ी निन्दा की थी। पर हकीकत यह है कि उग्रजी जैसा अक्खड़,  फक्कड़ और धारदार लेखक हिन्दी में दूसरा नहीं हुआ। जिन लोगों ने आत्माराम एण्ड सन्स से प्रकाशित उनकी आत्मकथा ‘’अपनी खबर’ पढ़ी है,  वे समझ सकते हैं कि ऐसी बेबाक जीवनी और वह भी इतनी मर्मस्पर्शी शैली में लिखना बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए भी ईष्र्या का विषय हो सकता है।

पांडेय बेचन शर्मा ‘’उग्र’ कुँआरे थे। एक बार जब प्रसिद्ध नेता श्री प्रकाश जी के विवाह करने की खबर उड़ी तो उग्रजी ने अपने एक स्तंभ में बहुत मजेदार पीस लिखा था,  जिसका शीर्षक था:  ‘’मैं उग्र 66 का कुँआरा और सत्तर के श्री प्रकाश नवोढ़ा से ब्याह रचायेंगे’ ।

उग्रजी की लम्बी और संघर्षपूर्ण जीवन-यात्रा इतनी दिलचस्प है कि कितने ही स्तंभ-लेखक उससे निहाल हो सकते हैं। बहरहाल! यह भी एक विचित्र संयोग था कि उग्रजी के पट्ट शिष्य और वरिष्ठ पत्रकार चिरंजीव जोशी सरोज उन्हें जयपुर ले आये। वे तब रामरतन कोचर द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक ’गणराज’ के सम्पादक थे। सरोज जी ने बहुत आदरपूर्वक उन्हें इस अखबार से संबंद्ध किया और एक नियमित स्तंभ उनसे लिखाने लगे। उग्रजी का हर फीचर धमाकेदार होता था। उग्रजी कहीं एक जगह टिक कर रहने वाले नहीं थे। उन्हें कोई बन्धन में नहीं बाँध सकता था। अतः स्वाभाविक रूप से जयपुर में कुछ अर्से रहकर वे शायद दिल्ली या इलाहाबाद चले गये। उस जमाने के सभी महान् साहित्यकार उनके मित्र थे, पर उनसे घबड़ाते भी थे। बहरहाल!

संयोग ऐसा बना कि जिन दिनों डॉ  सम्पूर्णानन्द राजस्थान के गवर्नर थे,  उग्रजी एक बार जयपुर आये। अपने मित्र सम्पूर्णानन्द जी को खबर हुई। जहाँ ठहरे थे,  वहाँ उन्हें लाने के लिए गाड़ी भेजी गई,  किन्तु गाड़ी को रीते ही वापस लौटना पड़ा। उन्होंने गाड़ी में बैठने से इन्कार कर दिया और बाद में रिक्शा में बैठकर राजभवन आये। सम्पूर्णानन्द जी अपने ए.डी.सी. आदि के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही उग्रजी पहुँचे, सम्पूर्णानन्द जी ने बाहर आकर उन्हें बाथ में भर लिया,  उग्रजी ने आव देखा न ताव। भाव-विव्हल होकर मित्र से जबर्दस्त उपहास किया - ‘’सम्पूर्णानन्द! बेटा बहुत मुटियाय गये हो।‘ सम्पूर्णानन्द जी तो बड़े विद्वान् और संजीदा राजपुरूष थे। वे भी बहुत देर तक हँसते रहे। उग्रजी को भीतर शोभन-कक्ष में सादर ले जाया गया। उनका यथोचित सम्मान और सत्कार किया। बनारस से जुड़ी पुरानी बातें होती रहीं। वे राजभवन में कितनी देर रहे,  कहना कठिन है। उग्रजी जैसे अपनी मर्जी के मालिक,  अपने तरीके से मादक द्रव्यों की मस्ती में रहने वाले अलमस्त फक्कड़ साहित्य सर्जक को राजभवन कब रास आने वाला था। जयपुर में उनके एक और गुणग्राहक थे,  राष्ट्रदूत के स्वामी बाबू हजारी लाल शर्मा। हजारी बाबू भी अन्य साहित्यकारों की तरह उनकी भी पैसे-टके से जरूर मदद करते रहे होंगे,  पर उग्रजी की सिजेरियन वाणी का स्वाद उन्होंने भी जरूर चखा होगा।

मैथिली बाबू के साथ बासी पूरियों का नाश्ता


मोटे अनुमान से यह घटना कोई छह दशक पहले की रही होगी। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचकर राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत संसद-सदस्य बन चुके थे। मेरी चढ़ती वय थी। उन दिनों कविता लिखने और बड़े कवियों से मिलने का बड़ा चाव रहता था। एक बार दिल्ली जाने का कार्यक्रम बनाया ही इसलिए कि वहाँ जाकर साहित्य की विशिष्ट विभूतियों का दर्शन करूँगा। इत्तफाक की बात थी कि उन दिनों दिल्ली में भगवती चरण वर्मा,  रामधारी सिंह दिनकर,  जोश मलीहाबादी,  जगदीश चन्द्र माथुर जैसी हस्तियाँ देश की राजधानी में थी। इसका श्रेय जाता है तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री वी.वी. केसकर को और मंत्रालय के सचिव एवं ‘कोणार्क’  नाटक के ख्याति प्राप्त लेखक जगदीश चन्द्र माथुर आई.सी.एस. को जिन्होंने आकाशवाणी में प्रोड्यूसर्स का नया काडर बनाया और कार्यक्रमों की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए हिन्दी के प्रसिद्ध लेखकों को उन पदों पर अनुबन्ध के आधार पर पदस्थापित किया। सुमित्रानन्दन पंत,  उदयशंकर भट्ट और ऐसी ही कितनी ही नामचीन  साहित्यिक हस्तियाँ प्रोड्यूसर,  चीफ प्रोड्यूसर और परामर्शदाता के पदों पर नियुक्त की गईं। बहरहाल।

मेरी सबसे पहली भेंट ‘भारत भारती’  के यशस्वी राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त से ही हुई। वे कदाचित् साउथ एवन्यू में रहते थे। मैथिली बाबू बहुत सरल और सीधे व्यक्ति थे। असाधारण कीर्ति लाभ और एम.पी. बनने से वे टाइट-कॉलर्ड नहीं हुए थे। मैं जैसे ही उनके निवास पर पहुँचा और डोर-बैल बजाई, स्वयं गुप्त जी ने द्वार खोले। मैने अभिवादन स्वरूप उनके चरण-स्पर्श किये और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। ड्राइंग रूम में ही मुझे एक सोफे पर बैठने का संकेत किया। स्वयं भी मेरे पार्श्व में विराजमान हो गये। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया। वे यह जानकर बड़े प्रसन्न थे कि मैं राजस्थान से आया था। काफी देर  तक राजस्थान के सांस्कृतिक वैभव की प्रशंसा करते रहे। फिर मुझसे प्रश्न किया कि क्या मैं कविता रचता हूँ?  मैंने हाँ में उत्तर दिया,  तो उन्होंने कुछ कविताएँ सुनाने का आदेश दिया। मैंने अनुपालना की और अपनी कुछ प्रारंभिक रचनाएं सुनाई। महापुरूषों के स्वभाव के अनुसार उन्होंने मेरी काव्य-प्रतिभा की सराहना की और फिर लगे कहने: अरे मैं तो बातचीत में भूल ही गया,  इतनी दूर से आये हैं,  तो नाश्ता तो कीजिए। पर हमारी एक शर्त है। मैं सुनकर स्तंभित सा हुआ। न जाने क्या शर्त रखेंगे। फिर मुस्कुराते हुए बोले ‘देखिये,  हम आपके सामने एक निजी प्रकृति का रहस्योद्घाटन कर रहे हैं। हम पिछले कई वर्षों से बासी पूरियों का नाश्ता करते हैं। रात को दूध में गूँदे हुए आटे की पूरियाँ शुद्ध घृत में उतरवाते हैं और दूसरे दिन सुबह नाश्ते में खाते हैं। मैं उनकी सरलता देखकर चकित रह गया। थोड़ी देर में सेवक नाश्ता ले आया। पूरियों के साथ कुछ मठड़ियाँ और कैरी का आचार भी था। डाइनिंग टेबिल पर नाश्ता लगा। मैंने राष्ट्रकवि के साथ नाश्ते का आनन्द लिया। एक दुर्लभ अवसर मुझ जैसे नवोदित कवि को प्राप्त हुआ था। मैं कई दिनों तक गर्व से सीना फुलाकर मित्रों को यह रोचक प्रसंग सुनाता रहा। मेरी स्मृतियों में उन बासी पूरियों का आस्वाद आज भी रमा है।

किस्सा टेंटड़ा ठाकुर की कार का


जयपुर रियासत के स्वामी महाराजा मानसिंह द्वितीय कदाचित् राजस्थान के तत्कालीन राजा-महाराजाओं में सर्वाधिक शिक्षित,  दृष्टि सम्पन्न और सामाजिक सरोकारों के प्रति हर समय सजग रहने वाले राजपुरूष थे। जयपुर की रियासत भी राजस्थान में सबसे बड़ी और अपने अतुल वैभव के लिए विख्यात् थी। मानसिंह की कीर्ति के स्मारक अनेक शैक्षणिक,  सांस्कृतिक और वैज्ञानिक संस्थान जयपुर में है। किन्तु उनकी एक बड़ी विशिष्टता जो अल्पज्ञात रही है,  उनके द्वारा रियासत के जागीरदारों,  ठिकानेदारों और ताजिमी सरदारों को ग्रामीण परिवेश से निकाल कर जयपुर में बसाना और उनकी संतति को आधुनिक शिक्षा देकर समय की धार के अनुरूप सुसंस्कृत बनाना था। पुराने जयपुर में जिधर से भी निकल जाइये,  कहीं बिचून हाउस, कहीं चौमू  हाउस,  कहीं लवाण हाउस,  कहीं अलूदा हाउस आदि बड़े-बड़े निवास विभिन्न जागीरदारों की ही निर्मिति थी। अब तो वह नजारा कभी का बदल चुका। अधिकांश जागीरदारों ने वे सम्पत्तियाँ कौड़ियों के मोल चालाक लोगों के हवाले करके उनका भाग्योदय कर दिया। जागीरदारों के राजसी भवनों की इसी कतार में सुप्रसिद्ध धूला हाउस था। जौहरी बाजार से चलें तो पुरानी फल मंडी के निकट और बापू बाजार की बैक में स्थित धूला हाउस एक मशहूर जगह थी। सन् 1950 में जब मैं पहली बार रावल कुबेर सिंह जी के दर्शनों के लिए धूला  हाउस पहुँचा तो मैं भौंचक्का रह गया। बाहर द्वारपाल की आज्ञा से प्रवेश। अन्दर एक कोने में रनिवास और कुबेरसिंह जी का दरबारे खास। कुछ फासले पर भट्टियों में शराब बन रही थी। मैं प्राचीन भद्रावती नगर और अब भांडारेज के नाम से जाने वाले ग्राम से आया था,  महाराजा कॉलेज में प्रवेश के लिए। भाँडारेज तब धूला ठिकाने के तहत् ही था। मुझे प्यार से रावल साहब ने अन्दर बुलाया,  पर निर्देश दिये गये कि मैं सोफे पर न बैठकर नीचे बैठूँ। मुझे धूला हाउस में स्थित एक बड़ी बिल्डिंग में जहाँ करीब बीस-बाईस कमरे बने थे,  स्थान मिल गया। किराया मात्र सात रूपये माहवार। बिजली, पानी मुफ्त। मेरे लिए यह भी सुखद था कि वहाँ पहले से दौसा,  अलवर,  जोधपुर आदि स्थानों के वरिष्ठ छात्र पहले से रह रहे थे। इस बिल्डिंग के पार्श्व में ही बना था टेंटड़ा ठाकुर साहब का आरामदेह निवास। टेंटड़ा एक छोटा सा ठिकाना था,  जिसके ठाकुर रावल कुबेर सिंह के रिश्ते में भाई लगते थे। गोरे लम्बे कद के टेंटड़ा ठाकुर साहब,  जिनका नाम मैं भूल चुका हूँ,  उस समय युवा थे। उनका एक ही शौक था - मदिरा गोष्ठियों का आयोजन करना,  नई-नई कारों में ऐंग्लोइन्डियन गर्ल्स के साथ घूमना और यार-दोस्तों के साथ मौजमस्ती करना। हममें से भी दो-तीन जो मैडीकल और लॉ  के छात्र थे,  उनके निकट हो गये थे। बहरहाल!

छोटा सा किस्सा यह कि जागीरदारों को मिली विशेष प्रिविलेज के तहत् टेंटडा ठाकुर साहब ने काले रंग की एक फोर्ड गाड़ी आयात की थी। धूला हाउस-निवासियों ने ही नहीं बाहर से भी कुछ लोग उसे देखने आये। तभी एक चमचे ने प्रस्ताव किया कि ‘’हुजूर, यह गाड़ी तो म्लेच्छों के देश से आई है,  इसलिए इसे दूध से धुलवाना चाहिए।‘  दूध के ढोल के ढोल बहाकर गाड़ी को दुग्ध-स्नान कराया गया। ठीक से पौंछा गया और उसे खुले में ही पार्क कर दिया गया। कुछ घंटों बाद गाड़ी पर सैकड़ों मक्खियाँ भिनभिनाने लगी। लोगों की हंसी रोके नहीं रूक रही थी। फिर भीड़ इकट्ठी हो गई। इस बार एक अन्य चमचे ने अर्ज किया ‘’हुजूर! म्लेच्छों के यहाँ से आई गाड़ी तो गंगाजल से ही पवित्र हो सकती है.’ सुझाव की भूरि-भूरि सराहना की गई। कई दूत हरिद्वार भेजे गये। बड़े-बड़े तांबे के मटके सेवक हरिद्वार लेकर गये। अन्ततः गंगाजल से गाड़ी की धुलाई कराके फिर उसका पूजन कराया गया।

राजस्थान के राजाओं पर तो राजनीति-विज्ञान के विद्वानों ने बहुत काम किया है,  पर जागीरदारों, ठिकानेदारों आदि के जीवन,  उनके बुद्धि-कौशल और उनकी सनकों पर स्याही कम ही इस्तेमाल की गई है। टेंटडा ठाकुर साहब के जीवन का यह छोटा सा प्रसंग इस स्तंभ-लेखक का आँखन देखा है।

ऐसे भी थे एक जनसम्पर्क निदेशक


राजस्थान-निर्माण के आरंभिक वर्षों में जब विभिन्न राज्य सेवाओं का न तो गठन हो सका था और न विभिन्न विभागों के वरिष्ठ पदों के लिए कोई कायदे-कानून ही बने थे,  राज्य सरकार स्वेच्छा से जैसा उचित समझती,  वरिष्ठ पदों पर अफसरों की तैनाती कर रही थी। इसी दौर में उत्तर प्रदेश से एक जनसम्पर्क निदेशक लाये गये। डॉ सम्पूर्णानन्द के सुपुत्र सर्वदानन्द वर्मा ने बिना किसी पूर्व अनुभव के इस पद को सुशोभित किया। उनकी सबसे बड़ी योग्यता यह थी कि उन्होंने कुछ उपन्यास और नाटक लिखे थे और रंगकर्म में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी। वे कुँआरे थे और गृहस्थी की झंझट से मुक्त होने के कारण काफी समय कार्यालय को देते थे। पर समय का सदुपयोग वे विभाग के लिए कम और अपनी रसिक वृत्तियों की संतुष्टि के लिए ही अधिक करते थे। प्रातः कार्यालय खुलने के समय जैसे ही वे निदेशक पद की कुर्सी पर आसन ग्रहण करते,  उसके तुरन्त बाद वे स्कॉच व्हिस्की की एक बोतल मंगाने का आदेश देते और प्रायः नित्य ही एक कलाकार बंगाली युवती को कई-कई घंटे कक्ष में बैठाये रखते। जितने समय वह युवती उनके साहचर्य में रहती,  बाहर लाल रंग की बत्ती जलती रहती, जो इस बात का संकेत देती रहती कि कोई भीतर प्रवेश करके उनकी प्राईवेसी भंग न करे।

सर्वदानन्द वर्मा को भले ही शासकीय अनुभव नहीं था, फिर भी अपने संक्षिप्त कार्यकाल में जो शायद एक वर्ष से अधिक नहीं था, राज-काज को भी अपने ढंग से निपटाने की कोशिश की थी। वे दूसरे-तीसरे दिन विचाराधीन पत्रावलियों का निस्तारण करते और विशुद्ध हिन्दी में अपनी टिप्पणी लिखते थे। भाषा की शुद्धता पर उनका बड़ा जोर था और वे अधीनस्थ अधिकारियों की भाषिक अशुद्धियों के कारण अक्सर उन्हें बहुत लताड़ते थे। जिस अधिकारी की नोटिंग में वर्तनी की अशुद्धि होती, उसे इंगित करते हुए वे अक्सर यह निर्देश देते रहते थे – ‘कृपया अपनी इमला सुधारें’ ।

सर्वदानन्द जी ने जनसम्पर्क निदेशालय के तत्वावधान में कई नाटक मंचित कराये, जिनमें प्रायः उन्हीं की स्क्रिप्ट होती थी। विभाग के अनेक लोगों को उन्होंने रंग-कर्म की ओर प्रवृत्त किया और अभिनय में उनका निर्देशन भी किया। अपने कार्यकाल में उन्होंने कवि-सम्मेलन भी आयोजित कराये। अपनी इन उपलब्धियों का लेखा-जोखा उन्होंने ‘प्रशासन का ललित पक्ष’ शीर्षक से प्रकाशित भी किया। विभाग में उस समय बहुत कम अधिकारी थे, फिर भी उनके स्वभाव में अहंकार इतना था कि वे किसी के भी प्रति बहुत स्नेहशील नहीं थे।

दुर्भाग्य से उनके अत्यधिक मदिरापान और रसमयता के चर्चे सचिवालय के गलियारों और मीडिया मित्रों की गोष्ठियों में होने लगे। अन्ततः वह दिन शीघ्र ही आ गया, जब उनके पिता डॉ  सम्पूर्णानन्द के गहरे मित्र और राज्य के मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास को यह सन्देश भेजना पड़ा कि वे ‘अपने रत्न को यथाशीघ्र वापस बुलालें।‘        सर्वदानन्द जी त्याग-पत्र देकर लखनऊ प्रस्थान कर गये और इस प्रकार इस दिलचस्प प्रकरण का अन्त हुआ। राजस्थान शासन में अब तक पच्चीस से अधिक जनसंपर्क निदेशक रह चुके होंगे,  पर सर्वदानन्द तो सर्वदानन्द ही थे।