शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

रक्षा विज्ञान के आलोक-स्तम्भ: डी. एस. कोठारी


यह एक त्रासदी ही है कि दृश्य के बुहत निकट रहे होने के कारण प्रायः हम उन व्यक्तियों और संस्थाओं को लगभग विस्मृति के गर्भ में ले जाते हैं जिनका महान् अवदान ऐतिहासिक महत्व का होता है। किन्तु झीलों की विश्वविख्यात नगरी उदयपुर में जन्मे डॉ. डी.एस. कोठारी तो ऐसी विलक्षण विभूतियों में थे, जिन्होंने अपनी मात्र एक पृष्ठीय वसीयत में इस निर्देश को रेखांकित किया कि जो भी धनराशि उन्होंने अहिंसा और विज्ञान के उन्नयन के लिए छोड़ी है, उसका उपयोग कहीं भी उनके नाम से न किया जाय। ऐसे निष्काम, किन्तु ऋषि-तुल्य विज्ञानी के नाम का स्मरण मात्र करना किसी वैदिक ऋचा का पाठ करने से कम नहीं है। दौलत सिंह कोठारी महान् वैज्ञानिक और शिक्षाविद् तो थे ही,  पर उन जैसे महामानव भी विरले ही होते हैं। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति और महान् वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने विज्ञान दिवस पर अपने भाषण और अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘’इग्नाइटेड माइन्ड्स’ में यह ठीक ही कहा था कि भारत के पुनर्निर्माण में जिन महान् वैज्ञानिकों की अमूल्य भूमिका रही है,  उनमें डॉ. डी.एस. कोठारी,  डॉ. होमी जहांगीर भाभा और डॉ. विक्रम साराभाई का अवदान ऐतिहासिक महत्व का है। इसके पूर्व कि डॉ. कोठारी के विज्ञान और शिक्षा जगत को दिये गये असाधारण योगदान को संक्षेप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जाये,  उनकी जीवन यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा।

दौलत सिंह कोठारी का जन्म 6 जुलाई 1906 को उदयपुर में हुआ था। उनके पिता फतेहलाल कोठारी एक अध्यापक थे और दुर्भाग्य से 38 वर्ष की आयु में ही अपनी पत्नी और चार अल्प वयस्क पुत्रों को छोड़कर इस संसार से विदा हो गये। दौलत सिंह कौठारी का शैक्षणिक जीवन असाधारण रूप से बहुत उज्जवल रहा। उदयपुर में प्रारम्भिक शिक्षा के बाद मेवाड़ के महाराणा द्वारा प्रदत्त 50 रूपये प्रतिमाह की छात्रवृत्ति पर वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उच्चतर अध्ययन के लिये चले गये,  जहां उन्होंने 1926 में बी. एससी.  और 1928 में एम. एससी.  की परीक्षा वायरलैस में विशेष अध्ययन के साथ उत्तीर्ण की। उस समय इलाहाबाद में मेघनाथ साहा जैसे श्रेष्ठ वैज्ञानिक भौतिकी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष थे। अल्प अवधि के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में डेमोन्सट्रेटर के पद पर कार्य करने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार की छात्रवृत्ति पर वे सितम्बर 1930 में इंगलैण्ड चले गये,  जहां उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय स्थित कैवेंडिश लेबोरेट्री में महान् वैज्ञानिक लॉर्ड रूथरफोर्ड के साथ कार्य किया। कैम्ब्रिज से पी- एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने के बाद वे अप्रेल 1933 में भारत लौटे और पुनः उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया। इसके थोड़े दिन बाद जैसे ही दिल्ली विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में एक रीडर का पद खाली हुआ,  उनके गुरू प्रोफेसर साहा ने उन्हें उस पद के लिए आवेदन करने का परामर्श दिया और वहां उनका चयन हो गया।

डॉ. डी.एस. कोठारी का दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर पर आना जैसे वहां के वैज्ञानिक विषयों से जुड़े विभागों में शिक्षण और शोध के क्षेत्र में एक क्रान्ति युग की शुरूआत थी। उन्होंने अकादमिक क्षेत्र में किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझा। सन् 1948 तक डॉ. कोठारी ने अपनी असाधारण प्रतिभा, कल्पनाशीलता और मानव कल्याण के लिए अर्जित अपनी उपलब्धियों को समर्पण-भावना के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय को जिन बुलंदियों पर पहुंचाया, उसका अनुमान लगाना आज बहुत कठिन है। अगस्त 1948 में भारत सरकार ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अनुरोध किया कि वे डॉ. कोठारी की सेवाएं वैज्ञानिक परामर्शदाता के रूप में उन्हें दे दें। विश्वविद्यालय ने तीन वर्ष के लिए उनकी सेवाएं रक्षा मंत्रालय को दीं, किन्तु इस अवधि में भी डॉ. कोठारी समय-समय पर विश्वविद्यालय में अपने छात्रों से रूबरू होते रहे। 1952 में वे विश्वविद्यालय में वापस लौट आये, किन्तु वे रक्षामंत्री के मानद परामर्शदाता लगभग एक दशक तक बने रहे। 1961 में उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, किन्तु दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद पर उनका स्थान यथावत् रखा गया,  जहां से वे 65 वर्ष की आयु में जुलाई 1971 में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद वे प्रोफेसर एमरिटस नियुक्त किये गये और आयु पर्यन्त उससे जुड़े रहे।

स्वाधीनता के बाद जैसे ही पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश की बागडोर संभाली,  उन्होंने इस यथार्थ को तुरन्त अनुभव कर लिया कि देश की नानाविध समस्याओं का निराकरण विज्ञान के माध्यम से ही हो सकता है। परिणामस्वरूप उन्होंने अनेक विशाल वैज्ञानिक शोध संस्थानों की स्थापना की। डॉ. होमी भाभा के नेतृत्व में अणु ऊर्जा आयोग बनाया,  तो डॉ. एस.एस. भटनागर के नेतृत्व में काउंसिल ऑफ  साइंटिफिक एंड इन्डस्ट्रीयल रिसर्च की शुरूआत की। इसके साथ ही रक्षा विज्ञान को संगठित करने का दायित्व डॉ. डी.एस. कोठारी को सौंपा गया। भारत सरकार ने रक्षा-विज्ञान को संगठित करने के मामलों में परामर्श देने के लिए इंग्लैण्ड के विश्व-प्रसिद्ध प्रोफेसर पी.एम.एस. ब्लैकेट को भी आमंत्रित किया,  जिन्होंने द्वितीय महायुद्ध में रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान किया था। यह संयोग ही था कि प्रोफेसर ब्लैकेट, नेहरू जी और डॉ. कोठारी दोनों के ही मित्र थे। कैम्ब्रिज में प्रोफेसर ब्लैकेट और कोठारी ने साथ ही अनुसंधान कार्य किया था। इस प्रकार डॉ. कोठारी का यह मैत्री सम्बन्ध भारत में रक्षा विज्ञान की ठोस आधारशिला रखने में बहुत सहायक हुआ। जून 1949 में सरकार ने रक्षा विज्ञान संगठन स्थापित करने का निर्णय लिया,  जिसकी शुरूआत 40 वरिष्ठ वैज्ञानिकों और 100 कनिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ हुई थी। आज यह संगठन इतना विस्तार पा गया है कि उसमें 25000 वैज्ञानिक सेवारत हैं। डॉ. कोठारी के प्रयत्नों से ही देश के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में प्रयोगशालाएं स्थापित की गई। डॉ. कोठारी ने इस तथ्य को भली भांति समझ लिया था कि रक्षा विज्ञान का लक्ष्य सशस्त्र सेनाओं की आवश्यकताओं की सम्पूर्ति करना था। विश्वविद्यालयों के तत्कालीन शान्त वातावरण की पृष्ठभूमि से सम्पन्न डॉ. कोठारी ने अपने मधुर स्वभाव और विनयशीलता से जल, थल और वायुसेना तीनों के ही प्रमुखों के साथ अपना अच्छा संवाद स्थापित कर लिया था। रक्षा मंत्रालय के अधिकारी और तीनों सेनाध्यक्ष डॉ. कोठारी के विस्तृत ज्ञान से बेहद प्रभावित थे। उनकी कार्यशैली लोगों के लिए एक उदाहरण बन गई थी। जब द्वितीय महायुद्ध में अमरीका ने जापान में नागासाकी और हिरोशिमा पर अणुबम का विस्फोट किया, उसके बाद डॉ. कोठारी ने इस विषय पर दो व्याख्यान दिये, जिनमें से एक सामान्य जन के लिए था और दूसरा मिलिट्री के अधिकारियों के लिए। पंडित नेहरू उनके विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यह प्रस्ताव किया कि डॉ. कोठारी और डॉ. भाभा इस विषय पर एक पुस्तक लिखें। पुस्तक का सारा लेखन डॉ. कोठारी ने ही किया और ’न्यूक्लियर एक्सप्लोजन्स एंड देयर इफैक्ट्स’ नामक यह पुस्तक भारत सरकार द्वारा 1956 में प्रकाशित की गयी। इस पुस्तक का रूसी, जापानी और जर्मन भाषाओं में अनुवाद हुआ। जर्मन अनुवाद की भूमिका में यह कहा गया कि डॉ. कोठारी की यह पुस्तक एक ऐतिहासिक कार्य था, जिसने इस विषय पर वैचारिक मंथन के द्वार खोल दिये थे।

डॉ. डी.एस. कोठारी की जन्म शताब्दी के अवसर पर एक श्रेष्ठ ग्रंथ ‘’विजन एण्ड वैल्यूज’ उनके सुपुत्र डॉ. ललित के. कोठारी और प्रो. रमेश के. अरोड़ा द्वारा संपादित किया गया था। पैरागॉन इन्टरनेशनल पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित इस वृहत् ग्रंथ में हमारे तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सहित 50 से अधिक विद्वानों ने,  जिनमें विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक, समाज विज्ञानी और संस्कृति पुरूष समाविष्ट हैं, विभिन्न विषयक अपने आलेखों में डॉ. कोठारी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एक स्वर से उन्हें भारत में रक्षा विज्ञान के अग्रदूत के रूप में रेखांकित किया है। नोबल पुरस्कार विजेता सर माइकल फ्रांसिस ने कहा कि डॉ. कोठारी एक विख्यात भौतिक विज्ञानी ही नहीं बल्कि महान् शिक्षाशास्त्री भी थे,  जिन्होंने भारत में उच्चतर शिक्षा को गतिशील बनाने में अपनी प्रभावी भूमिका अदा की थी।

डॉ. कोठारी विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म में भी गहरी रूचि रखते थे। उनकी मान्यता थी कि बहिरंग जगत तो विज्ञान के कर्मक्षेत्र और उसकी पड़ताल-परिधि में आता है,  किन्तु मनुष्य के भीतरी संसार के अनेक रहस्य ऐसे हैं,  जो विज्ञान की सीमा से परे हैं। संस्कृति पुरुष और प्राचीन भारतीय संस्कृति के व्याख्याता डॉ. कर्ण सिंह ने अपने एक संस्मरण में कहा है कि डॉ. कोठारी उनसे वेदान्त और विज्ञान के पारस्परिक सम्बन्धों पर अक्सर चर्चा करते रहते थे।

प्रसिद्ध रक्षा-वैज्ञानिक ए. नागरत्नम् ने भारत में 1948 से 1961 तक की अवधि को रक्षा विज्ञान के क्षेत्र में कोठारी युग की संज्ञा दी है। उनका कथन है कि आज देश में जो रक्षा विज्ञान का हमारा संगठन है और जिसके अन्तर्गत इस समय देश के विभिन्न भागों में 50 प्रयोगशालाएं कार्य कर रही हैं, उसका श्रीगणेश दिल्ली में राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला की दूसरी मंजिल पर मात्र 20 कमरों में किया गया था। उन्होंने बहुत सीमित संख्या में जिन वैज्ञानिकों को वहां कार्य करने के लिए आमंत्रित किया, उन्हें आज की तरह वैज्ञानिक अधिकारी का पदनाम न देकर केवल साइंटिस्ट या वैज्ञानिक का ही पदनाम दिया था। वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में आज से लगभग 6 दशक पूर्व जब उन्हें ढाई हजार रूपये प्रति माह का वेतन देने की पेशकश की गई,  तो उन्होंने उसे लेने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के रूप में उन्हें जो 1250 रूपये प्रति माह का वेतन मिल रहा है,  वह पर्याप्त है। 1961 में जब वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के संस्थापक अध्यक्ष बने तो उसके साथ-साथ वे मानद विज्ञान परामर्शदाता भी रहे और मात्र एक रूपये प्रतिमाह का मानदेय उन्होंने स्वीकार किया।

रक्षा वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने अनुसंधान के लिये जिन मुख्य क्षेत्रों को चिन्हित किया उनमें आपरेशनल रिसर्च, बैलिस्टिक्स,  विस्फोटक,  शस्त्रीकरण,  रॉकेट्स और मिसाइल्स,  इलैक्ट्रानिक्स,  नौसेना सम्बन्धी तकनीकी,  इंजीनियरिंग,  खाद्य सामग्री,  जीवन विज्ञान,  प्रतिकूल पर्यावरण की समस्याएं और रक्षा सम्बन्धी संस्थानों में प्रशिक्षण आदि विषय मुख्य थे। वे कहा करते थे कि हमारे संसाधन सीमित हैं,  इसलिए हमें विज्ञान को पूरी तरह समझकर मितव्ययता के साथ और विवेक के साथ अपनी रक्षा-सामग्री का निर्माण करना चाहिए। इस संबंध में एक दिलचस्प प्रकरण का उल्लेख अक्सर किया जाता है। जब नाटो देशों द्वारा ग्नाट (Gnat) लड़ाकू विमान को नकार दिया गया,  तो नेहरूजी असमंजस में थे कि भारतीय वायुसेना के लिए उसे क्रय करें या नहीं। जब उन्होंने डॉ. कोठारी से परामर्श किया,  तो उन्होंने बड़े विमानों की तुलना में उस छोटे आकार के अल्पमौली विमान के लाभ उन्हें डाइग्राम बनाकर समझाए। उन्होंने मनोरंजक ढंग से उस मच्छर का उदाहरण दिया,  जिसकी गुन-गुन तो सुनाई देती है,  पर जिसे पकड़ना मुश्किल होता है। यह प्रकरण इस तथ्य का पुष्ट प्रमाण है कि डॉ. कोठारी प्रधानमंत्री के कितने विश्वासपात्र थे। डॉ. कोठारी की यह मान्यता थी कि विज्ञान और तकनीकी की प्रगति मानव कल्याण के लिए निरन्तर हो,  यह जरूरी है,  किन्तु वह संकट में पड़ जाएगी अगर उसके साथ-साथ मनुष्य का नैतिक विकास रूक गया और मानवता की भावना का क्षरण हो गया। उनका कहना था कि आत्म नियंत्रण और अहिंसा में आस्था के बिना विज्ञान और तकनीकी विकास,  गरीब और अमीर देशों के बीच में खाई को और अधिक चौड़ा  करता चला जायेगा।

डॉ. कोठारी अपने निजी जीवन में कितने सरल और विनयशील थे,  इसकी कल्पना करना कठिन है। उनके घर में विवाह जैसा कोई मांगलिक कार्य होता तो प्रकटतः उसमें समाज के हर क्षेत्र के शीर्ष लोगों का जमघट तो होता ही,  किन्तु डॉ. कोठारी ऐसे अवसर पर अपने गृहसेवकों को भी अतिथि के रूप में आमंत्रित करना नहीं भूलते थे,  और स्वयं उनकी आवभगत करते थे।

प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक ‘’बिटवीन दी लाइन्स’ में एक बड़ा दिलचस्प रहस्योद्घाटन किया है,  जिसमें कहा गया है कि जब मोरारजी देसाई ने मंत्री बनने से इन्कार कर दिया तो लालबहादुर शास्त्री ने जगजीवन राम से संवाद न करके डॉ. होमीभाभा और डॉ. डी.एस. कोठारी दोनों को मंत्री पद देने की पेशकश की,  किन्तु दोनों वैज्ञानिकों ने इस आमंत्रण को विनयशीलता के साथ अस्वीकार कर दिया। अमेरिका के चिकित्सा विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक जार्ज वाल्ड जिनके साथ कोठारीजी का जीवन्त सम्पर्क था,  जब उन्हें कोठारी जी के निधन की सूचना मिली तो उन्होंने बड़े मर्मस्पर्शी शब्दों में अपने संवेदना-संदेश में कहा था कि मैंने उनके साथ एक पुस्तक लिखने की योजना बनाई थी,  किन्तु उनका हस्तलेख ऐसा था जिसे पढ़ने में बड़ी कठिनाई होती थी। वाल्ड के साथ दिल्ली में जब पहली बार उनकी मुलाकात हुई,  तो दोनों वैज्ञानिक इस बात पर सहमत थे कि मनुष्य द्वारा अब तक की गई सबसे बड़ी खोज इस सत्य को पाना है कि इन्द्रियों को जो प्रिय लगता है,  जरूरी नहीं कि वह मानव कल्याण के लिए भी उपयुक्त हो। अहिंसा,  नैतिकता और सारी समाज व्यवस्था इसी तत्व-चिन्तन की उपज है।

डॉ. कोठारी नैतिक मूल्यों के बड़े जबर्दस्त पक्षधर थे। उनके पुत्र ललित के. कोठारी जो सवाई मानसिंह मेडीकल कॉलेज में शरीर विज्ञान के सरनाम प्रोफेसर रहे हैं, उन्होंने अपने एक आलेख में कहा है कि अपने अंतिम दिनों में जब उनके पिता उनके साथ रह रहे थे,  तो उनके इस द्वितीय पुत्र ने कोई व्याधि न होते हुए भी उनकी शारीरिक जांच कराने का प्रस्ताव किया था। इसके उत्तर में पिता ने इतना ही कहा ‘’तुम्हें यह समझना चाहिए कि अब मेरे लिए कोई कार्य करना शेष नहीं है।‘

भारत की स्वातंत्र्योत्तर बौद्धिक विरासत के अविछिन्न अंग दौलत सिंह कोठारी 4 फरवरी 1993 को बिना किसी को कोई कष्ट दिये नींद में ही इस मर्त्यलोक को छोड़कर गोलोकवासी हो गये। जिस समय उन्होंने अपना देह त्याग किया, उस समय भी उनके तकिये के नीचे गीता और भक्तामर स्तोत्र की प्रतियां रखी थीं।

एक आला अफ़सर का सांस्कृतिक संकल्प


प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति के विश्व-विख्यात् विद्वान् और राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डॉ. गोविन्द चन्द्र पांडेय के छोटे भ्राता विनोद चन्द्र पांडेय राजस्थान काडर के बड़े प्रखर बुद्धि आई.ए.एस. अधिकारी और सृजनधर्मी थे। जयसलमेर के जिला कलक्टर रहने के बाद जब वे 1962 में राजस्थान सचिवालय में वित्त विभाग के उपशासन सचिव होकर आये,  तो यह पद संभालने के चन्द दिनों बाद ही उन्होंने अपने विद्यानुराग के कारण मुझसे संपर्क की पहल की। मैंने ही उनके प्रथम उपन्यास ‘’रेत, शून्य, हवा’ की समीक्षा लिखी थी। साहित्यिक मैत्री की यह शुरूआत कुछ ऐसे शुभ मुहुर्त में हुई कि वह निरन्तर पल्लवित होती रही और उनके कैबीनेट सचिव बनने से लेकर बिहार, पश्चिम बंगाल और अरूणाचल प्रदेश का गवर्नर पद धारण करने और अन्ततः 73 वर्ष की आयु में गोलोकवासी होने तक बनी रही। दोनों की हैसियत में जमीन-आसमान का अन्तर होने के बावजूद मेरे अन्तरंग संबंधों की कल्पना इससे की जा सकती है कि उनके नई दिल्ली निवास डी-41 भारती नगर में ही अक्सर मेरा दिल्ली-प्रवास का समय कटता था।

उन्होंने अपना एक काव्य-संग्रह भी मुझे डेडीकेट किया था। पांडेय जी बड़े उर्वर मस्तिष्क के धनी थे। राज्य का विशिष्ट योजना-संगठन जो पूरे देश में चर्चित था,  उन्हीं की सूझ-बूझ से खड़ा हुआ था। वे बड़े दम-खम वाले और अपने नवाचारी विचारों को दृढ़ संकल्प के साथ क्रियान्वित करने वाले व्यक्ति थे। उनके कक्ष में एक मन्दिर का सुन्दर मॉडल सुसज्जित था। उनकी दृढ़ धारणा थी कि हमारे असंख्य देवालयों को संस्कृत और संस्कृति के केन्द्रों में विकसित किया जा सकता है। सन् 1982 में केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर जाने से कुछ दिनों पूर्व ही उन्होंने यह हठ कर लिया कि नई पीढ़ी को भारतीय जीवन मूल्यों में संस्कारित करने के लिए रामचरित मानस और महाभारत की प्रतियाँ राज्य के समस्त माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में पहुँचाई जायें। पर उनकी डैड लाइन के अनुसार यह संकल्प साकार कैसे हो,  यही समस्या थी। उन्होंने एक वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी,  विनय व्यास को जो रूसी भाषा के प्रकांड विद्वान् थे,  और मुझे गीता प्रेस गोरखपुर भेजा। दुर्भाग्य से वहाँ तब कुछ आन्तरिक अव्यवस्थाएं चल रही थी। दोनों ग्रन्थों की लगभग 10 हजार प्रतियाँ वे देने की स्थिति में नहीं थे,  फिर भी उन्होंने हमें ये दोनों ग्रन्थ राज्य सरकार के स्तर पर छपाने का अधिकार पत्र इस शर्त के साथ दे दिया कि यदि ये ग्रन्थ समूल्य दिये जायेंगे,  तो इनकी कीमत वही रहेगी,  जो गोरखपुर संस्करणों पर छपी थी। हम दोनों वापस लौट आये। अब समस्या यह थी कि इसके लिए फंड कहाँ से आये। पांडेयजी स्वयं तो उस समय रीजनल स्कीम्स और समाज कल्याण के सचिव थे। पर पांडेयजी का दबदबा कुछ ऐसा था कि वे दूसरे विभागों में भी हस्तक्षेप कर लेते थे। उस समय के.के. भटनागर शिक्षा सचिव थे। ज्ञात हुआ कि उनके पास ‘आपरेशन ब्लैक बोर्ड’ स्कीम के तहत 21 लाख रूपये हैं। डॉ. आदर्श किशोर सक्सेना उस समय मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर के सचिव थे और पांडेय जी उन्हें बहुत वत्सल भाव से देखते थे। शायद इसलिए भी कि वे आदर्शजी के सबसे बड़े भाई डी.के. सक्सेना के मित्र थे, जिन्होंने एक मोड़ पर आई.ए.एस. छोड़कर संयुक्त राष्ट्र की सेवा का स्थायी रूप से वरण कर लिया था। स्मृति धोखा नहीं देती तो अनुमानतः 7 लाख रूपये पांडेयजी को इस पुण्य कर्म के लिए मिल गये। लेकिन मुद्रण की लागत गीताप्रेस गोरखपुर की कीमतों के समतुल्य कैसे आये। मेरी जानकारी के आधार पर उन्होंने कुछ प्रकाशकों की मीटिंग बुलाई। केवल एक साहसी प्रकाशक इस शर्त के साथ तैयार हुआ कि राष्ट्रीय पाठ्य पुस्तक मंडल से उन्हें अपने भंडार से रियायती दरों पर कागज मिले और आयकर विभाग इन दो महान् ग्रन्थों के प्रकाशन को लाभ का उपक्रम न माने। पांडेयजी ने पाठ्य पुस्तक मंडल के चेयरमैन और चीफ कमिश्नर इन्कम टैक्स को सादर आमंत्रित किया इन दोनों शर्तों से सहमत होने के लिए। पांडेय जी की वाणी में ही कुछ ऐसा प्रभाव था कि समझौता होते कुछ देर नहीं लगी। निश्चित तिथि तक दोनों पुनीत ग्रन्थ छापने के लिए जिस प्रकाशक ने चुनौती स्वीकार की थी,  उसे निर्धारित सरकारी प्रक्रिया के अनुसार आदेश दे दिया गया।

पुस्तकें छपकर तैयार हुई ही थी,  कि पांडेयजी 1982 के किसी माह में योजना आयोग में परामर्शदाता बनकर चले आये। मकान तुरन्त मिला नहीं,  वे राजस्थान हाउस में ही ठहरे थे। कोई सप्ताह बाद ही फोन आया कि ‘मन नहीं लग रहा। तुम थोड़े दिन के लिए आ जाओ।‘  मैं जयपुर में इन्हीं दिनों मुक्त छन्द में छपा उनका वैराग्य-शतक का अनुवाद लेकर राजस्थान हाउस पहुँच गया। आग्रह था कि जब तक रहूँ शाम का भोजन उन्हीं के साथ करूँ। एक दिन रात को जब भोजनोपरान्त पांडेयजी मुझे वैराग्य शतक के अपने रूपान्तर के कुछ अंश सुना ही रहे थे कि वहाँ अचानक विनय व्यास आ टपके। व्यासजी अपने नाम के अनुरूप ही बहुत विनयशील थे। वे हमारे पास के सोफे पर आकर बैठे ही थे कि पांडेयजी गरजे “विनय,  तुम अभी यहाँ से भाग जाओ, तुमने मदिरा पी रखी है,  तुम अभी तमस भाव में हो और हम साहित्य की सुरसरि में अवगाहन कर रहे हैं।“ विनय व्यास पांडेयजी से कुछ ही बैच नीचे के अधिकारी थे,  और अपनी विद्वत्ता के लिए भी सरनाम थे। मुझे पांडेयजी का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा। मैंने उन्हें अपनी भावनाएं आहत होने से भी अवगत कराया। दूसरे दिन विनय व्यासजी के साथ मुझे भी नाश्ते पर बुलाया। बड़ी मनुहार से गोविन्द जी और प्रेमजी नामक वेटर्स ने हमें नाश्ता कराया। वे दोनों पहाड़ी थे,  इसलिए पांडेजी को विशेष प्रिय थे।

विनय व्यास उस समय प्राथमिक शिक्षा आयुक्त थे और सोवियत लैंड से लौटने पर उन्हीं की खातिर उस पद को अपग्रेड किया गया था।

पांडेय जी को हम दोनों से यह जानकारी प्राप्त कर परम संतुष्टि हुई थी कि रामचरितमानस और महाभारत इन दोनों ग्रन्थों का वितरण उनके केन्द्र में आ जाने पर भी यथा समय शालाओं में हो चुका था। पांडेय जी के साथ मेरे संबंधों ने मुझे एक ही सबक सिखाया कि याचना से व्यक्ति छोटा हो जाता है। मनुष्य की विश्वसनीयता आज नष्ट हो चुकी है। फिर भी कहना चाहूँगा कि मैंने पांडेय जी से कभी कोई याचना नहीं की और कदाचित् इसलिए उन जैसे कद्दावर व्यक्ति से मेरा भावनात्मक रिश्ता तीन दशक तक चलता रहा।

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

अखबारों के भरोसे हकूमत नहीं होती


वनस्थली विद्यापीठ जैसी महिला-शिक्षा की विश्व प्रसि़द्ध संस्था के संस्थापक और विधान सभा के अस्तित्व में आने से पूर्व राजस्थान के प्रथम मनोनीत मुख्य मंत्री पं. हीरालाल शास्त्री अपनी योग्यता और नेतृत्व क्षमता दोनों के लिए विख्यात् थे। जिस काल खंड में वे स्वल्प अवधि के लिए सत्तारूढ़ हुए, उस समय उनका पदनाम प्रधान मंत्री था,  जिसमें बाद में परिवर्तन हुआ। शास्त्री जी की लेखन-क्षमता अद्भुत थी। उन्होंने बड़ी संख्या में जन-जागरण और नारी-चेतना के गीत ढूंढ़ाड़ी बोली में लिखे थे। वे हिन्दी,  अंग्रेज़ी और संस्कृत तीनों भाषाओं में पारंगत थे,  पर उनके अनेक असाधारण गुणों के साथ उनका सबसे बड़ा अवगुण उनका अहंकार था। इस अवगुण के कारण ही आगे चलकर राजनीति के क्षेत्र में उनका पराभव हुआ। उनकी अहमन्यता से जुड़े कुछ रोचक प्रसंगों में एक बहुचर्चित प्रसंग अखबारी दुनिया से सम्बंधित है।

अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत सजग रहने वाले शास्त्री जी अपने मुख्य मंत्रित्व काल में एक बार विश्राम के लिए तीन दिन के अज्ञातवास में गए। जाने से पूर्व उनकी सबसे बड़ी हिदायत अपने निजी सचिव को यह थी कि उन्हें विश्राम काल में अखबार नहीं भेजे जाएं। उनसे मानसिक शान्ति भंग होती है। जब उनके अति विश्वास पात्र ने समाचार पत्रों के प्रातःकालीन अवलोकन की अनिवार्यता बताई, तो उन्होंने फटकार लगाते हुए कहा-‘”अखबारों के भरोसे हकूमत नहीं चलती। क्या मैं अखबारों से ही राज्य की हलचल जान सकूंगा?” बेचारे निजी सचिव के पास आदेशों की अनुपालना के सिवा क्या विकल्प हो सकता था!

इसी प्रकार जब वे मुख्य मंत्री थे,  तो उन्होंने अपने एक पुराने कार्यकर्ता और वनस्थली में रहे अपने पूर्व निजी सचिव इन दोनों को,  जो अब उनके विरोधी हो गए थे और सक्रिय राजनीति में आ कर वे जय नारायण व्यास और टीका राम पालीवाल का समर्थन कर रहे थे,  एक बार गाड़ी भेज कर अपने बनीपार्क स्थित निवास पर आमंत्रित किया। दोनों व्यक्ति कदाचित् मन ही मन पुलकित हुए होंगे। पर जब वे वहां पहुंचे, तो लम्बे इन्तज़ार के बाद उन्हें भीतर बुलाया और बोले- ‘”मैंने तुम दोनों को यह कहने बुलाया है  कि तुम दोनों चूहे हो और मैं डूंगर हूं। चूहे चाहें तो डूंगर में बिल बना कर रह सकते हैं,  डूंगर को उखाड़ कर नहीं फेंक सकते। बस तुम्हें इतना ही बताना था। अब जा सकते हो।“  बेचारे दोनों बड़े बे आबरू हो कर नीचे आए, जो गाड़ी उन्हें लेने गई थी,  वह वहां से नदारद थी। लाचार होकर दोनों को पैदल ही लौटना पड़ा।

उन का अहंकार सत्ता से च्युत होने पर भी कम नहीं हुआ था। वे मुख्य मंत्री पद से हटने के कई साल बाद एक बार टोंक या मालपुरा क्षेत्र की यात्रा करते हुए एक डाक बंगले में ठहरे। वहां के वी. आई. पी. कक्ष में उन्होंने देखा कि एक पंक्ति में जिन राज नेताओं की तस्वीरें लगी हैं,  उनमें एक तस्वीर उनकी भी है। शास्त्री जी के तीखे तेवर सजग हो उठे। डाक बंगले के मैनेजर को बुला कर बोले-‘”ये जो तस्वीरें लगा रखी हैं,  उनमें से मेरी तस्वीर उतरवालो। किन कीड़े-भुनगों के साथ मेरी तस्वीर को टांग दिया गया है।“  बेचारा मैनेजर स्तब्ध रह गया। करता भी तो क्या करता।

पटवारी कॉट रेड हैंडेड......


घटना कोई पचपन बरस पहले की है। पांचवे दशक के उत्तरार्द्ध का यह कालखंड उस दौर में था,  जब अंग्रेज़ी के संवाददाता सरकारी सर्किल्स में साहबों की तरह समझे जाते थे। हिन्दी संवाददाताओं और अन्य पत्रकारों को प्रायः अंग्रेज़ी के अखबार नवीसों की तुलना में कमतरी का एहसास कराया जाता था और कुछ अपवादों को छोड़ कर वे स्वयं भी इस कॉम्प्लेक्स से पीड़ित रहते थे। अंग्रेज़ी अखबारों के प्रतिनिधियों में एक मिस्टर राणा थे। वे स्टेट्समैन के विशेष संवाददाता थे, उन दिनों में जब इस अखबार की धाक थी और इसे पढ़ने वाला वर्ग भी समाज का उच्चतर अंग्रेज़ी प्रेमी भद्रलोक होता था। राणा एक बड़ी कार में चलते थे और उनकी दम्भोक्तियां अक्सर चर्चा का विषय रहती थीं। कार में चलने वालों में एक अन्य पत्रकार टाइम्स आव इंडिया के वाई. डी. लोकुरकर थे। वे एक ऐसी नन्ही बेबी फिएट कार में चलते थे,  जिसमें केवल दो लोग ही बैठ सकते थे। तब इस कार की कीमत मात्र 6900 रुपए होती थी। कौतूहलवश मैंने इसकी कीमत की जानकारी स्थानीय डीलर से प्राप्त कर ली थी। अंग्रेज़ी के जिन पत्रकारों के पास कारें नहीं थीं,   उनकी सेवा में राजन्य वर्ग के लोगों की कारें प्रायः उपलब्ध रहती थीं। अंग्रेज़ी अखबारों के इन प्रतिनिधियों का मिज़ाज भी स्वाभाविक रूप से भिन्न-भिन्न था। राणा साहब की यह गर्वोक्ति कि स्टेट्समैन उन्हें इतना भारी भरकम वेतन देता है कि उसके सामने राज्य के मुख्य सचिव का वेतन भी बहुत बौना है, एक प्रकार से उनका तकिया कलाम ही बन गया था।

राणा साहब के इस मिज़ाज की बात छोड़ दें,  तो अन्य पत्रकार एक प्रकार का गांभीर्य अपनी संवाद शैली में ओढ़े रहते थे। उनकी मितभाषिता मेरी अपनी दृष्टि में उनके लोक व्यवहार की व्यूह रचना अधिक प्रतीत होती थी,  चारित्रिक बुनावट का अंग नहीं। यहां यह उल्लेख भी प्रासंगिक होगा कि स्टेट्समैन के जो अन्य संवाददाता डी. डी. भारद्वाज साहब आए वे बड़े गंभीर और सी.वाई. चिन्तामणि जैसे महान् लोगों के साथ कार्यरत रहे उच्चतम पत्रकारी प्रतिमानों का पालन करने वाले व्यक्ति थें। बाद में सेवा निवृत्त हो कर वे यहीं बस गए थे। बहरहाल।

यहां प्रस्तुत रोचक प्रसंग वाई. डी. लोकुरकर साहब से संबंधित है। वे नाटे कद के महाराष्ट्रियन थे। उनका सिर लगभग गंजा था,  किन्तु खुशमिज़ाजी और मराठी नाटककारों की तरह अपने सम्भाषण में गज़ब का गुड ह्यूमर और वक्रोक्ति क्षमता रखते थे। न जाने मेरे प्रति वे किंचित् मोहाविष्ट क्यों हो गए थे, पर जब भी जन सम्पर्क निदेशालय की समाचार शाखा में आते तो मुझसे ज़रूर संवाद करते थे। वे अक्सर पूछते ‘कहिए क्या कोई ठीक-ठाक खबर है?  मैं उन्हें उत्तर देता उसके पहले ही वे हंस कर प्रहार करते-‘क्या खबर होगी। बस यही कि पटवारी कॉट  रेड हैंडेड,   टेकिंग फुल पान एन्ड हाफ बीड़ी। अर्थात् पटवारी एक पान और आधी बीड़ी की रिश्वत  लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। उनकी ऐसी एक नहीं,   अनेक दिलचस्प वक्र व्यंजनाएं होती थीं। पर आधी सदी पहले के उनके रोचक जुमले अब विस्मृतियों के जंगल में खो गए हैं।





मुख्य मंत्री पर वैदिक विद्वान का कटाक्ष


पंडित मोती लाल जी शास्त्री और वैदिक अध्ययन-अनुसंधान के लिए उनका संस्थान पूरे भारत में ही नहीं,  समुद्र पार भी विख्यात था। वैदिक साहित्य पर उन्होंने अपने जीवन काल में 80 हज़ार से अधिक पृष्ठ लिखे थे। एक समय था जब देश के अनेक विद्वान् दूर-दूर से दुर्गापुरा स्थित मानवाश्रम में आकर पंडित जी से मार्ग दर्शन प्राप्त करते थे। डॉ  वासुदेव शरण अग्रवाल तो वहां प्रायः प्रति वर्ष आ कर लम्बी अवधि तक रहते थे। पंडित जी की वैदिक विद्वत्ता का इससे बड़ा सम्मान क्या हो सकता था कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें आमंत्रित कर उनके चरण पखार कर उनका अभिनन्दन किया था। मोती लाल शास्त्री जी ने वहां जो चार व्याख्यान दिए उनका संकलन आज भी अनुसंधित्सुओं के लिए मूल्यवान् संदर्भ सामग्री है। पंडित जी अपने प्रिय जनों और जयपुर वासियों से ढूंढ़ाड़ी में ही वार्तालाप करते थे,  पर संस्कृतनिष्ठ इतने थे कि विद्वानों के साथ पत्राचार में वे अक्सर अपने नाम का भी संस्कृत रूपान्तर कर मोती लाल के स्थान पर ‘’मुक्त रक्त’ शब्द का प्रयोग तक करने से नहीं चूकते थे।

पंडित मोती लाल शास्त्री ने अपने ग्रन्थों के प्रकाशन  के लिए जयपुर में बालचंद्र मुद्रणालय भी स्थापित किया था,  जो इस क्षेत्र के लोगों द्वारा जयपुर का अपने ढंग का प्रथम प्रिंटिंग प्रेस बताया जाता है। उनके अपने अनेक ग्रन्थ इसी मुद्रणालय में छपे थे।

मोती लाल शास्त्री जी के श्रद्धालुओं में अनेक विद्यानुरागी श्रेष्ठी जन कलकत्ता में थे,  जो मारवाड़ी उद्योग पतियों का बड़ा केन्द्र रहा है। उनके आमंत्रण पर जब पंडित जी कलकत्ता जाते थे,  तो विदा होते समय उन्हें जितनी बहुमूल्य भेंट दी जाती थी,  उसी के कारण शास्त्री जी बड़े समृद्ध विद्वानों में माने जाते थे। निकटस्थ लोगों का कथन है कि उनके यहां सोने-चांदी के बर्तन बड़ी संख्या में थे। पंडित जी उन दिनों में भी कार में चलते थे,  जब किसी संस्कृत विद्वान् के पास ऐसी वाहन-सुविधा दुर्लभ थी।

पंडित जी को अंग्रेज़ी बिल्कुल नहीं आती थी। इसलिए उनकी वैदिक व्याख्याओं को अंग्रेज़ी में उपलब्ध कराये जाने की बड़ी आवश्यकता थी। इस आवश्यकता की पूर्ति  की, तब जयपुर में कार्यरत पेट्रियट और लिंक के विशेष संवाददाता ऋषि कुमार मिश्र ने,  जो आगे चल कर इन पत्रों के संपादक बनने के साथ-साथ संसद सदस्य भी बने  और उनका प्रभाव राजनीतिक क्षेत्रों में भी असाधारण रूप से उल्लेखनीय रहा। ऋषि कुमार मिश्र पंडित मोती लाल शास्त्री के पट्ट शिष्य हो गए और उन्होंने लम्बी अवधि तक उनके सन्निकट रहकर वैदिक ज्ञान को आत्मसात् किया। इसी बीच मिश्र जी को दिल्ली शिफ्ट करना पड़ा और एक लम्बे अर्से बाद उनका अंग्रेज़ी में लिखित बहुचर्चित ग्रन्थ ^Before the Birth and After the Death* प्रकाशित हुआ,  जो उनके अपने गुरु से अर्जित ज्ञान पर ही आधारित था। पर तब तक इतना विलम्ब हो चुका था कि मोती लाल शास्त्री बहुत पहले ही गोलोक वासी हो चुके थे। बाद में आगे चलकर कीर्ति-पुरुष कर्पूर चंद्र कुलिश  ने भी पंडित जी द्वारा छोड़ी गई सामग्री का पूरा लाभ उठाया और शास्त्री जी के पुत्र कृष्ण चंद्र शर्मा  से पंडित जी के ग्रन्थों और अप्रकाशित सामग्री को प्राप्त करने के साथ ही पं मधुसूदन ओझा जी के ग्रन्थों के आधार पर अध्ययन कर वे भी वेद-मर्मज्ञ के रूप में पहचाने जाने लगे।

अब भले ही सारा परिदृष्य बदल गया है,  पर मानवाश्रम का परिसर तब बहुत विशाल  था। उनका उद्यान तो आम्र कुन्जों के लिए मशहूर ही हो गया था। एक रोचक प्रसंग इसी से संबंधित है। शास्त्री जी ने अपने वैदिक संस्थान के लिए राज्य सरकार से कभी कोई सहायता नहीं ली थी। फिर भी अपने श्रद्धालुओं द्वारा बहुत आग्रह किए जाने पर उन्होंने अपने समधी और राज्य सरकार के गृह मंत्री राम किशोर व्यास के माध्यम से मुख्य मंत्री मोहन लाल सुखाड़िया को मानवाश्रम में आमंत्रित किया। सुखाड़िया जी निर्धारित समय पर अपनी राजसी ताम-झाम के साथ संस्थान में पधारे। गर्मजोशी  के साथ उनका सादर सत्कार होने के बाद कोई दो घंटे तक पंडित मोती लाल शास्त्री उन्हें वेद-विज्ञान पर अपने काम के बारे में समझाते रहे और मुख्य मंत्री जी धैर्य पूर्वक सुनते रहे। अन्ततः जब विदाई का समय आया तो सुखाड़िया जी ने चलते-चलते कहा-‘’पंडित जी! आपका आमों का बगीचा बड़ा सुन्दर है।‘  इतना सुनना था कि शास्त्री जी ने कटाक्ष किया: ‘’करम फूट गए। दो घंटे तक माथा पच्ची की और समझ में आया,  तो यह आया।‘  मुख्य मंत्री जी केवल मुस्कुराए और उनका काफिला वापस चल पड़ा। पंडित मोती लाल जी शास्त्री की राज्य के मुख्य मंत्री पर यह वक्रोक्ति बहुत दिनों तक ब्यूरोक्रेसी और पत्रकारों की गपशप में चर्चा का विषय बनी रही।

रे मूर्ख! कोटिश: कह


जो लोग बीकानेर के डॅूंगर कालेज में पढ़े हैं उनसे और राजस्थान की पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों से पं. विद्याधर शास्त्री का नाम अजाना नहीं है। वे प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ  दशरथ शर्मा के बड़े भाई थे। संस्कृत का अध्यापन करने के साथ-साथ वे देव वाणी में काव्य रचना भी उच्च कोटि की करते थे। प्रकृति से बड़े विनोदी और वत्सल स्वभाव के थे। अपने शिष्यों को बेहद प्यार करने वाले और आवश्यकता होने पर फटकार लगाने में भी नहीं चूकते थे।

साहित्य अकादमी के प्रारम्भिक वर्षो में अकादमी के संस्थापक-अध्यक्ष पं. जनार्दन राय नागर विभिन्न नगरों से साहित्यिक विषयों पर उपनिषदों का,  जिन्हें आजकल सेमिनार कहा जाता है,  आयोजन कराते थे। इन उपनिषदों में शास्त्री जी अवश्य  सहभागिता करते थे। प्रतिभागियों की संख्या अधिक होने पर समूहों में वैचारिक मंथन होता था। दो-तीन बार ऐसा संयोग हुआ कि शास्त्री जी की अध्यक्षता वाले समूह में इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल था। मध्यान्होत्तर सत्र में शास्त्री जी बड़े उतावले हो जाते थे और झटपट समापन करने की चेष्टा करते थे। बात दर असल यह थी कि शास्त्री जी को भंग पीने का व्यसन था। एक बार ऐसा हुआ कि विचार-विमर्श  में शाम के पांच बजने को आए। ऐसे में पंडित विद्याधर शास्त्री सत्र समाप्ति के लिए बहुत आतुर हो उठे और हॅंसते हुए लगे कहने‘ ‘हरे! हरे! पंडितों! समय विशिष्ट हो चुका है। व्यर्थ ही क्यों तर्क-कुतर्क कर रहे हो। जो कुछ सत्य है वह तो वेद इत्यादि में पहले ही कह दिया गया है।‘ प्रतिभागियों ने करतल ध्वनि के साथ हॅंसते हुए सत्र समाप्त कर दिया।

शास्त्री जी से सम्बंधित एक और दिलचस्प प्रसंग है। जैसा कि कहा जा चुका है, शास्त्री जी  अपने शिष्यों को बड़े वत्सल भाव से देखते थे। कोई शिष्य किसी ऊॅंचं पद पर पहुंच जाता तो वे बहुत गर्व का अनुभव करते थे। शास्त्री जी के षिष्यों की लम्बी कतार में इतिहास के विद्वान् नाथूराम खड़गावत भी थे। खड़गावत मूलतः इतिहास के प्राध्यापक थे। किन्तु कुछ समय बाद मुख्यमंत्री सुखाड़ि़या जी ने उन्हें राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखने का काम सोंपा। खड़गावत जी ने बड़ी मेहनत से पहला वॉल्यूम तैयार किया,  जिसका नाम था ‘ राजस्थान ड्यूरिंग 1857। तारीख तो याद नहीं,  पर किसी ऐतिहासिक दिन पर इस ग्रन्थ के विमोचन का आयोजन बीकानेर में किया गया। स्वयं मुख्यमंत्री ने विमोचन किया। भारी भीड़ थी। बड़ा भव्य समारोह था। जैसे ही समारोह सम्पन्न हुआ,  परम्परा के  अनुसार पुस्तक के लेखक खड़गावत जी धन्यवाद देने के लिए उठे। जैसे ही उनके मुख से ये शब्द  उच्चारित हुए -‘”देवियो और सज्जनो! मैं आप लोगों को कोटिश  धन्यवाद देता हूं,   कि बीच ही में ही खड़गावत जी के गुरु शास्त्री जी ज़ोर से चिल्लाए -‘रे मूर्ख! कोटिश:  कह।‘  सब हक्के-बक्के रह गए। खड़गावत जी ने मंच से ही अपने गुरु से क्षमा याचना करते हुए अपनी भाषिक त्रुटि में संशोधन किया। समारोह की समाप्ति पर खड़गावत जी नीचे उतर कर आए,  गुरु के चरण स्पर्श  किए और उन पर आशिषों की झड़ी लग गई। ऐसे थे विलक्षण गुरु और ऐसे थे सहिष्णु शिष्य!  

जयपुर आकाशवाणी की पुरानी यादें और कोड़ाराम की चाय


आकाशवाणी से मेरा रिश्ता  लगभग 68 साल पुराना हो चुका है। मेरा पहला प्रसारण दिल्ली से हुआ था,  जिसे ‘’चित्रलेखा’  के ख्यातनाम लेखक भगवती चरण वर्मा ने रैकर्ड किया था। यह भी एक सुखद संयोग ही था कि 1955 में जब आकाशवाणी के जयपुर केन्द्र का उद्घाटन राजस्थान के राज प्रमुख सवाई मान सिंह ने किया था,  तो उसका श्रीगणेश  राजस्थान की प्रशस्ति में लिखे गए मेरे गीत से ही हुआ था। उसके बाद तो इस केन्द्र से निरन्तर बड़ा आत्मीयतापूर्ण जुड़ाव रहा। जयपुर केन्द्र की जब स्वर्ण जयन्ती निदेशक धर्मपाल के कार्यकाल में मनाई गई,  तो मुझे अन्य विद्वानों और कलाकारों के साथ सम्मानित भी किया गया। बहरहाल।

पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे याद आते हैं वे कद्दावर लोग,  जिन्होंने जयपुर केन्द्र को बड़ी हैसियत दी थी। केन्द्र के सबसे पहले प्रभारी सहायक निदेशक सत्य प्रकाश  कौशल थे। उन्हीं की देख-रेख में केन्द्र का भव्य उद्घाटन हुआ था। वे जल्दी ही स्थानान्तरित हो कर पूना चले गए, जहां उनका आकस्मिक निधन हो गया। उनके जाने के बाद एक और सहायक निदेशक आए डॉ  समर बहादुर सिंह, जिन्होंने रहीम पर बड़ी महत्वपूर्ण गवेषणा की थी। समर बहादुर सिंह तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री राम सुभग सिंह के दामाद थे। उनके बाद निदेशक स्तर के अधिकारियों ने केन्द्र को सम्भाला,  जिनमें रोमेश  चंद्र,  प्रताप कृष्ण और गोपाल दास जी तो अपनी कार्यशैली और विद्वत्ता के लिए इतने विख्यात हुए कि उनके नाम आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। रोमेश  चंद्र अपने प्रशासनिक कौशल,  उच्च स्तरीय जन सम्पर्क और लेखकों से सक्रिय संवाद के लिए सुपरिचित रहे,  तो गोपाल दास जी एक श्रेष्ठ लेखक और आकाशवाणी केन्द्र संचालन में दीर्घ अनुभव के धनी थे। जयपुर के बुद्धिजीवियों के बीच वे बड़े लोकप्रिय हुए और सेवा निवृत्ति पर यहीं बस गए। कोई लगभग 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। हिन्दी की विख्यात् लेखिका रजनी पनिकर भी इस केन्द्र की निदेशक रहीं,  किन्तु अपने कड़े अनुशासन के कारण वे थोड़ी विवादास्पद हो गईं थीं। यहां से स्थानान्तरित हो कर वे आकाशवाणी कलकत्ता जैसे बड़े केन्द्र की निदेशक बनीं।

दूसरी पंक्ति में जिन अनुभवी और प्रतिभावान् लोगों ने जयपुर केन्द्र के कार्यक्रमों को सुदूर तक चर्चित बनाया,  उनमें हिन्दी के प्रख्यात आलोचक रहे ललिता प्रसाद सुकुल के भतीजे गंगाधर शुक्ल,  ब्रह्म स्वरूप बहल,  गंगा प्रसाद माथुर,  एन. आर. टंडन,  मिस्टर विकर्स और लक्ष्मण टंडन के नाम विशेष  रूप से उल्लेखनीय हैं। गंगाधर शुक्ल तो इस समय 94 वर्ष के हैं और कुछ समय पूर्व ही उन्होंने अपनी एक पुस्तक ‘’वक्त गुज़रता है’  भेजी थी,  जिसमें जयपुर की यादें बड़ी खूबसूरती से संजोयी गई हैं। लक्ष्मण टंडन सेंट स्टीफन्स के प्रोडक्ट थे और वे कुछ समय बाद प्रसिद्ध पत्रकार अपने मित्र चंचल सरकार के आग्रह पर प्रेस इंस्टीट्यूट में ओ.एस.डी. होकर चले गए थे,  जहां से वे फिर टाइम्स ऑव  इंडिया में मैनेजर (डिवलपमेन्ट) हो गए। लक्ष्मण टंडन,  जिन्हें मित्र लोग प्यार से लच्छी कहते थे,  वे दूरदर्शन पर प्रश्न  मंच शीर्षक एक बड़ा श्रेष्ठ कार्यक्रम करते थे। इस कार्यक्रम से उनकी ख्याति और लोक प्रियता में बहुत विस्तार हुआ। मिस्टर विकर्स भी अपनी ड्यूटी के बड़े पाबंद थे। उनकी बड़ी पुत्री पैट्रीशिया तो विख्यात सर्जन हैं और एक अन्य पुत्री मोनिका राजस्थान पर्यटन निगम में वरिष्ठ अधिकारी हैं। यह परिवार जयपुर में ही बस गया था।

हिन्दी प्रोड्यूसर्स में भी इस केन्द्र पर कितने कद्दावर साहित्यकार आए, इसका अनुमान बहुत कम लोगों को है। उदयशंकर भट्ट, राज नारायण बिसारिया,  गोपाल कृष्ण कौल जैसी हस्तियां कार्यक्रमों को एक नई भंगिमा प्रदान करते थे।

संगीतकारों में विनायक राम चंद्र आठावले, जवाहर लाल मट्टू,  म्यूज़िक कम्पोज़र्स में राम सिंह और अन्य कई श्रेष्ठ संगीतकार थे। तबला वादक दायम अली का नाम भुलाए नहीं भूलता। कलाकारों में सर्व श्री नन्द लाल शर्मा,  ओम शिवपुरी,  असरानी,  मदन शर्मा और महिला कलाकारों में सुधा शर्मा कमला केसवानी,  कला हज़ारे,  माया इसरानी आदि अनेक नामचीन प्रतिभाएं स्टाफ पर थीं। लोक कलाकारों में गणपत लाल डांगी का कोई सानी नहीं था। भारत-चीन युद्ध के समय उनका कार्यक्रम ‘’लड़ै सूरमा आज जी’  बेहद लोक प्रिय हुआ। कितने ही नाम हैं,  जो अब स्मृतियों से ओझल हो चुके हैं। फिर भी आमेर के राज महलों में ओ.बी. वैन के सहारे आयोजित भव्य बिहारी उत्सव और आकाशवाणी के लॉन्स  पर आयोजित बीसियों अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों की अनुगूंज अवश्य  जयपुर आकाशवाणी के रसिक श्रोताओं की स्मृतियों में रमी होगी। परिसर में स्थित सिन्धी कोड़ा राम की कड़क चाय और उनके द्वारा आर्मी से ला कर सुलभ कराने वाली थ्री एक्स रम की यादें उन दिनों यहां रहे और कहीं भी बसे हों,  जयपुर आकाशवाणी कर्मियों के जेह्न  में अब भी मंडराती होंगी।