शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

आत्म-विज्ञापन में उलझी अफसरशाही


प्रशासन के ऊँचे पदों पर बैठे आला अफसरों का राजन्य भाव और समाज के सभी वर्गों पर बढ़ता उनका दबदबा अब कोई रहस्य नहीं रह गया है। राजनीति विज्ञानियों की भाषा में भले ही चुने हुए जनप्रतिनिधि  ‘स्वामी’  की संज्ञा से अभिहित होते हों और नौकरशाही की जमात ‘लोकसेवकों की बिरादरी’  कहलाती हो,  किन्तु व्यावहारिक जीवन में आलम कुछ और ही है। भर्तृहरि ने शताब्दियों पूर्व कहा था कि सेवाधर्म सामान्यजन के लिए तो क्या,  योगियों के लिए भी परम गहन है। किन्तु आज के आला अफसरों को ऐसी प्रतीति कदाचित् दूर-दूर तक नहीं होती। उनके स्वभावगत अहंकार,  सर्वज्ञता के भ्रम और राजसी शैली से तो सभी वाकिफ रहे हैं,  किन्तु हाल के वर्षों में उनमें आत्म-विज्ञापन का आसव पीकर उन्मत्त होने की जैसी उत्कट लालसा देखने में आ रही है,  वह चिन्तनीय है।

एक समय वह था,  जब सरकार के बड़े अफसर भले ही कितने सुविधाभोगी रहे हों,  किन्तु आत्म-प्रचार की व्याधि से ग्रस्त नहीं थे। मुझे याद आता है,  पाँच दशक से अधिक समय पूर्व का वह प्रसंग,  जब राजस्थान के सबसे लंबे समय तक मुख्य सचिव रहे स्व. भगवत सिंह मेहता ने शासन द्वारा प्रकाशित एक पत्रिका में इन पंक्तियों के लेखक द्वारा सम्पादक की हैसियत से उनका एक चित्र छापे जाने पर पत्र लिखकर आगाह किया था कि भविष्य में कभी भी सरकारी अधिकारियों के चित्र विकास विभाग की उस पत्रिका में न छापे जायें। किन्तु बदलाव कितना आ गया है कि पिछले दिनों एक सरकारी विभाग की पत्रिका में उनके अपने शासन सचिव और विभागाध्यक्ष के ही एक दर्जन से अधिक चित्र प्रकाशित किये गये थे। ऐसी एक नहीं अनेक शासकी पत्रिकाएं और समय-समय पर प्रकाशित होने वाले सामयिक प्रकाशन आपकी दृष्टि से गुजर जायेंगे, जिनमें सरकार के आला अफसरों की तस्वीरें बड़ी संख्या में आये दिन अनिवार्य रूप से छपती रहती हैं।
मजे की बात तो यह है कि आजकल किसी भी सरकारी विभाग या गैर सरकारी संस्थान का कोई भी सार्वजनिक आयोजन हो, विभागीय मंत्रियों के साथ विभागीय सचिव और विभागाध्यक्ष भी समारोह में विशिष्ट अतिथि बनते हैं और अध्यक्षता करते हैं। इतना ही नहीं नेताओं को जिस प्रकार शाल ओढ़ाकर या सिर पर साफा पहनाकर सम्मानित किया जाता है,  उसी तर्ज पर अधिकारियों का भी सार्वजनिक सम्मान किया जाता है। बात चाहे राज्य की राजधानी की हो या कि किसी प्रदेश के जिला क्षेत्रों की,  परिदृश्य वही नजर आता है। जिला कलक्टर तो आये दिन ही इस प्रकार के समारोहों को अपनी उपस्थिति से उपकृत करते रहते हैं। ऐसे अवसरों पर निकलने वाली स्मारिकाओं और पुस्तिकाओं में उनके नयनाभिराम चित्र भी सैकड़ों की संख्या में देखने को मिल जायेंगे। इतना ही नहीं,  आला अफसरों के संदेशों से भी सभी सरकारी और गैर-सरकारी प्रकाशन भरे रहते हैं,  जिनके साथ अनिवार्य रूप से उनके चित्र लगे होते हैं। प्रायः प्रत्येक राज्य के सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय के अन्तर्गत कार्य कर रहे जिला जनसंपर्क अधिकारी तो जिला कलक्टरों के भाषण और तस्वीरें आंचलिक साप्ताहिकों और पाक्षिकों में छपाकर उनका कृपा-प्रसाद पाने में ही अपने कर्म की सार्थकता समझते हैं। राज्य की राजधानियों और बड़े नगरों में होने वाले साहित्यिक,  सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों पर यदि दृष्टि डालें,  तो अक्सर दूरदर्शन,  आकाशवाणी और सूचना निदेशालयों के अधिकारी मंच पर मुख्य अतिथि,  विशिष्ट अतिथि या अध्यक्ष के रूप में बिराज रहे होंगे। आयोजकों द्वारा मंच पर उन्हें सुशोभित करने का मंशा एक ही होता है कि उनके कार्यक्रम को प्रचार मिल जाये। प्रचार की इस प्रक्रिया में संचार माध्यमों के कीर्ति पुरूषों के चित्र तो मुद्रित या इलेक्ट्रानिक मीडिया में स्वतः स्थान पा ही लेते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि राज्य शासन या केन्द्र शासन द्वारा इसका कोई नोटिस नहीं लिया जाता कि ये अधिकारी इन रस्मी आयोजनों के उद्घाटन और समापन समारोह में राज-काज को परे रखकर अपना कितना समय बर्बाद करते हैं। यूंकि इस कोटि के अधिकारी प्रायः सरकारी वाहनों में ही ऐसे आयोजन स्थलों पर जाते हैं, इसलिए वाहनों का दुरूपयोग भी प्रकटतः होता ही है। पिछले डेढ़-दो दशकों में आला अफसरों में आत्म-प्रचार की यह प्रवृत्ति इतनी तेजी से बढ़ी है कि वह राजनेताओं की आत्म-विज्ञापन-कामिता से होड़ लगाती है। राज्य कोष में निरन्तर सेंध लगाने वाले ये उच्च वेतन भोगी आला अफसर इन प्रचारात्मक प्रवृत्तियों में कितनी ऊर्जा,  समय और सार्वजनिक धन का अपव्यय करते हैं,  इसकी कल्पना की जा सकती है। क्या सरकारें अपने इन लोकसेवकों पर उनकी इस आत्म-प्रचारात्मक मानसिकता को तोड़ने और उनके द्वारा जनप्रतिनिधियों के साथ समारोहों में मंचस्थ होने पर कोई अंकुश नहीं लगा सकती?

इतना ही नहीं,  विशेष अवसरों और अभियानों के दौरान जो बड़े-बड़े विज्ञापन मंत्रियों के नयनाभिराम चित्रों और उपलब्धियों के अतिरंजित आंकड़ों के साथ छापे जाते हैं,  उनमें भी अनेक बार आयोजनकर्ताओं में नौकरशाही की चाटुकारिता के अभ्यस्त लोग आला अफसरों के फोटोग्राफ छपाते रहते हैं। पीछे मुड़कर देखें, तो स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश के पुर्ननिर्माण की दिशा में नेहरू युग में जो कार्य हुआ,  उसकी उपलब्धियों के आंकड़े और उनके साथ बड़े-बड़े चित्र कभी भी उस बेहूदा ढंग से नहीं छापे गये जिस तरह से आजकल छापे जा रहे हैं। आज के वरिष्ठ नागरिकों को वह युग भूला नहीं है,  जब कभी भी न तो सरकारी उपलब्धियों के बड़े-बड़े इश्तहारों पर करोड़ों रूपये स्वाहा किये जाते थे और न गाहे-बगाहे छपने वाले प्रचारात्मक विज्ञापनों में कभी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू,  सरदार पटेल या गोविन्द वल्लभ पंत के चित्र छपते थे। किन्तु अब तो नेताओं की तो बात ही क्या है विभिन्न आयोजनों के अवसरों पर छपने वाले विज्ञापनों में जिला स्तर तक के अधिकारियों के चित्र धड़ल्ले से छप रहे हैं।

इन दिनों एक और रोग बड़ा तेजी से फैल रहा है। देश में अनेक व्यक्ति और संस्थाएं सम्मानों का कारोबार कर रही हैं। बीसियों ऐसी संस्थाएं महानगरों में बनी हैं,  जिनके संरक्षक अधिकांशतः अब महत्वहीन हो चुके बड़े नेता, पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद हैं। ये संस्थाएं और इनसे जुड़े चालाक व्यक्ति नाना प्रकार के सम्मानों का आयोजन करते हैं और विविध क्षेत्रों में सेवाओं के लिए विभिन्न वर्गों के लोगों को मोटी रकम लेकर सम्मानित करने की तिजारत करके अपनी तिजोरियां भरते रहते हैं। उनकी व्यूह रचना ही यह होती है कि वे ऐसे पुरस्कारों और सम्मानों का बड़ा प्रभावशाली नामकरण करते हैं और फिर उसके लिए ऐसे यशपिपासु ढूंढते हैं,  जो अक्ल के अंधे और गांठ के पूरे होते हैं। सम्मानों के इस कारोबार को पनपाने में वे आला अफसर भी बड़े सहायक होते हैं,  जो स्वयं इन सम्मानों और अलंकरणों को निःशुल्क प्राप्त कर अपने को धन्य समझते हैं। इन सम्मानों के कारोबारी और धंधेबाज लोगों की रणनीति ही यह होती है कि वे कुछ आला अफसरों को सम्मान के इस मोहजाल में फांसें,  ताकि वे उनके नामों का उल्लेख करके कुछ ऐसे धनी लोगों को भी फांस सकें जो विभिन्न व्यवसायों में लगे रहने के साथ मिथ्या  सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के व्यामोह में ऐसे विकृत सम्मान प्राप्त करने के लिए मोटी रकम दे सकें। अभी कुछ वर्षों पहले ही अपने एक परिचित व्यवसायी को ऐसे ही तथाकथित राष्ट्रीय सम्मान से दिल्ली में सम्मानित किया गया था और उनके साथ कुछ आला अफसर भी सम्मानित हुए थे। अपने उन परिचित व्यवसायी की भव्य तस्वीर जब मैंने एक समाचार पत्र में छपी देखी,  तो मैंने उन्हें फोन पर बधाई देना चाहा तो उनसे यह दुखड़ा रोये बिना नहीं रहा गया कि वह सम्मान प्राप्त करने और फोटो छपाने में उन्होंने पूरे 50,000  हजार रूपये व्यय किये हैं।

ऐसे आला अफसरों की भी कमी नहीं हैं जो अपने को बड़ा कवि या गायक समझने की भ्रान्ति पाले रहते हैं। अक्सर ऐसे नौकरशाह कवि कार्यालय समय में भी अपना काव्य पाठ अपने मित्रों और सहधर्मी अधिकारियों के सामने करने से बाज नहीं आते। अपने प्रभाव का उपयोग करके वे न केवल अपनी घटिया किस्म की तुकबन्दियों के संकलन छपाते रहते हैं,  बल्कि पुरस्कार और सम्मान प्राप्त करने की टोह में भी रहते हैं। आला अफसरों द्वारा अपने मिथ्या अहम् की तुष्टि के लिए कराई जाने वाली इस प्रकृति की वैनिटी पब्लिशिंग के सैकड़ों नमूने पुस्तक विक्रेताओं की दुकानों पर देखे जा सकते हैं। काश! राज्य सरकार अपने अफसरों के इस आत्म-विज्ञापन के व्यामोह पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक निर्देश जारी कर सके।

धन्यवाद के पात्र हैं राष्ट्रपति महोदय


वैसे तो पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी कुछ सामन्ती परम्पराओं को तोड़ा था। उदाहरणार्थ,  उन्होंने इस सामन्ती प्रचलन को बंद किया था कि राष्ट्रपति को उनके जूते कोई सेवक पहनाए,  चाहे राष्ट्रपति भवन में और चाहे समाधि स्थलों पर श्रद्धांजलि अर्पित करते समय जूते उतारने की ज़रुरत पड़ी हो। सेवकों द्वारा जूते पहनाने और जूते उतारने में उन्होंने सेवकों की सहायता का सर्वथा परित्याग कर दिया था। उसी प्रकार राष्ट्रपति भवन में इतना बड़ा अमला होते हुए भी वे स्वयं कम्प्यूटर पर बैठ कर इण्टरनेट के ज़रिए वैज्ञानिक गतिविधियों का लेखा-जोखा लेते रहते थे। उनकी यह जीवन शैली सब ओर सराही गई थी,  किन्तु हाल ही में पदासीन हुए राष्ट्रपति महोदय प्रणब मुखर्जी ने तो औपनिवेशिक शब्दावली के बहिष्कार की घोषणा करके निश्चित रूप से एक ऐसा स्तुत्य कार्य किया है,  जिसकी ओर किसी का ध्यान अब तक नहीं गया था। उन्होंने पहले तो अपने वक्तव्य में इस बात की निन्दा करते हुए कि ‘’हिज़ एक्सिलेन्सी’  और ‘’महामहिम’  जैसे शब्द हमारी मानसिक दासता के प्रतीक हैं और उनके लिए इन शब्दों का प्रयोग न किया जाए। अधिक से अधिक जहॉं नामोल्लेख ज़रूरी हो,  उन्हें ‘श्री प्रणब मुखर्जी ही कहा जाए। उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति प्रकट की थी कि राजकीय और गैर राजकीय समारोहों में जहॉं वे पधारें वहॉं उनके लिए मंच पर ऊॅंची कुर्सी न लगाई जाए। अब तो राष्ट्रपति भवन से भी औपचारिक विज्ञप्ति जारी कर दी गई है। उसमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि देशवासियों द्वारा उन्हें किसी भी प्रसंग में ‘’हिज़ एक्सिलेन्सी’  और ‘’महामहिम’  जैसे विशेषणों से अलंकृत न किया जाए। इस विज्ञप्ति में इतनी-सी व्यवस्था अवश्य की गई है कि विदेशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ जुड़े आयोजनों और कार्यक्रमों में अन्तरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल का पालन किया जाता रहेगा।

आश्चर्य की बात यह है कि जब राष्ट्रपति जी ने ‘’हिज़ एक्सिलेन्सी’  और ‘’महामहिम’  जैसे शब्दों का बहिष्कार करने की बात अपने वक्तव्य में कही थी,  उसके बाद भी देश के किसी भाग के राज्यपाल ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी और न ही ऐसा कोई संकेत किया था कि वे भी भारी भरकम उपनिवेशवादी विशेषण अपने लिए प्रयुक्त किए जाने का मोह त्याग देंगे।

   किन्तु, अब जबकि राष्ट्रपति भवन से राष्ट्रपति जी के लिए उन विशेषणों का उपयोग न करने की विज्ञप्ति जारी की जा चुकी है,  तो राज्यपालों को भी क्या इस प्रकार के निर्देश राष्ट्रपति भवन से जारी किए जाएंगे?  क्योंकि राज्यपाल सीधे वहीं से नियंत्रित होते हैं। यहां तक कि कोई राज्यपाल अपने प्रदेश की राजधानी छोड़ कर अन्यत्र जाता है,  तो उसे राष्ट्रपति भवन को सूचित करना होता है। औपनिवेशिक शब्दावली के अन्तर्गत और ऐसी  कितनी ही संज्ञाओं का प्रयोग प्रचलन में है। मिसाल के तौर पर राज्यपाल लोग जहां रहते हैं उनके निवास स्थल को राज भवन क्यों कहा जाता है, जबकि मुख्य मंत्री जहां रहते हैं,  उसे मुख्य मंत्री निवास के नाम से जाना जाता है। राज्यपाल के रहने के स्थान को भी उसी प्रकार राज्यपाल निवास के नाम से पुकारा जा सकता है। इसी प्रकार राजधानी में और ज़िला मुख्यालयों पर जहां राजन्य व्यक्तियों के निवास होते हैं,  उस क्षेत्र को सब जगह,  यहां तक कि दौसा और बारां जैसे छोटे ज़िलो में भी,  जहां कलेक्टर और ज़िला स्तर के अन्य अधिकारी रहते हैं,  सिविल लाइन्स कहा जाता है और जयपुर की सिविल लाइन्स तो मशहूर है ही। प्रकटतः इस क्षेत्र को सामान्य लोगों की बस्तियों से एक विशिष्ट बस्ती के रूप में पहचान दी गई है,  जो सर्वथा अनुचित है। सिविल लाइन्स के नाम से जो बस्तियां जानी जाती हैं,  उनका नाम किसी ऐसे व्यक्ति के नाम पर भी रखा जा सकता है,  जिनका सार्वजनिक जीवन में असाधारण योगदान रहा हो।

एक और अद्भुत बात यह है कि जब-जब भी विभिन्न आयोजन गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस,  गॉंधी जयन्ती आदि के अवसर पर सरकार द्वारा किए जाते हैं,  तो राज्य का सामान्य प्रशासन विभाग समाचार पत्रों में जनता को जिस भाषा में आमंत्रित करता है,  वह सर्वथा सामन्ती प्रकृति की होती है। हर विज्ञापन इस पंक्ति के साथ ही प्रारम्भ होता है ‘सर्व साधारण को सूचित किया जाता है कि-- प्रकटतः ‘’सर्व साधारण’  जुमले का यह प्रयोग नागरिकों की एक तरह से अवमानना ही है। इन शब्दों के प्रयोग से स्पष्टरूप से यह गंध आती है कि आमंत्रण देने वाले राजसी लोगों की दृष्टि में नगर निवासी अपने मुकाबले में कमतर होते हैं। इस तरह का प्रयोग नितांत अवांछनीय है और अविलम्ब बंद हो जाना चाहिए।

हमारी अदालतों के जो सम्मन समाचार पत्रों में छपते हैं उनमें से अधिकांश की भाषा में उसी पुराने  औपनिवेशिक युग की झलक मिलती है,  जबकि केन्द्र सरकार के विधि मंत्रालय के राज भाषा विभाग ने विशुद्ध हिन्दी में अच्छे-अच्छे मानक प्रारूप उपलब्ध करा दिए हैं।

निष्कर्षतः राष्ट्रपति महोदय को इस बात के लिए हार्दिक धन्यवाद किया जाना चाहिए कि उन्होंने राष्ट्रपति भवन से ही औपनिवेशिक विशेषणों को विदाई देने की पहल की है।    

नगर निगम के मुख्यालय में अग्नि-कांड


वैसे तो कदाचित् ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब जयपुर नगर-निगम से संबंधित कोई न कोई निन्दात्मक न्यूज स्टोरी स्थानीय समाचार पत्रों में न छपती हो। पर अभी दो दिन पूर्व नगर-निगम के मुख्यालय में हुए अग्नि-कांड में दो अनुभागों की फाइलें भस्मीभूत होने की खबर सचमुच चिन्ताजनक है। दफ्तरों में फाइलों को गुम करवा देना, दो चार महत्वपूर्ण फाइलों को निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा जलाया जाना तो समय-समय पर घटित होता रहा है। किन्तु इस प्रकार का फाइल-विनाशी अग्निकांड पहली बार ही सुना गया है। आग कैसे लगी, इसके बारे में तो स्थिति तभी स्पष्ट होगी, जब जाँच-समिति की रिपोर्ट सामने आयेगी, किन्तु यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इस अग्निकांड में मेयर-विरोधी कुछ तत्वों का हाथ जरूर है। आग लगने का कारण बिजली का शॉर्ट सर्किट हो जाना भी हो, तब भी यह जाँच का एक मुख्य बिन्दु अवश्य होना चाहिए कि आग के पूरी तरह प्रज्जवलित हो जाने और उसमें पत्रावलियाँ जलते रहने की सूचना कब और कितने विलम्ब से दी गई और अग्निशामक कार्यवाही कितने विलम्ब से शुरू हुई। जो कुछ हुआ है, वह नगर के प्रबुद्ध जनों के मस्तिष्क को आन्दोलित करने वाला है।

पीछे मुड़कर देखें तो जब से ज्योति खंडेलवाल मेयर पद के लिए चुनी गई तबसे उन्हें शान्तिपूर्ण ढंग से काम करने देने का वातावरण नगर निगम परिसर में रहा ही नहीं। विपक्षी दल के साथ सिर-फुटव्वल और सी.ई.ओ’ज. के साथ संघर्ष का सिलसिला इस तरह चलता रहा है कि नगर-निगम तत्वतः एक कलह-केन्द्र बन गया है। मेयर पर तरह-तरह के आरोप भी लगते रहे हैं और सब ओर से उनके विरूद्ध चैन-चुरैया हरकतें होती रही हैं। तथ्यात्मक और सत्यात्मक स्थिति क्या है, कहना कठिन है। पर इन हालात का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करें, तो कहना होगा कि जब जब कोई मध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग की कोई महिला किसी महत्वपूर्ण आसन पर विराजमान होती है, तो लोग उसे कम ही बर्दाश्त कर पाते हैं। विशेष रूप से अधीनस्थ पुरूष कर्मियों की तो यह प्रवृत्ति ही है कि वे महिला-विरोधी ब्यूह-रचना में पूरी दिलचस्पी लेते रहें। यद्यपि राज्य में नारी-सशक्तीकरण की दुन्दुभी बराबर बजती रही है, पर महिला सरपंचों से लेकर महिला मेयरों और महिला मंत्रियों की जो स्थिति है, उस पर दृष्टि-निक्षेप करें, तो निराशाजनक निष्कर्ष ही प्राप्त होते हैं। आलम यह है कि बरसों पहले सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किये थे कि सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही क्षेत्रों के कार्यालयों में महिला यौन-उत्पीड़न और अशिष्टाचरण पर निगरानी रखने के लिए ऐसी समितियाँ गठित की जायें जिनकी अध्यक्ष न केवल महिला ही हो, अपितु उसके सदस्यों की संख्या में भी महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व हो। पूरे राज्य में सरकारी विभागों और सरकार द्वारा वित्त पोषित कितने संस्थानों में ऐसी समितियाँ बनी और उन्होंने क्या भूमिका निभाई, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है।

कोई एक दशक पूर्व इन पंक्तियों के लेखक ने एक अध्ययन सेंम्पल सर्वे पद्धति से कराया था, जिसका परिणाम यही निकला था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अन्तर्गत गठित समितियाँ पूर्णतः निष्क्रिय हैं और महिलाओं का उत्पीड़न कार्य-स्थलों पर पूर्ववत् जारी है। कितने दोषी अब तक दंडित हुए हैं, इसकी सरकारी स्रोतों से कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। कहने का आशय यह है कि वर्किंग वूमन किसी भी पद पर नियुक्त हो, या किसी भी शीर्ष पद पर वह लोकतान्त्रिक पद्धति द्वारा चयनित होकर बैठी हो, उसका मार्ग कंटकाकीर्ण ही रहता है। जयपुर नगर-निगम भी इसकी एक मिसाल ही प्रतीत होती है।

थोड़ी देर के लिए नगर-निगम प्रकरण को नजरन्दाज कर दें, तब भी यह तो सोचना ही होगा कि कार्यालयों में फाइलों का रख-रखाव बहुत प्रभावी एवं कड़ी सुरक्षात्मक व्यवस्था की मांग करता है। सरकार में अलबत्ता ऐसे भी कुछ कुशल और चौकन्ना रहने वाले आला अफसर हैं, जो गोपनीय फाइलों को आलमारियों में स्वयं बन्द करके रखते हैं और उनके निजी सहायकों की भी ऐसी पत्रावलियों तक पहुंच नहीं होती। वे अनुकरणीय हैं। बहरहाल, जयपुर नगर निगम में हुआ अग्नि-कांड गंभीर चिन्ता का विषय है और ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति किसी कार्यालय में न हो सके, इसके लिए उपचारात्मक कदम पूरी शिद्दत से उठाये जाने चाहिए।

चुनाव चर्चा: सात दशक पहले


पत्रकारिता के इतिहास में गहरी दिलचस्पी के कारण पुराने समाचार पत्रों की तलाश करते रहना मेरा व्यसन रहा है। अपनी इसी खोज के सिलसिले में मेरी मुलाकात अचानक कोई तीस साल पहले श्री प्रियतम कामदार से हो गई। कामदार उन उत्कट विद्यानुरागियों में थे जो सुदूर सन् 1928 में भी प्रसिद्ध प्रकाशक डी.बी. तारापुरवाला से अंग्रेजी के ग्रन्थ मंगाकर पढ़ते थे। सन् 1942 में कामदार ने अन्य पत्रों के अलावा ‘’प्रचार’ नाम से एक ऐसे तेजस्वी साप्ताहिक का प्रकाशन किया था,  जिसके सामाजिक और राजनीतिक सरोकार सघन और गहरे थे। सन् 1945 में जब प्रजामंडल की मांगों के फलस्वरूप जयपुर रियासत में उत्तरदायी शासन की मांग उठने लगी, तो सर मिर्जा इस्माइल के जमाने में धारा सभा और प्रतिनिधि सभा की स्थापना की गई और इसके लिये चुनाव कराये गये। एक सीमित दायरे में ही सही,  जयपुरवासियों का चुनावों की प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया से गुजरने का यह पहला अनुभव था। इसलिए प्रबुद्ध पत्रकार प्रियतम कामदार ने अपने समाचार पत्र के जरिये लोक-शिक्षण का बीड़ा उठाया और अपने पत्र में तरह-तरह के मनोरंजक विज्ञापन,  कविताएं,  लेख और टिप्पणियां प्रकाशित कीं,  ताकि जन सामान्य चुनाव-प्रचारकों की चिकनी-चुपड़ी बातों और मीठे वादों के भुलावे में न आयें और योग्य उम्मीदवारों को ही विजयी बनायें। यहां मैं उन विज्ञापनों को उद्धृत करने का मोह संवरण नहीं कर सकता,  जो कामदार जी ने आज से लगभग सात दशक पूर्व प्रकाशित किये थे।

जयपुर में नृसिंह चतुर्दशी का जुलूस बड़ी धूम-धाम से निकलता है। इसकी तैयारियां भी बड़े जोर शोर से होती हैं। नृसिंह के विभिन्न अवतारों के मुखौटे लगाये लोगों की यह शोभायात्रा दर्शनीय होती है। इसी शोभायात्रा की उपमा देते हुए चुनाव-चेतना का एक विज्ञापन जयपुरी बोली में इस प्रकार छापा गया थाः
‘चुनाव ‘चतरदशी’ आ गई छै
रंग विरंग्या चेहरा लेर
चैरावां चैरावां चक्कर लगाता हुयां
लोग
गळी गळी में घूम रह्या छै
सावधान!
वोट की ढोक कोई नकली नरसिंगजी के
देद्योला,  तो
आशीष को अस्यो हांथ माथा पर फेरेला
कि
थांका
चोटी-पट्टा साफ हो जायला
और
वांकी जटा
घेर-घुमेर हो जायली।

उन्होंने अपने समाचार पत्र में बुद्धि-कौशल से भरा एक ऐसा फार्म भी तैयार करके छापा था,  जिसमें उम्मीदवारों से जयपुर की सेवा करने और कुछ विशेष मांगों को पूरा करने की प्रतिज्ञा निहित थी। इस फार्म पर उम्मीदवारों के हस्ताक्षर कराने के लिये मतदाताओं का इस प्रकार आह्वान किया गया थाः

“यदि आप चोरों के चक्रव्यूह,  पापियों के पाखण्ड,  हरामियों के हथकंडे,  ठगों के गिरोह से अपने बहुमूल्य वोट की रक्षा करना चाहते हैं तथा अपने पवित्र वोट के बदले में अपने इष्ट मित्र,  कुटुम्बियों व मूक जनता और इसके सच्चे प्रतिनिधियों के लिये इस दिन से अगले चुनावों तक कष्ट,  चिन्ता और अपमान नहीं खरीदना चाहते हैं,  तो आपके ‘’प्रचार’  द्वारा प्रेषित पब्लिक के हित,  उन्नति और सम्मान भरे इस फार्म पर उम्मीदवार के हस्ताक्षर कराके अपना वोट दीजिये-‘

मनोरंजक विज्ञापनों के साथ-साथ पत्र के ‘’चुनाव चर्चा’  शीर्षक स्तंभ में मतदाताओं को आगाह किया गया है कि वे उम्मीदवारों को मत देने से पहले निम्नलिखित बातें सुनिश्चित कर लें:
1. अमुक उम्मीदवार ने ‘’चोर बाजार’ से मूक जनता की रक्षा करने के लिये क्या-क्या किया और अब क्या करने की प्रतिज्ञा करता है।
2. अमुक उम्मीदवार ने राज्य के विभागों में बढ़ती हुई अभूतपूर्व रिश्वतखोरी से जनता की कितनी रक्षा की और अब क्या कर सकता है।
3. जनता द्वारा उठाये गये ‘’हिन्दी’  तथा ‘’वृक्ष नहीं कटेंगे’  आदि आन्दोलनों में अमुक उम्मीदवार ने क्या क्रियात्मक कार्य किये और आगे से जनमत विरूद्ध प्रश्न उपस्थित होने पर क्या कर सकेगा।
4. राज्य के उच्च स्थानों पर जयपुर वाले योग्य व्यक्ति नियुक्त किये जायें,  इस जननाद को किस उम्मीदवार ने सहारा दिया और आगे इस दिशा में क्या कर सकता है।
5. बहुत ही कम वेतन पाने पर भी कम भत्ता व बहुत बड़ा वेतन पाने पर बड़ा भत्ता दिये जाने के विरूद्ध किस उम्मीदवार ने क्या प्रतिरोध किया और आगे क्या करने का वादा करता है।
6. जयपुरवासी छोटे से छोटे सरकारी नौकर को पेट भराऊ वेतन अवश्य मिलना चाहिये,  इस आवाज में किस उम्मीदवार ने सहारा लगाया और भविष्य में लगाएगा क्या?
7. शहर की गलियों की बढ़ती हुई गंदगी के विषय में किन-किन उम्मीदवारों ने म्यूनिसिपैलटी व हैल्थ ऑफिस का गला पकड़ा और अब क्या वादा करते हैं।

एक साप्ताहिक द्वारा लगभग सत्तर वर्ष पूर्व चुनावों में इतनी गहरी रूचि लेकर लोक-शिक्षण की प्रभावी भूमिका निभाने का यह उपक्रम निश्चय ही प्ररेणास्पद और आज भी प्रासंगिक है।

वे बेमिसाल शिष्ट-मिष्ट लोग!


सन् 1962 का वह दिन मुझे अभी भी याद है,  जब तत्कालीन मुख्य सचिव भगवत सिंह मेहता ने प्रशासनिक शिष्टाचार और नए अफसरों के पहनावे पर विनोदपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा था,  ”प्रभाकर,  तुम अभी बच्चे हो। हमने तो वे दिन देखे हैं जब मेवाड़ में किसी रस्मी आयोजन में कोई बिना पगड़ी पहने जाने की जुर्रत नहीं कर सकता था। किसी ने अगर हिमाकत की तो उसकी खैर नहीं थी।“

लगभग 35 साल पहले का एक और किस्सा याद आता है,  यह मेरी आंखों के सामने ही घटित हुआ था। राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एस. अड़वियप्पा उन दिनों विकास विभाग में रूरल हाउसिंग सैल के प्रभारी अधिशासी अभियन्ता थे। उन्हें उन दिनों हिन्दी पढ़ने का चाव चढ़ा था। इसी सिलसिले में मैं एक दिन उनके कक्ष में बैठा था कि उसी समय उनके निजी सहायक ने वहां प्रवेश किया। निजी सहायक के मुंह में इतनी बुरी तरह पान भरा था कि बोलने में भी सहजता भंग होती थी। अड़वियप्पा साहब बहुत शान्त प्रकृति के बड़े शिष्ट व्यक्ति थे। किन्तु बड़ी कठोरता के साथ उन्होंने अपने निजी सहायक को निर्देश दिया,‘”तुम आज कैजुअल लीव पर रहो। अब दुबारा मेरे कमरे में आने की जरूरत नहीं है।“

कुछ वर्षों पूर्व मैं एक संगोष्ठी के सिलसिले में कोटा में था। संगोष्ठी की संध्या को एक स्थान पर आठ-दस व्यक्तियों के अनौपचारिक संवाद और आस्वाद का कार्यक्रम था। वहां जिला स्तर के एक युवा अधिकारी ने प्रवेश के साथ ही वह पराक्रम दिखाया कि धूम्रपान विहीन उस शालीन वातावरण को भंग करते हुए सिगरेट मंगाने का आदेश दिया और सिगरेटें फूंक फूंक कर उसका धुआं उन वयोवृद्ध विशिष्ट अतिथियों पर उड़ाते रहे,  जिनमें साठ के आसपास की मीडिया जगत से जुड़ी एक महिला भी थी। अगली सुबह जब इन महिला ने मेरे साथ बातचीत की और मैंने गत संध्या की घटना पर खेद प्रकट किया, तो उत्तर में उन्होंने हँसते हुए कहा ”ये सब बाल-लीलाएं हैं। इनसे अच्छा मनोरंजन हो जाता है।“

शिष्टाचार-हन्ता इन उदाहरणों के ठीक विपरीत अतिशय शिष्टाचार और विनम्रता का एक प्रसंग आज भी मुझे ममत्व से अभिभूत कर देता है। बहुत पुरानी घटना है। मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और राजस्थानी साहित्य के मर्मज्ञ कैलाश दान उज्जवल से मिलने उनके निवास पर गया था। गृह-सेवक ने मेरा नाम पूछा और मुझे बरामदे में बैठने को कहा। बाड़मेर की तरफ का ठेठ ग्रामीण नौकर था। कदाचित् मेरा नाम ठीक से नहीं बता पाया। करीब पन्द्रह मिनट बैठा होऊंगा कि उज्जवल साहब जो उस समय टीवी देख रहे थे,  किसी काम से उठे। शाम का समय था। रोशनी में जाली के दरवाजे से मेरी मुखाकृति दिखाई दी। वे तुरन्त बाहर आए। मुझ से पूछा कि मुझे आए कितनी देर हुई थी। मैंने उन्हें स्थिति बता दी। उन्होंने पहले तो सेवक को डांट-फटकार लगाई और फिर क्षमा-याचना करते हुए मुझे भीतर ले गए। मैंने बहुत कहा कि मुझे अधिक समय नहीं हुआ है और नौकर की गलती नहीं है,  वह मेरे नाम का उच्चारण ठीक से नहीं कर पाया। मैं थोड़ी देर उनके साथ रहकर घर लौट आया। रात्रि को अचानक करीब साढ़े दस बजे उज्जवल साहब का फोन आया। वे कह रहे थे,  ”प्रभाकरजी,  थे म्हांनैं माफ करियो क नहीं?  म्हारा मन मैं घणों पछतावो होरियो है।“ मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मेरे मन में कुछ नहीं है। मैं आपके स्नेह से विह्वल हूं।

एल.एन. गुप्ता,  जिनका पूरा नाम लक्ष्मीनारायण गुप्ता है,  प्राचीन भारतीय जीवन मूल्यों को आत्मसात् किये आज कल अपनी बँगलाभाषी सहधर्मिणी के साथ दुर्गापुरा के निकट प्रेम-निकेतन-आश्रम में अपना पिचहत्तर के पार जीवन निर्विकार भाव से व्यतीत कर रहे हैं। वे केन्द्र सरकार और राज्य सरकार में सचिव स्तर के पदों पर रहने के अतिरिक्त प्रधानमंत्री नरसिंहाराव के कार्यकाल में राजस्थान में राष्ट्रपति शासन के दौरान परामर्शदाता भी रहे। पर सिद्धान्तों से समझौता उनके लिए संभव ही नहीं था। उन्होंने कुछ माह बाद ही त्याग पत्र दे दिया। गुप्ता जी ने अन्य आला अफसरों की तरह कभी अपने घर पर सरकारी ऑर्डरली या सेवक नहीं रखा। उनका एक मात्र निजी सेवक भँवर नाम का युवक था,  जिसकी पत्नी को उन्होंने घर की बीनणी कह कर ही सम्मान दिया। एक बार मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे प्रशासनिक सेवा के दौरान घटित सर्वाधिक स्मरणीय घटना पर आधारित कोई एक संस्मरण प्रकाशनार्थ दें। गुप्ता जी मुस्कुराकर बोले “मुझे कुछ याद नहीं,  मैं जिस दिन सेवा-निवृत्त हुआ,  उसी दिन मैंने अपनी स्मृति के इस पक्ष का स्विच ऑफ  कर लिया था कि मैं कभी भारतीय प्रशासनिक सेवा में था और फिर कोई भी व्यक्ति जब संस्मरण लिखता है, तो उसमें कहीं न कहीं ‘’मैं’ तो आ ही जाता है,  जो अहंकार का द्योतक है।“ उनकी असहमति भी कितनी शालीनता पूर्ण थी!

बी. एच. यू. का वह बदरंग कवि-सम्मेलन


आज भले ही देश  में विश्व  विद्यालयों की बाढ़ आ रही है,  पर पं. मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित बनारस हिन्दू विश्व  विद्यालय का आज भी कोई सानी नहीं है। लेकिन मैं हैरत में पड़ गया था,  जब मैंने एम.एन.आई.टी. जयपुर के समारोह में कुछ छात्रों से पूछ लिया था कि मालवीय महाराज कौन थे,  और वे निरुत्तर थे। उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में जो गिरावट आई है,  यह उसका एक नमूना था। जो भी हो,  यहां मैं जिस घटना का ज़िक्र कर रहा हूं,   वह तकरीबन 36-37 वर्ष पुरानी है।

कदाचित् 1976  का ही कोई कालखण्ड था। बी. एच. यू. की हीरक जयन्ती बड़े ज़ोर-शोर  से मनाई जा रही थी। इस महोत्सव की श्रृंखला में एक राष्ट्रीय स्तर का कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया था,  जिसमें हिन्दुस्तान के सभी सरनाम कवि,  जिनकी संख्या कोई तीस-चालीस के आस पास होगी,  आमंत्रित किए गए थे। अगर मुझे ठीक से याद है,  तो आमंत्रित कवियों में सबसे अधिक उम्र की  कवयित्री जो उस समय अस्सी के भी पार थीं,  चंद्रमुखी ओझा ‘’सुधा’  थीं और दूसरे नंबर पर डा. राम कुमार वर्मा थे। यह एक संयोग ही था कि इन पंक्तियों के लेखक को भी उस कवि-कुम्भ में आमंत्रित कर लिया गया था। सबसे कम  उम्र के कवि बुद्धिनाथ मिश्र थे,  जिन्हें आगे चलकर गीतकार के रूप में अच्छी प्रसिद्धि मिली थी। मेरी अपनी पात्रता उस आयोजन के प्रतिभागी के रूप में कितनी थी,  कहना कठिन है। पर हकीकत यह है कि उस समय बी. एच. यू. के हिन्दी विभाग में राजस्थान के एक रत्न बूंदी निवासी डा. भोला शंकर व्यास थे। व्यास जी भाषा विज्ञान के प्रकाण्ड विद्वान् थे। यद्यपि कवि सम्मेलन के समय वे अस्वस्थ चल रहे थे,  पर मेरा खयाल है कि उनकी संस्तुति पर ही मुझे आमंत्रित किया गया होगा। व्यास जी जब तक जीवित रहे,  जब कभी जयपुर आते,  तो मुझे दर्शन दे कर अवश्य  कृतार्थ करते थे। जयपुर में उनके कई निकट संबंधी थे और वे प्रवास में प्रायः एक संबंधी के यहां बापू नगर में ही ठहरते थे। बहरहाल।

उस विशाल कवि सम्मेलन के संयोजक और प्रभारी उस समय के यशस्वी गीतकार और बी. एच. यू. के हिन्दी विभाग में ही कार्यरत डा. शंभू नाथ सिंह थे। मैं बड़े उत्साह के साथ बनारस पहुंचा था। आयोजन स्थल के  मार्ग में एक पान की दुकान थी। वहां मैंने पनवाड़ी से एक बनारसी पान बनाकर देने को कहा। वह हॅंसा और बोला, बाबू,  बाहर से आए दिखते हो,  यहां एक पान नहीं,  पान का जोड़ा दिया जाता है। खैर। पान का जोड़ा खाया। विश्व  विद्यालय के प्रमुख द्वार पर स्वागत कर्ताओं  से माल्यार्पण कराया। उनके सायंकालीन आतिथ्य का सुख प्राप्त कर ठीक समय पर उस सभागार में पहुंचा जहां कवि सम्मेलन होना था। रात्रि के आठ बजते-बजते पूरा सभागार खचाखच भर गया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कदाचित् डा. राम कुमार वर्मा कर रहे थे। उत्तर प्रदेश  के तत्कालीन जन सम्पर्क निदेशक और प्रसिद्ध कवि ठाकुर प्रसाद सिंह भी उसमें भाग ले रहे थे। बड़े उल्लास और आनन्द के वातावरण में कवि सम्मेलन उर्दू मुशायरों की परम्परा के अनुसरण में सबसे युवा कवि बुद्धिनाथ मिश्र के गीत से प्रारम्भ हुआ। उसके बाद कुछ और कवियों ने काव्य पाठ किया। पर यह क्या, जैसे-जैसे बहुत वरिष्ठ और राष्ट्रीय ख्याति के कवि काव्य पाठ के लिए खड़े हुए,  बड़ी संख्या में छात्र हूटिंग करने लगे और पुरजा़र ध्वनि में शंख  बजाने लगे,  जो वे अपने साथ लाए थे। भले ही कवि सम्मेलन सुबह के चार बजे तक चला,  पर छात्रों के उत्पात ने रंग में भंग कर दिया। बाद में ज्ञात हुआ कि इस सब के पीछे विश्व  विद्यालय के प्राध्यापकों की अपनी राजनीति थी और वे इस आयोजन को फ्लॉप  कराने पर उतारू थे।

मेरी अपनी खिल्ली तो ऐसी उड़ाई गई कि वह घटना भुलाए नहीं भूलती। कवयित्री चंद्रमुखी ओझा ‘’सुधा’  जो मेरी दादी की उम्र की रही होंगी,  बराबर ज़र्दे का पान चबाए जा रही थीं और उनकी मंचीय टिप्पणियों का मैं ही एक मात्र निरीह और धैर्यवान् श्रोता था। उन्होंने बड़े दुराग्रह से मुझे ज़र्दे का पान ठीक उस समय खिला दिया,  जब मेरा टर्न आने वाला था। मैंने इससे पहले कभी ज़र्दे का पान नहीं खाया था। मेरा नाम पुकारे जाने पर मैं जैसे ही माइक के सामने जा कर खड़ा हुआ,  पान की पीक निगल जाने के कारण मेरी खुल्ल-खुल्ल शुरू  हो गई। मैं दो छंद भी नहीं पढ़ पाया कि छात्रों ने मुझे बुरी तरह हूट करना शुरु कर दिया। विवश  होकर मुझे बैठ जाना पड़ा। मैं,  जो उन दिनों राजस्थान के अच्छे मंचीय लोकप्रिय गीतकारों में समझा जाता था और शायद इसीलिए भोला शंकर जी व्यास ने मेरी सिफारिश  की होगी,  बहुत बेआबरू होकर बनारस से लौटा। तसल्ली इतनी ही थी कि मैं तो नाचीज़ था,  पर उस कवि सम्मेलन में बड़े-बड़े महारथियों की प्रतिष्ठा धराशायी हुई थी।

गृह सेवक-सेविकाओं की समस्याएं और समाधान


प्राचीनकाल से लेकर आज तक समाज के समृद्ध और खाते-पीते वर्गों में गृह सेवक रखने की परम्परा रही है। एक समय था,  जब गृह सेवक भी एक परिवार के साथ न केवल अपने जीवन का श्रेष्ठतम भाग सेवा धर्म में गुज़ारते थे,  अपितु उनकी हैसियत यह भी हो जाती थी कि वे अपने स्वामी के पारिवारिक मामलों में भी यथा आवश्यकता अपना परामर्श देते थे और कई बार पारिवारिक विग्रह और कलह का निवारण करने में अपनी भावनात्मक भूमिका निभाते थे। गृह स्वामी भी उनकी सेवाओं के लिए उनको यथोचित ढंग से पुरस्कृत और सम्मानित करते थे। शुक्र नीति में कहा गया है कि स्वामी का कर्तव्य है कि वह सेवकों की हथेलियों को स्निग्ध रखे। इस नीतिगत कथन का मंतव्य यही था कि व्यक्तिगत सेवा चाकरी में रहने वाले व्यक्तियों को हमेशा उन्हें अपनी उदारता से प्रसन्न रखने का प्रयत्न करना चाहिए। किन्तु आज तो सारी स्थितियां  ही बदल गई हैं। भौतिकता की इस दौड़ में न पहले जैसे स्वामी रहे और न सेवक। फिर भी किसी-न- किसी रूप में घरों में नौकर-चाकर रखे ही जाते हैं,  भले ही उनका स्वरूप बदल गया हो। आजकल जब पढ़े-लिखे परिवारों में महिलाएं जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय सहभागिता करने लगी हैं,  या वेतनभोगी पदों पर कार्य करने लगी हैं,  तो ऐसी कामकाजी महिलाओं के लिए तो किसी-न-किसी रूप में आया,  बाई,  महाराजिन,  महरी या अन्य कोई सेवक रखने की आवश्यकता बढ़ती ही जा रही है। किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि सम्भ्रांत घरों में भी पढ़े-लिखे स्त्री-पुरुष अपने सेवकों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं,  जो मानव मूल्यों की दृष्टि से सर्वथा निन्दनीय है।

प्रायः देखा गया है कि अधिकांश ऐसे घरों में सेवकों के लिए रूखा-सूखा अलग खाना बनवाया जाता है। परिवार के अन्य सदस्य जैसा आहार लेते हैं,  उसकी तुलना में उनका भोजन प्रायः पोषक तत्वों से विहीन होता है। परिणामतः वे कुपोषण के शिकार भी हो जाते हैं। सबसे आपत्तिजनक बात तो यह होती है कि जब घर में कोई मिठाई अथवा कोई सुस्वादु व्यंजन परिजनों द्वारा उपयोग में लाया जाता है और जब वह उपयोग के योग्य भी नहीं रहता,  तो उसे गृहसेवकों को अपने घर ले जाने के लिए दे दिया जाता है। एक क्षण के लिए भी उनके मन में यह विचार नहीं आता कि जो वस्तु वे स्वयं खाने योग्य नहीं समझते,  उसे अपने सेवक को खाने के लिए क्योंकर दिया जाना चाहिए। फ्रिज में पड़े-पड़े फल या सब्जी़ जब ख़राब होने की स्थिति में आती है,  तो वह भी प्रायः गृह सेवकों को या उनके परिजनों को उदरस्थ करने के लिए दे दी जाती है। अनेक बार तो इस दुष्प्रवृत्ति के कारण गृह सेवक बीमार भी हो जाते हैं।

यही आलम वस्त्रों के मामले में नज़र आता है। अक्सर ऐसे  वस्त्र जो फटे-पुराने होते हैं या परिवार के सदस्यों की पसन्द से गिर जाते हैं,  उन्हें गृह सेवकों को ही भेंट में देकर अपनी उदारता का परिचय दिया जाता है।

शादी-ब्याह या अन्य मांगलिक अवसरों पर भी अक्सर यही होता है कि एक ओर जहॉं दूसरे सदस्यों के लिए हज़ारों रुपए के महंगे परिधान अवसर विशेष के लिए बनाए जाते हैं,  वहीं सेवकों के हिस्से में चालाकी और चतुराई से बाहर से चमकदार दिखाई देने वाले घटिया किस्म के कपड़े ही आते हैं।

हालांकि इस तथ्य को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ अर्से से इन सेवकों द्वारा गृह स्वामी या स्वामिनियों की हत्या कर उनके गहने,  नकदी आदि चुरा कर ले जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं,  पर इसके पीछे भी कारण निर्धनता ही है। यदि इन्हें भी अच्छा वेतन और खाने-पीने की समुचित सामग्री मिलती रहे तो कदाचित् इन चिन्ताजनक घटनाओं में कमी आ सकती है।

इसी प्रसंग में हम घरों में अंशकालिक रूप से काम करने वाली उन स्त्रियों का भी ज़िक्र कर सकते हैं,  जिन्हें राजस्थान में आमतौर पर ‘’बाई’  कहकर सम्बोधित किया जाता है। अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवारों में ये ‘’बाइयॉं’  यूं तो काम के लिहाज़ से गृहस्थी का एक अनिवार्य अंग हैं और पड़ोसनों तथा परिचितों की आपसी बातचीत का एक प्रिय विषय भी हैं,  जो इनकी अहमियत को ही रेखांकित करता है,  परन्तु इन्हें भी जो मासिक वेतन दिया जाता है,  वह मोटे अनुमान के आधार पर परिवार की कुल आमदनी का पचासवें हिस्से से भी कम ही होता है। यही नहीं,  उसे भी इस अंदाज़ से दिया जाता है कि तीन से अधिक छुट्टी की तो प्रतिदिन के हिसाब से पैसा काटा जाएगा।

ये ‘’बाइयॉं’  जो पिछले 10-15  वर्षों पूर्व सैंकड़ों मील दूर अपने परिवार के साथ काम की तलाश में यहॉं आई हैं,  किन स्थितियों में रह रही हैं,  हम इसका आकलन तब तक नहीं कर पाते,  जब तक इनके तथाकथित आवासों को हम एक बार देख नहीं लेते। जिन बस्तियों में ये रहती हैं और जिस तरह का अपौष्टिक भोजन इन्हें प्राप्त होता है,  वह इनके आए दिन रोग ग्रस्त हो जाने का बहुत बड़ा कारण है।

आज आवश्यकता यह विचार करने की है कि इन्हें कैसे सम्माननीय नागरिकों का दर्जा देते हुए इनके जीवन स्तर में सुधार लाया जाए और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि इनके बच्चे भी विद्यालयों में पढ़ने जा सकें।

जिन परिवारों में ये अंशकालिक सेविकाएं काम करती हैं,  उनका तो यह कर्तव्य बनता ही है,  कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं भी इनके जीवन स्तर और इन परिवारों की आमदनी के बारे में सर्वे कराकर अपने सुझाव दे सकती हैं।